Monday, July 6, 2026
HomeBNS & BNSS LawLegal Term: कानूनी रूप से अमान्य यानि Per Incuriam क्या है…सुप्रीम कोर्ट...

Legal Term: कानूनी रूप से अमान्य यानि Per Incuriam क्या है…सुप्रीम कोर्ट ने इस पर क्या सिद्धांत तय किए हैं?, विस्तार से समझने की कोशिश करें

Legal Term: न्यायिक अनुशासन (Judicial Discipline) और पूर्व निर्णय के सिद्धांत (Stare Decisis) भारतीय कानूनी व्यवस्था की रीढ़ हैं।

सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने कानूनी सिद्धांत की बारीकियों का किया वर्णन

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने इस कानूनी सिद्धांत की बारीकियों को बेहद स्पष्ट रूप से समझाया है। शीर्ष अदालत ने व्यवस्था दी है कि यह सिद्धांत एक अपवाद है और इसका उपयोग “बेहद कम और असाधारण परिस्थितियों में” ही किया जाना चाहिए। मगर यदि कोई अदालत अपना फैसला सुनाते समय किसी पुराने बड़े या बराबर के बेंच के फैसले की अनदेखी कर देती है, या किसी महत्वपूर्ण वैधानिक प्रावधान (Statutory Provision) पर ध्यान देना भूल जाती है, तो वह फैसला ‘पर इनक्युरियम’ (Per Incuriam – अज्ञानता या असावधानी में लिया गया निर्णय) कहलाएगा। ऐसे त्रुटिपूर्ण फैसले को एक कानूनी नजीर (Precedent) नहीं माना जा सकता और वह कानूनन बाध्यकारी नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत को लागू करते हुए अपने ही साल 2021 के एक फैसले (हरियाणा राज्य बनाम राज कुमार) को ‘पर इनक्युरियम’ (कानूनी रूप से अमान्य) घोषित कर दिया, क्योंकि वह फैसला साल 2010 के एक बड़े तीन-जजों के बेंच के फैसले (हरियाणा राज्य बनाम जगदीश) के सीधे विरोधाभास में था।

आसान भाषा में समझें: क्या होता है ‘पर इनक्युरियम’ (Per Incuriam)?

पर इनक्युरियम एक लैटिन वाक्यांश (Latin Phrase) है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है “असावधानी या अज्ञानता के कारण” (Through Inadvertence/Lack of Care)। भारतीय न्यायपालिका में जब कोई अदालत (चाहे वह हाई कोर्ट हो या सुप्रीम कोर्ट) कोई ऐसा निर्णय दे देती है जो संसद या विधानसभा के किसी लागू कानून/नियम की अनदेखी करके दिया गया हो। उसी अदालत के किसी पुराने समान जजों (Co-equal Bench) या बड़े बेंच (Larger Bench) के स्थापित कानूनी फैसले को बिना देखे या उसके विपरीत जाकर दिया गया हो। तो ऐसे फैसले को कानून की नजर में ‘शून्य’ या ‘कमजोर’ माना जाता है। निचली अदालतें या बाद के बेंच उस गलत फैसले को मानने के लिए बाध्य नहीं होते।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए 5 मुख्य विधिक सिद्धांत

सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले कई ऐतिहासिक फैसलों (जैसे संदीप कुमार बाफना, शाह फैसल और त्रिमूर्ति फ्रैग्रेंस) का हवाला देते हुए इस सिद्धांत के दायरे को स्पष्ट किया है:

बेंच की ताकत (Strength) सर्वोपरि है, जजों की संख्या नहीं

अदालत ने साफ किया कि किसी फैसले की बाध्यता इस बात से तय होती है कि उसे कितने जजों के बेंच (Bench Strength) ने सुना है, न कि इस बात से कि कितने जज किसी एक मत के पक्ष में थे।

उदाहरण: 3 जजों की पीठ का (2:1) के बहुमत का फैसला, 2 जजों की पीठ के (2:0) के सर्वसम्मत फैसले पर हमेशा भारी पड़ेगा और उसे ही कानून माना जाएगा। छोटा बेंच कभी भी बड़े बेंच के फैसले की अवहेलना नहीं कर सकता।

केवल फैसले का सार (Ratio Decidendi) ही प्रभावित होता है

पर इनक्युरियम का सिद्धांत केवल किसी फैसले के मुख्य कानूनी आधार या सार (Ratio Decidendi) पर लागू होता है। जज द्वारा फैसले के दौरान सामान्य रूप से कही गई बातें या टिप्पणियां (Obiter Dicta), इस दायरे में नहीं आतीं।

बराबर के बेंच में असहमति होने पर ‘लार्जर बेंच’ को रैफरल अनिवार्य

यदि दो जजों का कोई बेंच, अपने ही किसी पुराने दो जजों के बेंच के फैसले से असहमत है, तो वह खुद उसके उलट फैसला नहीं सुना सकता। न्यायिक अनुशासन का तकाजा है कि वह मामला विचार के लिए किसी बड़े बेंच (Larger Bench – जैसे 3 या 5 जजों की पीठ) को भेजे।

कब किसी फैसले को ‘पर इनक्युरियम’ नहीं कहा जा सकता?

केवल इसलिए कि किसी फैसले में किसी पुराने जजमेंट का हवाला दिया गया है और कोर्ट किसी सही या गलत निष्कर्ष पर पहुंच गया है, उसे ‘पर इनक्युरियम’ नहीं कहा जा सकता। अगर सामान्य रूप से पढ़ने पर किसी फैसले का पुराने फैसलों के साथ कोई सीधा टकराव नहीं दिखता, तो अदालतों को जबरन उसकी बाल की खाल निकालकर उसे ‘पर इनक्युरियम’ घोषित करने से बचना चाहिए।

बड़े बेंच का फैसला पहले से मौजूद हो, तो नए रेफरेंस की जरूरत नहीं

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी मुद्दे पर पहले से ही एक बड़े बेंच का स्पष्ट फैसला मौजूद है, और किसी छोटे बेंच ने उसके विपरीत आदेश दे दिया है, तो बाद वाले कोर्ट को मामले को फिर से बड़े बेंच को भेजने की जरूरत नहीं है। वे सीधे तौर पर छोटे बेंच के फैसले को ‘पर इनक्युरियम’ घोषित कर बड़े बेंच के पुराने कानून को लागू कर सकते हैं।

संदर्भ मामला: हरियाणा सरकार की समय पूर्व रिहाई (Remission) नीति

सुप्रीम कोर्ट ने इन सिद्धांतों को हरियाणा के कैदियों की समय पूर्व रिहाई की नीतियों के टकराव को सुलझाने के लिए लागू किया।

‘जगदीश’ केस (3-जज बेंच): कोर्ट ने माना था कि हरियाणा की 1993 की रिहाई नीति राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों (संविधान का अनुच्छेद 161) के तहत जारी की गई थी। इसे बाद में सीआरपीसी (CrPC) के तहत बनी किसी वैधानिक नीति द्वारा बदला या कमजोर नहीं किया जा सकता था।

‘राज कुमार’ केस (2021 – 2-जज बेंच): इस छोटे बेंच ने इसके विपरीत जाकर कह दिया कि साल 2002 की रिहाई नीति केवल एक वैधानिक (Statutory) नीति थी और इसे 2008 के नियमों द्वारा बदला जा सकता था।

सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष: चूंकि 1993 और 2002 दोनों नीतियों का स्रोत राज्यपाल की संवैधानिक शक्ति (Article 161) ही था, इसलिए 2 जजों का बेंच बड़े बेंच के स्थापित सिद्धांत के खिलाफ नहीं जा सकता था। इसी आधार पर कोर्ट ने 2021 के राज कुमार वाले फैसले को पर इनक्युरियम (Per Incuriam) घोषित कर दिया।

विधिक मैट्रिक्स: पूर्व निर्णय बनाम पर इनक्युरियम

विधिक स्थिति (Legal Scenario)अदालत की बाध्यता और नियम
बड़ा बेंच बनाम छोटा बेंचछोटा बेंच हमेशा बड़े बेंच के फैसले को मानने के लिए बाध्य है।
समान संख्या का बेंच (Co-equal Bench)पुराने फैसले से असहमत होने पर सीधे उलट फैसला नहीं दे सकता, मामला लार्जर बेंच को भेजना होगा।
पर इनक्युरियम घोषित होने का आधार1. पुराने बड़े/समान बेंच के फैसले की अनदेखी।
2. किसी महत्वपूर्ण अधिनियम/कानून को ध्यान में न रखना।
कानूनी प्रभावपर इनक्युरियम घोषित होते ही वह फैसला एक नजीर (Precedent) के रूप में अपना कानूनी वजूद खो देता है।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
few clouds
30.6 ° C
30.6 °
30.6 °
64 %
6.5kmh
16 %
Sun
31 °
Mon
33 °
Tue
34 °
Wed
37 °
Thu
36 °

Recent Comments