Sunday, August 23, 2026
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Sri Lankan Men: देखिए अदालत की अनदेखी गृह और विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिवों पर भारी…₹50,000 का जुर्माना लगने की यह है वजह, जानिए

Sri Lankan Men: मद्रास हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के दो बड़े मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों पर सख्त रुख अपनाया है।

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका मामले पर चल रही सुनवाई

हाईकोर्ट के जस्टिस अनीता सुमंत और जस्टिस सुंदर मोहन की खंडपीठ ने केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के संयुक्त सचिव और विदेश मंत्रालय (MEA) के संयुक्त सचिव पर ₹50,000 का अनुकरणीय जुर्माना (Cost) लगाया है। दोनों वरिष्ठ अफसरों पर आरोप है कि वह एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Plea) की सुनवाई के दौरान ढुलमुल रवैया अपनाने और अदालत की सहायता करने में विफल रहे।

अदालती सुनवाइयों के दौरान बार-बार पूछे जाने के बावजूद ढुलमुल रवैया अपनाया

हाईकोर्ट के आदेश में कहा गया कि जब मामला किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) और अंतरराष्ट्रीय संधियों (International Treaties) के अनुपालन से जुड़ा हो, तो देश के शीर्ष मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अदालत को सटीक तथ्य और दस्तावेज सौंपकर त्वरित सहायता प्रदान करें। अदालती सुनवाइयों के दौरान बार-बार पूछे जाने के बावजूद ढुलमुल रवैया अपनाना और महत्वपूर्ण दस्तावेजों को पेश न करना न्याय प्रक्रिया में बाधा डालने जैसा है।

मामला क्या है?: श्रीलंका में सजा काट रहे कैदी की भारत वापसी और ‘अवैध हिरासत’ का दावा

यह अंतरराष्ट्रीय कानूनी पेचीदगियों से जुड़ा एक बेहद गंभीर मामला है।

श्रीलंका में सजा: मोहम्मद समीर नामक व्यक्ति ने अपने पिता ‘जाहिर हुसैन’ की रिहाई के लिए हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। हुसैन को 18 मई 2015 को श्रीलंका की एक अदालत ने ड्रग तस्करी (720 ग्राम हेरोइन की बरामदगी) के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

कैदियों का हस्तांतरण समझौता: सजा काटने के दौरान, हुसैन ने भारत और श्रीलंका के बीच हुए ‘सजायाफ्ता व्यक्तियों के स्थानांतरण समझौते’ (Agreement on the Transfer of Sentenced Persons) के तहत भारत वापस आने की गुहार लगाई।

भारत सरकार द्वारा सजा में कटौती: भारत सरकार ने उनकी याचिका पर विचार किया और 29 जुलाई 2016 को गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव ने एक आदेश जारी कर श्रीलंका की अदालत द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को भारतीय कानून के समकक्ष (Adaptation under Indian Law) बदलते हुए 10 साल के कठोर कारावास और ₹1,00,000 जुर्माने में तब्दील कर दिया।

समय-सीमा खत्म होने का दावा: इस कटौती के हिसाब से हुसैन को भारत वापस आने के बाद 21 सितंबर 2022 तक ही जेल में रहना था। चूंकि वे इस तारीख के बाद भी पुझल सेंट्रल जेल (चेन्नई) में बंद थे, इसलिए उनके बेटे ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया कि उनके पिता की अतिरिक्त हिरासत पूरी तरह गैर-कानूनी और असंवैधानिक है।

हाई कोर्ट का रुख: श्रीलंका सरकार की सहमति के कागजात कहां हैं?

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने भारत-श्रीलंका समझौते के अनुच्छेद 8 (सजा का निरंतर प्रवर्तन) का अध्ययन किया। इस नियम के मुताबिक यदि भारत (Receiving State) श्रीलंका (Transferring State) की अदालत द्वारा दी गई सजा को अपने देश के कानूनों के अनुसार बदलता या घटाता है, तो ऐसा करने से पहले श्रीलंका सरकार की आधिकारिक सहमति (Consent) लेना कानूनी रूप से अनिवार्य है।

अदालत ने केंद्र सरकार के वकीलों से बार-बार पूछा कि क्या 2016 में सजा घटाने से पहले श्रीलंका सरकार से ऐसी कोई लिखित सहमति ली गई थी? क्या दोनों देशों के बीच इस संबंध में कोई आधिकारिक पत्राचार (Communication) हुआ था? परंतु, बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद दोनों मंत्रालयों के अधिकारी अदालत के सामने ऐसा कोई भी दस्तावेज या पत्रों का आदान-प्रदान पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहे।

खंडपीठ ने अपने आदेश में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, हमारी बार-बार की पूछताछ के बावजूद, विद्वान वकील हमें पत्रों के आदान-प्रदान का कोई भी ऐसा रिकॉर्ड दिखाने में असमर्थ रहे हैं, जिसमें 29.07.2016 के आदेश का संदर्भ हो। इसके अभाव में, हम यह अनुमान (Infer) लगाने की स्थिति में भी नहीं हैं कि श्रीलंका सरकार ने भारतीय कानून के तहत सजा के इस बदलाव को स्वीकार किया है या उसे इस बारे में सूचित भी किया गया था। इसलिए उत्तरदाताओं पर जुर्माना लगाया जाना उचित है।

अदालत का अंतिम निर्देश

मद्रास हाई कोर्ट ने लापरवाही के दोषी अधिकारियों पर शिकंजा कसते हुए निर्देश जारी किए।

जुर्माने की रकम: विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव (प्रतिवादी संख्या 5) और गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव (प्रतिवादी संख्या 6) को संयुक्त रूप से ₹50,000 का जुर्माना भरने का आदेश दिया गया है।

समय-सीमा: दोनों अधिकारियों को यह राशि आदेश जारी होने के चार सप्ताह के भीतर ‘हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी’ (High Court Legal Services Committee) के पास जमा करानी होगी। बता दें कि कोर्ट ने अपने बाद के सुधारात्मक आदेश में स्पष्ट किया कि यह जुर्माना जेल अधीक्षक के बजाय दोनों मंत्रालयों के संयुक्त सचिवों पर ही प्रभावी होगा।

केस शीट: मद्रास हाई कोर्ट आदेश (2026)

विधिक और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति
संबंधित अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस अनीता सुमंत और जस्टिस सुंदर मोहन (डिवीजन बेंच)
संबंधित मामला कानूनमोहम्मद समीर बनाम भारत सरकार व अन्य
जुर्माने की जद में आए अधिकारीसंयुक्त सचिव (विदेश मंत्रालय) और संयुक्त सचिव (गृह मंत्रालय)
जुर्माने की राशि₹50,000 (चार सप्ताह के भीतर जमा करने का आदेश)
मूल विवादअंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत श्रीलंका के कैदी की भारत में सजा का रूपांतरण।
अदालत का विधिक निष्कर्षविदेशी सरकार की सहमति के बिना भारतीय कानून के तहत सजा बदलना संधियों का उल्लंघन है।
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