Nikah Halala: मजहबी रीतियों के नाम पर महिलाओं और नाबालिगों के यौन शोषण पर कड़ा प्रहार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह बेहद महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी है।
देश के आपराधिक कानून की बाता आती है तो पर्सनल लॉ कोई स्थान नहीं रखता
हाईकोर्ट के जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने इस ऐतिहासिक 19 पन्नों के फैसले में उन 9 आरोपियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (FIR) को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया, जिन पर एक पीड़िता के साथ नाबालिग की उम्र में ‘हलाला’ के नाम पर और बाद में बालिग होने पर ‘डबल हलाला’ के बहाने सामूहिक बलात्कार (Gang Rape) करने का संगीन आरोप है। अदालत ने कहा, जब बात देश के आपराधिक कानून (Criminal Law) की आती है, तो उसमें विवाह या मजहब को नियंत्रित करने वाले ‘पर्सनल लॉ’ (Personal Laws) के लिए कोई स्थान नहीं बचता।
यह रही पॉक्सो एक्ट पर अदालत की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने टिप्पणी किया कि यदि वैवाहिक संबंधों की आड़ में कोई गंभीर अपराध किया जाता है, तो कानून अपनी पूरी सख्ती से काम करेगा। निकाह हलाला (Nikah Halala) जैसी किसी प्रथा या परंपरा की आड़ में यदि किसी नाबालिग लड़की (Minor Girl) के साथ शारीरिक संबंध बनाए जाते हैं, तो वह सीधे तौर पर पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) के तहत बलात्कार का गंभीर अपराध है, भले ही उसमें लड़की की सहमति का दावा क्यों न किया जा रहा हो।”
मामला क्या है?: एक दशक लंबा शोषण, ‘ट्रिपल तलाक’ और ‘डबल हलाला’ का खौफनाक चक्र
अदालत के सामने आई एफआईआर (FIR) की कहानी किसी भी सभ्य समाज को झकझोरने वाली है, जिसमें एक महिला को एक दशक तक धार्मिक प्रथाओं के नाम पर हवस का शिकार बनाया गया।
नाबालिग की उम्र में निकाह और तलाक: पीड़िता का विवाह अप्रैल 2015 में मुख्य आरोपी (अजहर नवाज) से हुआ था, तब उसकी उम्र महज 15 साल थी। जनवरी 2016 में पति ने उसे ‘ट्रिपल तलाक’ (तलाक-ए-बिद्त) दे दिया।
पहला हलाला (2016): कुछ महीनों बाद पति ने दोबारा निकाह की इच्छा जताई और इसके लिए ‘निकाह हलाला’ की शर्त रखी। नवंबर 2016 में एक मौलाना (कय्यूम) के साथ उसका हलाला कराया गया। उस समय पीड़िता की उम्र करीब 16 साल (नाबालिग) थी। मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज बयान (धारा 183 BNSS) में पीड़िता ने कहा कि उस समय वह ‘हलाला’ का मतलब भी नहीं समझती थी और उसके साथ जबरन बलात्कार किया गया था। इसके बाद 2017 में उसका अपने पहले पति से दोबारा निकाह हुआ।
दूसरा तलाक और ‘डबल हलाला’ (2025): चार साल बाद पति ने उसे फिर तलाक दे दिया और दूसरी शादी कर ली। लेकिन जब दूसरी पत्नी से बच्चा नहीं हुआ, तो पति और उसके भाइयों ने पीड़िता को बहला-फुसलाकर वापस बुलाया। उन्होंने कहा कि चूंकि रिश्ता दो बार टूटा है, इसलिए इस बार “दो बार हलाला” (Double Halala) करना होगा।
सामूहिक बलात्कार और फर्जी निकाह: इसी बहाने 19 फरवरी 2025 को पति के भाइयों और भतीजों ने पीड़िता और उसकी बेटी को जान से मारने की धमकी देकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार (Gang Rape) किया। उसी शाम, एक पूरी तरह से फर्जी निकाह का नाटक रचा गया ताकि पति उसके साथ धोखे से शारीरिक संबंध बनाए रख सके।
हाई कोर्ट का रुख: “यह एक आपराधिक उद्यम (Enterprise) है, पर्सनल लॉ कोई ढाल नहीं”
बचाव पक्ष के वरिष्ठ वकील शशि कांत शुक्ला ने दलील दी थी कि 2016 में शरिया कानून के तहत ट्रिपल तलाक वैध था और मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक नाबालिग का निकाह शून्य (Void) नहीं, बल्कि केवल ‘शून्यकरणीय’ (Voidable) होता है, जिसे बालिग होने पर महिला ने चुनौती नहीं दी। उन्होंने इसे संपत्ति और बच्चे की कस्टडी के विवाद से प्रेरित बताया। इन दलीलों को पूरी तरह खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने निम्नलिखित मार्गदर्शक विधिक सिद्धांत तय किए।
पॉक्सो (POCSO) के सामने पर्सनल लॉ बेअसर
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ’ का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि देश की शीर्ष अदालत ने पॉक्सो अधिनियम को सभी पर्सनल लॉ पर ‘ओवरराइडिंग इफेक्ट’ (सर्वोपरि प्रभाव) दिया है। कानूनन 18 वर्ष से कम उम्र की किसी भी लड़की के साथ बनाए गए शारीरिक संबंध अनिवार्य रूप से बलात्कार की श्रेणी में आते हैं। कोर्ट ने नोट किया कि नए आपराधिक कानून की भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 के अपवाद 2 में भी अब इस सुरक्षात्मक विधिक प्रावधान को पूरी तरह संहिताबद्ध (Codified) कर दिया गया है।
‘हलाला’ के नाम पर क्रूर और विचित्र गैंगरेप
अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया (Prima Facie) यह मामला पहले एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार करने और बाद में उसी धार्मिक आड़ में उसके साथ “कहीं अधिक क्रूर, आदिम और विचित्र तरीके” (Crude and Outlandish manner) से सामूहिक बलात्कार करने का है। आपराधिक कृत्यों को छिपाने के लिए पर्सनल लॉ का इस्तेमाल ‘सुरक्षा कवच’ की तरह नहीं किया जा सकता।
निकाह कराने वाले काजी और रिश्तेदार भी समान रूप से दोषी
कोर्ट ने इस तर्क को भी ठुकरा दिया कि निकाह कराने वाले काजी (Qazi) या दूर के बुजुर्ग रिश्तेदारों की इस मामले में मामूली भूमिका थी। खंडपीठ ने कहा, यह सभी आरोपियों द्वारा मिलकर चलाया जा रहा एक ‘आपराधिक उद्यम’ (Enterprise) प्रतीत होता है, जहां हर किसी ने अपनी तय भूमिका निभाई। इन सभी की भूमिकाएं मिलकर कानून के तहत बेहद गंभीर अपराधों का निर्माण करती हैं, जिसकी गहन पुलिस जांच (Thorough Investigation) होना अनिवार्य है।
अदालत का अंतिम आदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने माना कि प्राथमिकी (FIR) में लगाए गए आरोप बेहद गंभीर हैं और इनमें किसी भी स्तर पर हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने आरोपियों की तरफ से दायर सभी विधिक रिट याचिकाओं को पूरी तरह से खारिज (Dismiss) कर दिया और पुलिस को जांच जारी रखने की हरी झंडी दी।
केस मैट्रिक्स: इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश (2026)
| विधिक और सामाजिक श्रेणियां | अदालत द्वारा तय की गई कानूनी स्थिति |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ |
| लागू मूल कानून | पॉक्सो एक्ट (POCSO), भारतीय न्याय संहिता (BNS), और मुस्लिम महिला अधिनियम 2019 |
| मुख्य कानूनी टकराव | मुस्लिम पर्सनल लॉ (निकाह हलाला) बनाम भारत का आपराधिक कानून (POCSO/BNS) |
| न्यायालय का मुख्य निष्कर्ष | आपराधिक मामलों में पर्सनल लॉ का कोई स्थान नहीं; 18 वर्ष से कम उम्र में हलाला सीधे पॉक्सो के तहत अपराध है। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | प्राथमिकी (FIR) रद्द करने से इनकार; सभी याचिकाएं खारिज। |

