Friday, October 2, 2026
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Women Police Station: महिला थाने का प्रभारी अधिकारी वह लोक सेवक नहीं, जिसके समक्ष झूठे बयान दिए गए; धारा 182 IPC के तहत कार्यवाही रद्द

मामला सारांश (At a Glance)

पहलूविवरण
माननीय पीठन्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन
संबंधित कानूनIPC (Section 182) & CrPC (Section 195, Section 482)
मुख्य निर्णयजिस लोक सेवक को झूठा बयान न दिया गया हो, वह धारा 182 की शिकायत दर्ज नहीं करा सकता; पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज शिकायत पर कोर्ट संज्ञान नहीं ले सकता।

Women Police Station: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 182 के तहत दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है।

न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला (Justice J. B. Pardiwala) और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन (Justice K. Vinod Chandran) की पीठ ने उच्च न्यायालय के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत दायर रद्द करने की याचिका को खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिला पुलिस स्टेशन (Women Police Station) का प्रभारी अधिकारी न तो वह लोक सेवक (Public Servant) था जिसके समक्ष कथित रूप से झूठे बयान दिए गए थे, और न ही वह उन अधिकारियों का प्रशासनिक वरिष्ठ (Administrative Superior) था।

अदालत की मुख्य कानूनी टिप्पणियां (Key Legal Findings)

  • धारा 182 IPC और CrPC की धारा 195 का दायरा
    • IPC की धारा 182 (लोक सेवक को नुकसान पहुंचाने के इरादे से झूठी जानकारी देना) के तहत अपराध केवल ‘अपराधी’ और ‘संबंधित लोक सेवक’ के बीच का मामला होता है।
    • CrPC की धारा 195 के तहत स्पष्ट नियम है कि धारा 172 से 188 IPC के तहत अपराधों का संज्ञान (Cognizance) केवल तभी लिया जा सकता है, जब वही लोक सेवक लिखित शिकायत दर्ज कराए जिसके सामने झूठी जानकारी दी गई हो, या फिर उसका कोई प्रशासनिक वरिष्ठ अधिकारी शिकायत करे।
  • महिला थाना प्रभारी का अधिकार क्षेत्र:“महिला पुलिस स्टेशन का प्रभारी अधिकारी न तो वह लोक सेवक है जिसके समक्ष कथित तौर पर झूठे और तुच्छ बयान दिए गए थे, और न ही वह अधिकारी उन लोक सेवकों से प्रशासनिक रूप से वरिष्ठ है जिनका उल्लेख शिकायत में किया गया है।”

मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)

  • विवाद: यह मामला एक मृत पति की बहन (ननद/अपीलकर्ता) और पत्नी (दूसरी प्रतिवादी) के बीच वैवाहिक कलह से जुड़ा था। पति की मृत्यु के बाद दोनों पक्षों में समझौता हो गया था और बाकी मामले वापस ले लिए गए थे, लेकिन धारा 182 IPC का यह मामला अटका रहा।
  • आरोप: पत्नी का आरोप था कि उसकी ननद ने उसे और उसके परिवार को परेशान करने और मामले वापस लेने का दबाव बनाने के लिए विभिन्न सरकारी विभागों में झूठी शिकायतें दर्ज कराई थीं।
  • हाई कोर्ट का रुख: हाई कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि धारा 182 का अपराध लोक सेवक के खिलाफ होता है, इसलिए दोनों पक्षों के बीच हुए आपसी समझौते से यह मामला खत्म नहीं होता।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि जिन विभिन्न सरकारी विभागों में ननद द्वारा शिकायतें करने का आरोप लगाया गया था, उन विभागों के किसी भी अधिकारी ने कोई लिखित शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। महिला थाने की पुलिस अपनी ओर से इस मामले में शिकायत दर्ज कर संज्ञान नहीं दिला सकती थी।

पीठ ने माना कि शिकायत पूरी तरह से दुर्भावनापूर्ण थी। सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए धारा 182 IPC के तहत चल रही पूरी कार्यवाही को खारिज (Quash) कर दिया।

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