Friday, October 2, 2026
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Right to be Forgotten: दिव्यांग पक्षकारों की निजता की सुरक्षा के लिए नीति बनाए…कोर्ट ऑर्डर्स से दिव्यांगता और व्यक्तिगत जानकारी को धुंधला करें

Right to be Forgotten: दिल्ली हाईकोर्ट ने देश की कानूनी प्रणाली में मानवीय संवेदना और निजता के अधिकार (Right to Privacy) को बढ़ावा देने वाला एक बड़ा कदम उठाया है।

दिल्ली हाई कोर्ट के प्रशासनिक विंग को मुद्दा भेजा गया

हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने इस मुद्दे को “अत्यंत महत्वपूर्ण” (Seminal Importance) बताते हुए मामले को दिल्ली हाई कोर्ट के प्रशासनिक विंग (Administrative Side) के पास भेज दिया है, ताकि इस संबंध में एक पुख्ता नीतिगत निर्णय लिया जा सके। कहा, अदालत ने स्पष्ट किया है कि अदालतों का दरवाजा खटखटाने वाले दिव्यांग व्यक्तियों (Persons with Disabilities) की व्यक्तिगत जानकारी और पहचान को सार्वजनिक डोमेन में आने से रोकने के लिए एक व्यापक प्रशासनिक नीति और गाइडलाइंस बनाई जानी चाहिए।

मामला क्या है?: अदालत के रिकॉर्ड में दिव्यांगता की जानकारी सार्वजनिक होने का विवाद

सिंगल जज का पुराना फैसला: यह पूरा मामला एक दिव्यांग व्यक्ति द्वारा दायर अपील से जुड़ा है। याचिकाकर्ता (एक दिव्यांग व्यक्ति) ने पहले हाई कोर्ट के एक एकल न्यायाधीश (Single-Judge) के समक्ष याचिका दायर कर मांग की थी कि अदालती दस्तावेजों और इंटरनेट पर मौजूद कोर्ट ऑर्डर्स से उसकी दिव्यांगता और व्यक्तिगत जानकारी को धुंधला (Redact/Mask) कर दिया जाए। हालांकि, तब सिंगल जज ने यह कहकर याचिका खारिज कर दी थी कि किसी स्थापित या बाध्यकारी नीति (Binding Policy) के अभाव में, कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करके खुद ऐसा कोई अधिकार नहीं बना सकता।

डिवीजन बेंच में अपील: सिंगल जज के इस फैसले को पीड़ित ने डिवीजन बेंच (खंडपीठ) के समक्ष चुनौती दी। याचिकाकर्ता की तरफ से विख्यात दिव्यांग अधिकार अधिवक्ता राहुल बजाज पेश हुए।

हाई कोर्ट का रुख: दिव्यांगों की गरिमा और निजता सर्वोपरि

चीफ जस्टिस डी.के. उपाध्याय की अगुवाई वाली खंडपीठ ने सिंगल जज के तकनीकी रुख से आगे बढ़ते हुए माना कि नीति की कमी को एक प्रशासनिक प्रक्रिया के जरिए तुरंत सुधारा जाना चाहिए। अदालत ने अपने आदेश में कहा, इन तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, हमारा मानना है कि इस अदालत को अपने प्रशासनिक स्तर पर एक व्यापक नीतिगत निर्णय लेने और उचित दिशानिर्देश तैयार करने की आवश्यकता है। इसका उद्देश्य उन व्यक्तियों की निजता के अधिकार (Right to Privacy) को सुरक्षित करना है जो किसी न किसी प्रकार की दिव्यांगता से पीड़ित हैं और अदालती रिकॉर्ड में अपनी पहचान या खुद से जुड़ी संवेदनशील जानकारी को छिपाना (Mask/Redact) चाहते हैं। अदालत ने इस आदेश की प्रति हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है, ताकि इस नीति को जल्द से जल्द तैयार किया जा सके। कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और कुछ कानूनी वेब पोर्टल्स को भी नोटिस जारी किया है।

क्या है ‘भूल जाने का अधिकार’ (Right to be Forgotten)?

यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में ‘भूल जाने के अधिकार’ को कानूनी मान्यता दी है। जस्टिस सचिन दत्ता ने एक अन्य ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया था। कहा, यदि इंटरनेट या ऑनलाइन न्यायिक रिकॉर्ड पर किसी व्यक्ति की संवेदनशील जानकारी लगातार उपलब्ध रहने से उसकी निजता, गरिमा (Dignity) और सामाजिक प्रतिष्ठा (Reputation) को अपूरणीय या असमान नुकसान (Disproportionate Harm) पहुंचता है, तो वह व्यक्ति उस डेटा को हटवाने या धुंधला (Mask) करवाने की मांग कर सकता है। अदालती फैसलों में पारदर्शिता (Open Court Principle) जरूरी है, लेकिन इसे किसी नागरिक के सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार की कीमत पर लागू नहीं किया जा सकता, विशेषकर संवेदनशील श्रेणियों (जैसे दिव्यांगता, वैवाहिक विवाद या यौन अपराध) के मामलों में।

अदालत का अगला कदम

दिल्ली हाई कोर्ट की खंडपीठ इस नीति की प्रगति और दिशानिर्देशों के मसौदे की समीक्षा करने के लिए २९ सितंबर को इस मामले पर दोबारा सुनवाई करेगी।

केस मैट्रिक्स: दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश (Case Summary)

विधिक और प्रशासनिक श्रेणियांदिल्ली उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति (जुलाई 2026)
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली
माननीय न्यायाधीशकार्यवाहक सीजे देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया
मूल विधिक मुद्दाकोर्ट रिकॉर्ड में दिव्यांग पक्षकारों (Disabled Litigants) की निजता और पहचान की सुरक्षा।
संबद्ध विधिक सिद्धांत‘भूल जाने का अधिकार’ (Right to be Forgotten) और सम्मान का अधिकार।
याचिकाकर्ता के वकीलएडवोकेट राहुल बजाज
रजिस्ट्रार जनरल के वकीलएडवोकेट सौरभ सेठ और नीलमप्रीत कौर
अदालत का अंतिम निर्देशहाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को प्रशासनिक स्तर पर गाइडलाइंस बनाने का आदेश; अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को।
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