Worship Act: काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के विस्तार से जुड़े एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक विधिक व्यवस्था दी है।
हाईकोर्ट जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार की खंडपीठ ने वाराणसी के दालमंडी क्षेत्र के दुकानदारों और किरायेदारों द्वारा दायर की गई याचिकाओं को पूरी तरह खारिज (Dismiss) करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाओं में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के सुंदरीकरण और चौड़ीकरण परियोजना के तहत दालमंडी मार्ग पर स्थित छह प्राचीन मस्जिदों के अधिग्रहण और प्रशासनिक कार्रवाई को चुनौती दी गई थी।
यह है पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 का उद्देश्य
अदालत ने कहा, पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 (Places of Worship Act, 1991) का मुख्य उद्देश्य किसी धार्मिक स्थल के मूल स्वरूप को दूसरे धर्म में बदलने (Conversion) से रोकना है। यह कानून राज्य सरकार को जनहित, बुनियादी ढांचे के विकास या सड़कों के चौड़ीकरण जैसे धर्मनिरपेक्ष और सार्वजनिक कार्यों (Secular & Public Purposes) के लिए भूमि अधिग्रहण करने से नहीं रोकता है। संप्रभुता के सिद्धांत (Doctrine of Eminent Domain) के तहत सरकार के पास उचित मुआवजा देकर जनहित में किसी भी संपत्ति, चाहे वह धार्मिक ही क्यों न हो, अधिग्रहित करने का पूर्ण अधिकार है।
मामला क्या है?: काशी कॉरिडोर विस्तार और दालमंडी की 6 मस्जिदें
यह पूरा विवाद वाराणसी के प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर से करीब 800 मीटर पूर्व में स्थित व्यावसायिक क्षेत्र ‘दालमंडी स्ट्रीट’ के कायाकल्प से जुड़ा है।
प्रशासनिक योजना (वर्ष 2025): उत्तर प्रदेश सरकार ने 31 मार्च 2025 और 30 जुलाई 2025 को आदेश जारी कर दालमंडी मार्ग के चौड़ीकरण और सुंदरीकरण के लिए ₹21,588.24 लाख (लगभग 215 करोड़ रुपये) का बजट आवंटित किया था।
याचिकाकर्ताओं की आपत्ति: दालमंडी बाजार के 6 किरायेदारों और दुकानदारों ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर मांग की थी कि उन्हें वहां से बेदखल न किया जाए। उन्होंने दलील दी कि इस परियोजना के तहत क्षेत्र की 6 प्राचीन मस्जिदों को अधिग्रहित कर ढहाने की योजना है, जिससे हजारों लोगों की आजीविका छिन जाएगी।
लक्षित मस्जिदें: जिन छह मस्जिदों के अधिग्रहण को चुनौती दी गई थी, वे हैं: अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद, मस्जिद रंगीले शाह, मस्जिद अली रजा खान, मस्जिद करीमुल्लाह बेग, मस्जिद निसारन, और मस्जिद संगमरमर।
1991 के कानून की दलील: याचिकाकर्ताओं ने मुख्य कानूनी दांव खेलते हुए तर्क दिया कि ये मस्जिदें 15 अगस्त 1947 से पहले से अस्तित्व में हैं। इसलिए ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991’ के तहत इनके धार्मिक चरित्र को फ्रीज (स्थिर) किया जा चुका है और सरकार इन्हें अधिग्रहित या क्षतिग्रस्त नहीं कर सकती। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह कार्रवाई एक विशेष समुदाय को निशाना बनाने के लिए की जा रही है, जिसे कोर्ट ने बेहद “अजीब दलील” (Odd Pleadings) करार दिया।
हाई कोर्ट का रुख: राज्य सर्वोपरि मालिक है, संप्रभु अधिकार कम नहीं होते
32 पन्नों के अपने विस्तृत आदेश में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कानून की रचनात्मक और सामंजस्यपूर्ण व्याख्या (Harmonious Construction) करते हुए याचिकाकर्ताओं के सभी दावों को ध्वस्त कर दिया। कोर्ट के मुख्य विधिक बिंदु इस प्रकार हैं।
रूपांतरण (Conversion) और अधिग्रहण (Acquisition) में अंतर
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि 1991 के अधिनियम की धारा 3 और 4 केवल यह कहती है कि किसी एक धार्मिक संप्रदाय के पूजा स्थल को दूसरे धार्मिक संप्रदाय (जैसे मंदिर को मस्जिद या मस्जिद को चर्च) में बदला नहीं जा सकता। लेकिन यह कानून राज्य को जन कल्याण के लिए जमीन लेने से नहीं रोकता। कहा, 1991 के अधिनियम का उद्देश्य राज्य को भारत के क्षेत्र में सभी भूमियों के सर्वोपरि स्वामी (Paramount Owner) के रूप में उसके संप्रभु अधिकार से वंचित करना नहीं है। उचित मुआवजा देकर जनहित में भूमि का उपयोग करना ‘एमिनेंट डोमेन’ (Eminent Domain) का सिद्धांत है और 1991 का कानून इस अधिकार को कम नहीं करता।
किरायेदार और आम नमाजी का कोई कानूनी हक (Locus Standi) नहीं
अदालत ने याचिकाकर्ताओं के कानूनी अधिकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि वे संबंधित संपत्तियों के केवल किरायेदार (Tenants) हैं, मालिक नहीं। वे अपने व्यापार और आजीविका को बचाने के लिए मस्जिद का सहारा ले रहे हैं। कोर्ट ने नोट किया कि इन मस्जिदों के वास्तविक मालिकाना हक रखने वाले ‘मुतवल्ली’ (प्रबंधक) या ‘वक्फ बोर्ड’ ने इस अधिग्रहण को चुनौती नहीं दी है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि केवल मुस्लिम होने के नाते ये किरायेदार मस्जिदों की तरफ से मुकदमा लड़ने का अधिकार नहीं पा जाते। वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी पंजीकृत मुतवल्ली और वक्फ बोर्ड की होती है।
भूमि अधिग्रहण कानून 2013 और वक्फ एक्ट सर्वोपरि
राज्य सरकार की दलीलों को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने माना कि RFCTLARR अधिनियम, 2013 (भूमि अधिग्रहण कानून) के तहत सरकार के पास सड़क, राजमार्ग या सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए किसी भी धार्मिक संपत्ति को अधिग्रहित करने की संप्रभु शक्ति है। इसके अलावा, वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 51 और 91 भी उचित प्रक्रिया के तहत ऐसी वक्फ संपत्तियों के अधिग्रहण की अनुमति देती हैं।
‘इस्माइल फारूकी’ ऐतिहासिक जजमेंट का हवाला
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘डॉ. एम. इस्माइल फारूकी बनाम भारत संघ’ का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने व्यवस्था दी थी कि मस्जिद इस्लाम धर्म के पालन का कोई अनिवार्य हिस्सा (Essential Practice) नहीं है। मुस्लिम समुदाय के लोग कहीं भी, यहां तक कि खुले आसमान के नीचे भी नमाज अदा कर सकते हैं। इसलिए जनहित में राज्य द्वारा इसका अधिग्रहण संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन नहीं है।
अदालत का अंतिम आदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं के पास राहत पाने का कोई ठोस विधिक कारण (Cause of Action) नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि उसकी ये टिप्पणियां केवल इन किरायेदारों की याचिका के संदर्भ में हैं। इससे राज्य सरकार, वक्फ बोर्ड और मुतवल्लियों के उन अधिकारों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा जो वे भविष्य में उचित कानूनी मंचों पर उठाना चाहें। इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने रिट याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया।
केस और प्रोजेक्ट मैट्रिक्स: इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | इलाहाबाद उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार की खंडपीठ |
| परियोजना का नाम | श्री काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर विकास (दालमंडी मार्ग चौड़ीकरण) |
| आवंटित बजट | ₹21,588.24 लाख (उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2025 में स्वीकृत) |
| प्रभावित संपत्तियां | दालमंडी क्षेत्र की 6 पंजीकृत वक्फ मस्जिदें |
| मुख्य कानूनी व्याख्या | पूजा स्थल अधिनियम 1991 केवल ‘धार्मिक स्वरूप बदलने’ को रोकता है, ‘सड़क चौड़ीकरण जैसे धर्मनिरपेक्ष सार्वजनिक अधिग्रहण’ को नहीं। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | याचिका पूरी तरह खारिज; सड़क चौड़ीकरण का रास्ता साफ। |

