Academic Records: केरल हाईकोर्ट ने कहा, किसी भी छात्र के मूल शैक्षणिक रिकॉर्ड (Original Academic Records) उसकी निजी संपत्ति (Personal Property) होते हैं।
छात्रों के मूल सर्टिफिकेट को हथियार न बनाएं: अदालत
देश भर के कई कॉलेजों और शिक्षण संस्थानों द्वारा फीस वसूली के लिए छात्रों के मूल सर्टिफिकेट को ‘हथियार’ बनाने की मनमानी प्रवृत्ति पर करारा प्रहार करते हुए केरल हाईकोर्ट ने यह ऐतिहासिक और छात्रों के हक में बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट के जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस की एकल पीठ ने अपने स्पष्ट और कड़े आदेश में संबंधित कॉलेज को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता छात्रा के सभी मूल शैक्षणिक प्रमाण पत्र और रिकॉर्ड बिना किसी देरी के तुरंत वापस करे।
यह भी रही अदालत की टिप्पणी
अदालत ने कहा, किसी शिक्षण संस्थान को बकाया फीस या किसी अन्य वित्तीय विवाद के नाम पर इन दस्तावेजों पर कानूनी धारणाधिकार (No Lien) जताने या उन्हें अपने पास गिरवी रखने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। यदि कोई कॉलेज किसी भी कारण से छात्र के मूल प्रमाण पत्र रोककर रखता है, तो इसका सीधा और विनाशकारी असर छात्र के भविष्य और करियर पर पड़ता है। कानून किसी भी संस्थान को इस बात की इजाजत नहीं देता कि वह छात्र द्वारा कोर्स पूरा करने या बीच में एडमिशन रद्द कराने के बाद उसके दस्तावेज बंधक बनाकर रखे।
मामला क्या है?: बीच में पढ़ाई छोड़ी, तो कॉलेज ने सर्टिफिकेट को बनाया ‘बंधक’
यह कानूनी विवाद एक छात्रा द्वारा कॉलेज से अपना एडमिशन रद्द कराने और उसके बदले कॉलेज द्वारा उसके मूल प्रमाण पत्र (Original Certificates) रोके जाने से जुड़ा है।
एडमिशन और पढ़ाई छोड़ना: छात्रा ने प्रवेश परीक्षा (Entrance Exam) और उसके बाद हुई सीट अलॉटमेंट प्रक्रिया के जरिए एक कॉलेज (केरल स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय से संबद्ध) में प्रवेश लिया था। लेकिन एडमिशन लेने के बाद, कुछ ऐसी परिस्थितियां बनीं जो “उसके नियंत्रण से बाहर थीं” (Reasons beyond her control), जिसके कारण उसे कॉलेज में अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी।
सर्टिफिकेट वापसी की मांग: पढ़ाई छोड़ने के बाद छात्रा ने कॉलेज प्रशासन से अपने जमा किए गए मूल दस्तावेज—जैसे मार्कशीट, ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC), आचरण प्रमाण पत्र (Conduct Certificate) और अन्य शैक्षणिक रिकॉर्ड वापस मांगे।
कॉलेज की मनमानी और दलील: कॉलेज प्रशासन ने छात्रा के दस्तावेज लौटाने से साफ इनकार कर दिया। कॉलेज ने कोर्ट में अपनी दलील में कहा कि छात्रा और उसकी मां के अनुरोध पर उन्हें ₹1.5 लाख की फीस चुकाने के लिए समय दिया गया था। कॉलेज के मुताबिक, कुल देय राशि में से छात्रा ने केवल ₹68,116 का ही भुगतान किया था। कई बार रिमाइंडर भेजने के बावजूद जब बकाया राशि नहीं चुकाई गई, तो मजबूरी में कॉलेज को उसके मूल दस्तावेज अपने पास रोकने पड़े।
हाई कोर्ट का रुख: फीस वसूली के लिए अलग कानूनी रास्ता अपनाएं, करियर से न खेलें
जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस ने कॉलेज की दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए इस मामले में बेहद स्पष्ट विधिक सिद्धांत तय किए। कोर्ट के मुख्य विधिक निष्कर्ष इस प्रकार हैं।
सर्टिफिकेट ‘निजी संपत्ति’ हैं, उन पर संस्थान का कोई ‘लियन’ (Lien) नहीं
अदालत ने स्पष्ट किया कि शैक्षणिक प्रमाण पत्र छात्र की अपनी मेहनत से अर्जित की गई ‘निजी संपत्ति’ होते हैं। कोई भी कॉलेज या विश्वविद्यालय किसी व्यापारिक अनुबंध की तरह इन दस्तावेजों पर ‘लियन’ (किसी ऋण की वसूली के लिए संपत्ति को कब्जे में रखने का कानूनी अधिकार) का दावा नहीं कर सकता।
छात्र के भविष्य पर पड़ता है गंभीर असर
खंडपीठ ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि यदि कोई शिक्षण संस्थान किसी छात्र के मूल प्रमाण पत्र अपने पास रोक लेता है, तो वह छात्र न तो कहीं और उच्च शिक्षा के लिए आवेदन कर सकता है और न ही किसी नौकरी के लिए। किसी वित्तीय विवाद के कारण छात्र के भविष्य की संभावनाओं (Future Prospects) को अंधकार में नहीं डाला जा सकता।
बकाया फीस के लिए कानूनी मंच का रुख करे कॉलेज
अदालत ने माना कि कॉलेज का बकाया फीस का दावा अपनी जगह हो सकता है, लेकिन उस दावे को वसूलने का तरीका सर्टिफिकेट रोकना नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा, भले ही कॉलेज का बकाया फीस के संबंध में कोई दावा बनता हो, लेकिन उन मुद्दों को कानून द्वारा निर्धारित उचित विधिक मंच (Proper Forum) के समक्ष ही उठाया जाना चाहिए। छात्रा पर बकाया फीस का कथित आरोप इस बात को कतई उचित नहीं ठहरा सकता कि कॉलेज उसके मूल शैक्षणिक रिकॉर्ड को अपने कब्जे में रखे।
एडमिशन प्रॉस्पेक्टस (Prospectus) के नियमों का उल्लंघन
सुनवाई के दौरान सरकारी वकील (Government Advocate) उन्नी सेबेस्टियन कप्पेन ने कोर्ट को बताया कि प्रवेश से संबंधित ‘प्रॉस्पेक्टस’ के स्पष्ट नियमों के अनुसार, कोई भी शिक्षण संस्थान छात्र के मूल दस्तावेजों को अपने पास रोककर नहीं रख सकता और एडमिशन रद्द होने की स्थिति में उन्हें 7 दिनों के भीतर लौटाना अनिवार्य है। कोर्ट ने भी माना कि प्रॉस्पेक्टस के तहत कॉलेज को दस्तावेज रोकने का कोई अधिकार नहीं है।
अदालत का अंतिम आदेश
केरल हाई कोर्ट ने कॉलेज को सख्त निर्देश दिया कि छात्रा जब भी अपने प्रमाण पत्र लेने के लिए कॉलेज आए, तो प्रवेश के समय उसके द्वारा जमा किए गए सभी मूल शैक्षणिक रिकॉर्ड उसे तुरंत और बिना किसी शर्त के लौटाए जाएं।
केस मैट्रिक्स: केरल हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला (जुलाई 2026)
| विधिक और शैक्षणिक श्रेणियां | केरल उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति |
| संबंधित अदालत | केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court), कोच्चि |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस (एकल पीठ) |
| फैसले की तिथि | 2 जुलाई 2026 |
| विवाद का विषय | बकाया फीस (₹1.5 लाख में से ₹68,116 का भुगतान) के कारण मूल सर्टिफिकेट रोकना |
| सरकारी नियम (Prospectus) | संस्थानों द्वारा 7 दिन के भीतर मूल प्रमाण पत्र लौटाना अनिवार्य |
| न्यायालय का मुख्य सिद्धांत | शैक्षणिक रिकॉर्ड छात्र की ‘निजी संपत्ति’ हैं; कॉलेज उन पर धारणाधिकार (Lien) नहीं रख सकते। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | छात्रा के हक में फैसला; कॉलेज को तुरंत सभी मूल प्रमाण पत्र वापस करने का निर्देश। |

