Custodial Death: दिल्ली हाईकोर्ट ने हिरासत में होने वाली मौतों और मानवाधिकारों के संरक्षण को लेकर एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
पीड़ित के पिता को ₹18.44 लाख का मुआवजा देने का निर्देश
हाईकोर्ट के जस्टिस सचिन दत्ता की एकल पीठ ने श्याम सुंदर बनाम दिल्ली राज्य (NCT) मामले में दिल्ली सरकार को निर्देश दिया है कि वह उत्तर-पूर्वी दिल्ली के करावल नगर थाने की कस्टडी में दम तोड़ने वाले 19 साल के एक युवक के पिता को ₹18.44 लाख का मुआवजा (Compensation) भुगतान करे। कोर्ट ने साफ किया कि जब कोई व्यक्ति सलाखों के पीछे होता है, तब भी संविधान का अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) उसकी सुरक्षा की गारंटी देता है। अदालत ने कहा, पुलिस हिरासत में अप्राकृतिक मौत (Unnatural Custodial Death), चाहे वह आत्महत्या (Suicide) ही क्यों न हो, एक निजी कृत्य नहीं है जिसे राज्य की जिम्मेदारी से अलग कर दिया जाए। यह उन लोगों की तरफ से कर्तव्य की चूक को दर्शाता है जिन्हें सुरक्षा का जिम्मा सौंपा गया था।
मामला क्या है?: करावल नगर थाने में 2018 की घटना
यह याचिका पीड़ित युवक दीपक के दत्तक पिता श्याम सुंदर द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने अपने बेटे की मौत के लिए न्याय और हर्जाने की मांग की थी।
गिरफ्तारी और प्रताड़ना का आरोप: याचिका के अनुसार, 15 जनवरी 2018 को करावल नगर थाना पुलिस ने 19 वर्षीय दीपक को एक मामले में हिरासत में लिया था। पिता श्याम सुंदर का आरोप था कि जब वह अपने बेटे से मिलने थाने गए, तो पुलिस ने उन्हें भी कुछ घंटों के लिए अवैध हिरासत में रखा और दोनों के साथ बेरहमी से मारपीट की गई। आरोप यह भी था कि पुलिसकर्मियों ने दीपक को छोड़ने के बदले पैसों की मांग की थी।
अस्पताल पहुंचने से पहले मौत: अगले ही दिन यानी 16 जनवरी 2018 को दीपक को गुरु तेग बहादुर (GTB) अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे ‘ब्रॉट डेड’ (अस्पताल पहुंचने से पहले मृत) घोषित कर दिया। पिता को फोन पर सूचना दी गई कि उनके बेटे ने थाने में सुसाइड कर लिया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण फांसी के कारण दम घुटना (Asphyxia due to hanging) बताया गया।
हाई कोर्ट का रुख: हिरासत में मौत सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, सिस्टम पर दाग है
दिल्ली सरकार ने अदालत में दलील दी थी कि हर कस्टोडियल डेथ के मामले में मुआवजा देना स्वचालित या अनिवार्य नहीं होता। जस्टिस सचिन दत्ता ने सरकार के इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए ‘पब्लिक लॉ लायबिलिटी’ (सार्वजनिक कानून के तहत राज्य की जवाबदेही) का सिद्धांत तय किया:
आत्महत्या भी राज्य की विफलता है
अदालत ने कहा कि जब किसी नागरिक की स्वतंत्रता छीनकर उसे राज्य की कस्टडी में रखा जाता है, तो अधिकारियों का ‘देखभाल का कर्तव्य’ (Duty of Care) अत्यधिक बढ़ जाता है। थाने के भीतर अगर कोई व्यक्ति फांसी लगा लेता है, तो यह वहां तैनात पुलिसकर्मियों की गंभीर लापरवाही और निगरानी की विफलता को साबित करता है। राज्य प्रत्यक्ष संलिप्तता न होने का बहाना बनाकर पल्ला नहीं झाड़ सकता।
Custodial Death एक कानून के शासन पर आघात
कोर्ट ने कस्टोडियल डेथ को एक गंभीर व्यवस्थागत चिंता (Systemic Concern) बताते हुए कहा, हिरासत में मौत महज एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि यह कानून के शासन (Rule of Law) की बुनियाद पर चोट करती है। कस्टडी के भीतर किसी भी प्रकार की चूक चाहे वह हिंसा, लापरवाही, अस्पष्ट परिस्थितियों या खुदकुशी के कारण ही क्यों न हो—न्यायिक जांच के दायरे में आती है, क्योंकि इससे व्यक्ति की गरिमा और न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता दोनों जुड़े हैं।”
Custodial Death में मुआवजे का निर्धारण कैसे हुआ? (Multiplier Method)
अदालत ने पीड़ित के परिवार को सम्मानजनक हर्जाना दिलाने के लिए मोटर वाहन दुर्घटना दावों की तरह ‘गुणक पद्धति’ (Multiplier Method) का इस्तेमाल किया।
मासिक आय का आकलन: दीपक की संभावित मासिक आय ₹12,000 आंकी गई।
भविष्य की संभावनाएं: इसमें 40 प्रतिशत राशि ‘भविष्य की संभावनाओं’ (Future Prospects) के रूप में जोड़ी गई।
गुणक (Multiplier): युवक की कम उम्र (19 वर्ष) को देखते हुए 18 का मल्टीप्लायर लागू किया गया।
पारंपरिक राशि: इसके साथ ही अंतिम संस्कार के खर्च और संपत्ति के नुकसान की पारंपरिक मदों को जोड़कर कुल मुआवजा ₹18,44,000 तय किया गया।
हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार को इस पूरी राशि का भुगतान आठ सप्ताह (दो महीने) के भीतर याचिकाकर्ता (पिता) को करने का सख्त निर्देश दिया है।
Custodial Death का केस मैट्रिक्स: दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश (Case Summary)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | दिल्ली उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति (२०२६) |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस सचिन दत्ता (एकल पीठ) |
| केस संदर्भ | श्याम सुंदर बनाम दिल्ली राज्य एनसीटी व अन्य (Shyam Sunder v. State NCT of Delhi) |
| घटनास्थल और समय | करावल नगर पुलिस स्टेशन, दिल्ली (जनवरी २०१८) |
| संबद्ध संवैधानिक अधिकार | भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) |
| याचिकाकर्ता के वकील | सीनियर एडवोकेट त्रिदीप पेस, सान्या कुमार और चिरंजीव सिंह |
| अदालत का अंतिम आदेश | याचिका स्वीकार। दिल्ली सरकार को 8 सप्ताह के भीतर ₹18.44 लाख मुआवजा देने का निर्देश। |

