Monday, August 24, 2026
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Police Action: सुप्रीम कोर्ट चाहे जो कहे, पुलिस अपनी मर्जी ही चलाती है…नाबालिग को जेल भेजने व सतेंद्र अंतिल फैसले की अनदेखी पर क्या कहा, पढ़िए

Police Action: उत्तर प्रदेश की पुलिसिंग और अदालती रिमांड की यांत्रिक (Mechanical) प्रक्रिया पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने बेहद तल्ख और गंभीर मौखिक टिप्पणी की है।

नाबालिग (Juvenile) को अवैध रूप से जेल भेजने पर नाराजगी

हाईकोर्ट के जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने एक चोरी के मामले में नाबालिग (Juvenile) को अवैध रूप से जेल भेजने पर नाराजगी जताते हुए न केवल जांच अधिकारी (IO) को विभागीय जांच की चेतावनी दी, बल्कि बिना दिमाग लगाए रिमांड को मंजूरी देने वाले मजिस्ट्रेट (ACJM) के रवैये को भी आड़े हाथों लिया।

पुलिस अधिकारियों को पढ़ाई-लिखाई व कानून का अध्ययन करने से कोई सरोकार नहीं

अदालत ने कहा, सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) चाहे जो कहे या नियम-कानून तय करे, पुलिस अधिकारियों को पढ़ाई-लिखाई और कानून का अध्ययन करने से कोई सरोकार नहीं है। अर्नेश कुमार से लेकर सतेंद्र कुमार अंतिल तक, देश की सर्वोच्च अदालत ने गिरफ्तारी और नागरिक अधिकारों के संरक्षण पर चार-पांच बड़े फैसले दिए हैं, लेकिन पुलिस वही करेगी जो उसके मन में आएगा। उन्हें नियमों और विनियमों की क्या परवाह? वे बस कानून-कायदों के लिए बने ही नहीं हैं!

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मामला क्या है?: नाबालिग को सामान्य अपराधियों की तरह भेजा जेल

यह मामला एक 17 वर्षीय किशोर (नाबालिग) की अवैध हिरासत और उसे जेल भेजे जाने से जुड़ा है।

घटनाक्रम: पुलिस ने आरोपी किशोर को 2 मई 2026 को चोरी के आरोपों में गिरफ्तार किया था। प्राथमिकी (FIR) के वक्त स्कूल ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC) के अनुसार उसकी उम्र 17 वर्ष से कम थी।

लागू धाराएं और नियम: पुलिस ने उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 303(3) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहति (BNSS) की धारा 317 के तहत मामला दर्ज किया था, जिनमें अधिकतम सजा क्रमशः 3 और 5 वर्ष है।

कानूनी चूक: BNSS की धारा 35(3) के तहत, 7 साल से कम की सजा वाले मामलों में आरोपी को सीधे गिरफ्तार करने के बजाय जांच में शामिल होने के लिए नोटिस देना अनिवार्य है। इसके अलावा, आरोपी नाबालिग था, जिसे किसी भी हाल में सामान्य जेल नहीं भेजा जा सकता था।

हाई कोर्ट का हस्तक्षेप: उच्च न्यायालय ने पिछली सुनवाई (4 जून) को ही इस हिरासत को प्रथम दृष्टया ‘अवैध’ मानते हुए किशोर को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया था और लापरवाह पुलिसकर्मियों व संबंधित मजिस्ट्रेट को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने के लिए तलब किया था।

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सरकारी दलीलें हुईं फेल: “जिस दिन गिरफ्तारी, उसी दिन असहयोग का दावा कैसे?”

आज की सुनवाई के दौरान जब राज्य सरकार के वकील ने जांच अधिकारी (IO) का बचाव करते हुए दलील दी कि आरोपी ‘फरार’ था और “जांच में सहयोग नहीं कर रहा था”, तो खंडपीठ ने तुरंत हस्तक्षेप किया। अदालत ने सवाल उठाया कि जब पुलिस ने आरोपी को जांच में शामिल होने के लिए कोई पूर्व नोटिस (Notice) जारी ही नहीं किया, तो गिरफ्तारी के ठीक पहले ही दिन जांच अधिकारी इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंच गया कि आरोपी “असहयोग” कर रहा था? कोर्ट ने इसे पुलिस की मनमानी और अधिकारों का दुरुपयोग माना।

‘सतेंद्र अंतिल’ और ‘अर्नेश कुमार’ फैसलों की धज्जियां उड़ीं

हाई कोर्ट ने इस बात पर गहरा दुख और आश्चर्य व्यक्त किया कि पुलिस और मजिस्ट्रेट दोनों ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक सतेंद्र कुमार अंतिल (2022) और अर्नेश कुमार मामलों के दिशा-निर्देशों को पूरी तरह से भुला दिया। इन फैसलों में साफ कहा गया है कि 7 साल से कम की सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी केवल असाधारण परिस्थितियों में ही होनी चाहिए।

मजिस्ट्रेट के रवैये पर कोर्ट नाराज: “न्यायिक fraternity का हिस्सा होने लायक नहीं”

याचिकाकर्ता के वकील अधिवक्ता स्कंद वाजपेयी ने अदालत को बताया कि अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) ने अपने हलफनामे में नाबालिग को जेल भेजने के फैसले को यह कहते हुए सही ठहराया कि “हिरासत में पूछताछ (Custodial Interrogation) की वास्तव में आवश्यकता थी। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह ‘न्यायिक मस्तिष्क के पूर्ण रूप से गैर-इस्तेमाल’ (Total non-application of judicial mind) को दर्शाता है। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट अक्सर स्वतंत्र रूप से केस डायरी देखने के बजाय पूरी तरह पुलिस के पेश किए कागजों पर ‘संसाधन-निर्भर’ (Resource-dependent) हो जाते हैं। अगर मजिस्ट्रेट ने सिर्फ उम्र के दस्तावेज देख लिए होते, तो एक बच्चे को जेल नहीं जाना पड़ता।

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: माफी के बजाय अहंकार, अब होंगे सख्त आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले में बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए निम्नलिखित आदेश दिए।

जवाब तलब: अदालत ने सभी पक्षों से विस्तृत और व्यापक जवाब मांगते हुए मामले की अगली सुनवाई 16 जुलाई 2026 को तय की है।

सख्त कार्रवाई की चेतावनी: खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि पुलिस और मजिस्ट्रेट द्वारा दाखिल किए गए हलफनामों में अपनी गलती के लिए कोई ‘सच्ची और बिना शर्त माफी’ नहीं मांगी गई है, बल्कि वे हठपूर्वक (Stubbornly) अपनी अवैध कार्रवाई को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए, कोर्ट अब इस मामले में सख्त दंडात्मक आदेश पारित करेगा।

विभागीय जांच: दोषी जांच अधिकारी को ‘सतेंद्र अंतिल’ फैसले के अनुरूप विभागीय जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करने की चेतावनी दी गई है।

केस शीट: इलाहाबाद हाई कोर्ट (लखनऊ बेंच) – 2026

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और मौखिक टिप्पणियां
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ खंडपीठ
माननीय न्यायाधीशजस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत
सुनवाई की तिथि6 जुलाई 2026 (अगली तिथि: 16 जुलाई 2026)
पीड़ित पक्षएक नाबालिग किशोर (उम्र 17 वर्ष से कम)
उल्लंघन का मुख्य आधार‘सतेंद्र अंतिल’ फैसला और BNSS की धारा 35(3) (नोटिस न देना)
अदालत का कड़ा संदेशपुलिस की मनमानी और मजिस्ट्रेटों द्वारा यांत्रिक तरीके से रिमांड देना बर्दाश्त नहीं।
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