Friday, July 3, 2026
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Hindu Prayer: स्कूलों में भोजन मंत्र और ‘गायत्री मंत्र’ का सरकारी आदेश हुआ जारी…धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर यह टिप्पणी वाला केस पढ़िए

Hindu Prayer: भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र और नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने यह अत्यंत महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने अब्दुल सलाम रिज़वी व अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य के मामले में सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। यह याचिका राज्य सरकार के उस हालिया सर्कुलर (परिपत्र) को चुनौती देते हुए दायर की गई थी, जिसमें सभी सरकारी स्कूलों में सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र और अन्य हिंदू प्रार्थनाओं को अनिवार्य किया गया था। सरकारी स्कूलों में किसी भी बच्चे को हिंदू धार्मिक प्रार्थनाएं गाने या उनका पाठ करने के लिए विवश नहीं किया जा सकता।

मामला क्या है?: स्कूलों में भोजन मंत्र और ‘गायत्री मंत्र’ का सरकारी आदेश

यह विवाद छत्तीसगढ़ सरकार के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा 12 जून 2026 को जारी एक सर्कुलर से शुरू हुआ था।

सर्कुलर के अनिवार्य नियम: राज्य सरकार ने प्रदेश के सभी शासकीय विद्यालयों को निर्देश दिया था कि वे दैनिक प्रार्थना सभा में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के साथ-साथ ‘दीप मंत्र’, ‘सरस्वती वंदना’ और ‘गुरु मंत्र’ का पाठ अनिवार्य रूप से कराएं। इसके अलावा, मिड-डे मील (मध्याह्न भोजन) के समय ‘भोजन मंत्र’ तथा स्कूल की छुट्टी होने से ठीक पहले ‘गायत्री मंत्र’ और ‘शांति मंत्र’ का पाठ कराना भी अनिवार्य किया गया था।

संविधान को चुनौती: छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल सलाम रिज़वी, पूर्व अल्पसंख्यक विभाग के अध्यक्ष महेंद्र छाबड़ा और बिलासपुर के सामाजिक कार्यकर्ता शफीक अहमद ने इस आदेश की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं के वकीलों (एडवोकेट आमिर खान और सितारा खान) ने दलील दी कि सरकारी पैसे से चलने वाले स्कूलों में किसी एक धर्म विशेष की मान्यताओं को थोपना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।

याचिकाकर्ताओं के मुख्य विधिक तर्क

हाई कोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ताओं ने भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों का हवाला देते हुए कई बिंदु रखे।

धार्मिक तटस्थता का उल्लंघन: याचिका में कहा गया कि सरकारी स्कूलों में सरस्वती वंदना और गायत्री मंत्र को अनिवार्य करना सीधे तौर पर ‘धार्मिक शिक्षा’ देने और एक विशिष्ट धर्म को बढ़ावा देने जैसा है, जो राज्य की धार्मिक तटस्थता (Religious Neutrality) के सिद्धांत के विपरीत है।

विवेक की स्वतंत्रता पर चोट: सर्कुलर में उन छात्रों के लिए कोई छूट (Exemption Mechanism) या सुरक्षा उपाय नहीं दिए गए थे, जो अपनी आस्था या अंतरात्मा की आवाज (Freedom of Conscience) के कारण इन धार्मिक गतिविधियों में भाग नहीं लेना चाहते।

असमान वर्गीकरण: किसी एक धर्म की प्रार्थनाओं को शामिल करना और अन्य सभी धर्मों को बाहर रखना, धर्म के आधार पर एक अस्वीकार्य और भेदभावपूर्ण वर्गीकरण पैदा करता है।

हाई कोर्ट का रुख और सरकार का बयान

सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से अदालत में यह आधिकारिक बयान (Submission) दर्ज कराया गया कि भले ही यह सर्कुलर जून की शुरुआत में जारी किया गया था, लेकिन अभी तक इसे जमीनी स्तर पर लागू (Implement) करना शुरू नहीं किया गया है। राज्य सरकार के इस बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद ने याचिका को टिप्पणियों के साथ बंद (Close) कर दिया।

दबाव बनाने पर होगी कार्रवाई: कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को यह पूरी स्वतंत्रता (Liberty) दी है कि यदि भविष्य में राज्य के किसी भी सरकारी स्कूल में किसी भी बच्चे को इन प्रार्थनाओं या मंत्रों को पढ़ने के लिए बाध्य या मजबूर (Compelled) किया जाता है, तो वे तुरंत दोबारा हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

अदालत का आश्वासन: पीठ ने साफ तौर पर आगाह किया कि यदि भविष्य में ऐसी किसी भी जबरदस्ती या दबाव की बात अदालत के संज्ञान में आती है, तो दोषी अधिकारियों और स्कूलों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

केस मैट्रिक्स: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का आदेश (जुलाई 2026)

विधिक और प्रशासनिक श्रेणियांछत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति
संबंधित अदालतछत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर
माननीय न्यायाधीशजस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद (एकल पीठ)
केस संदर्भअब्दुल सलाम रिज़वी व अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (Abdul Salam Rizvi v State of CG)
मुख्य चुनौती12 जून 2026 के सरकारी सर्कुलर द्वारा स्कूलों में गायत्री मंत्र और सरस्वती वंदना की अनिवार्यता।
याचिकाकर्ताओं के वकीलएडवोकेट आमिर खान और एडवोकेट सितारा खान
अदालत का अंतिम निर्णयसरकार के ‘अभी लागू न करने’ के बयान पर याचिका बंद; किसी भी छात्र को धार्मिक प्रार्थना के लिए मजबूर करने पर रोक और भविष्य में दोबारा कोर्ट आने की छूट।
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