मामला सारांश (At a Glance)
| पहलू | विवरण |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति संदीप मेहता |
| याचिकाकर्ता | वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा |
| मुख्य निर्णय | फांसी द्वारा मृत्युदंड के वैधानिक प्रावधान को बरकरार रखा गया; ज़हरीले इंजेक्शन को बेहतर विकल्प मानने की याचिका खारिज। |
| प्रमुख आधार | ज़हरीले इंजेक्शन के विफल होने का जोखिम और इसके अधिक मानवीय होने के ठोस वैज्ञानिक प्रमाणों का अभाव। |
Hanging Method-I: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने माना है कि ऐसा कोई ठोस वैज्ञानिक साक्ष्य या सामग्री मौजूद नहीं है जो यह साबित कर सके कि मृत्युदंड (Death Sentence) के निष्पादन के लिए ज़हरीला इंजेक्शन (Lethal Injection) देना फांसी पर लटकाने की तुलना में अधिक मानवीय या बेहतर तरीका है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ (Justice Vikram Nath) और न्यायमूर्ति संदीप मेहता (Justice Sandeep Mehta) की पीठ ने कानून में फांसी द्वारा मृत्युदंड देने के प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
Hanging Method: अदालत की मुख्य टिप्पणियां और निष्कर्ष
- कोई विशिष्ट वैज्ञानिक लाभ नहीं:“उपलब्ध सामग्री से यह साबित नहीं होता है कि मृत्युदंड के निष्पादन के तरीके के रूप में ज़हरीले इंजेक्शन का फांसी पर कोई अतिरिक्त लाभ है। इसलिए याचिकाकर्ता का यह तर्क कि ज़हरीला इंजेक्शन एक बेहतर और अधिक मानवीय तरीका है, पूरी तरह से अमान्य है।”
- 1983 के ‘दीना बनाम भारत संघ’ (Deena v. Union of India) फैसले का हवाला
- कोर्ट ने कहा कि 1983 में 3 जजों की पीठ पहले ही बिजली के झटके (Electrocution), ज़हरीली गैस, गोली मारने और ज़हरीले इंजेक्शन जैसे विभिन्न तरीकों की जांच कर चुकी है। तब भी यह निष्कर्ष निकाला गया था कि फांसी की तुलना में किसी अन्य तरीके का कोई स्पष्ट या प्रदर्शन योग्य लाभ नहीं है।
Hanging Method: सुनवाई के दौरान प्रस्तुत प्रमुख तर्क
- याचिकाकर्ता का पक्ष: वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने तर्क दिया कि नसों के माध्यम से ज़हरीला इंजेक्शन देना फांसी की तुलना में अधिक वैज्ञानिक, मानवीय और दर्द रहित तरीका है।
- अटॉर्नी जनरल और प्रोजेक्ट 39A का विरोध
- प्रोजेक्ट 39A (NLU दिल्ली): वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने अमेरिकी आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 1890 से 2010 के बीच अमेरिका में लगभग 9,000 निष्पादनों में से करीब 276 मामले विफल (Botched Executions) रहे। उन्होंने बताया कि यदि पहला इंजेक्शन (बेहोशी का) सही काम न करे, तो पैरालिटिक दवा के कारण व्यक्ति बाहर से शांत दिखता है लेकिन अंदर से असहनीय दर्द सहन करता है।
- अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी: AG ने प्रस्तुत किया कि भारत में मौजूदा व्यवस्था (फांसी) के तहत निष्पादन विफल होने का एक भी उदाहरण नहीं है, जबकि अमेरिका में ज़हरीले इंजेक्शन के कई मामले खराब साबित हुए हैं (जैसे फरवरी 2024 में थॉमस क्रीच का मामला, जहां 2 घंटे तक नस न मिलने पर निष्पादन रद्द करना पड़ा था)।

