Tuesday, July 7, 2026
HomeLaworder HindiDisproportionate Assets: आय से 124% अधिक संपत्ति किसी की होती है…नहीं देखें...

Disproportionate Assets: आय से 124% अधिक संपत्ति किसी की होती है…नहीं देखें हैं तो शिक्षा विभाग के अधिकारी का केस जानिए, पढ़िए

Disproportionate Assets: आय से अधिक संपत्ति और लोक सेवकों द्वारा किए जाने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट ने एक बेहद सख्त और नीतिगत फैसला सुनाया है।

भ्रष्टाचार के मामले में निचली अदालत के फैसले को रखा बरकरार

हाईकोर्ट के जस्टिस जी. के. इलानथिरइयन की एकल पीठ ने साल 2008 के एक भ्रष्टाचार मामले में निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए, एक पूर्व सरकारी कर्मचारी और उसकी पत्नी की जेल की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा है। कोर्ट ने पाया कि जांच अवधि के दौरान इस दंपत्ति की संपत्ति उनकी वैध आय से 123.99% (लगभग 124 प्रतिशत) अधिक थी।

आरोपी संपत्ति के कानूनी स्रोत को साबित करें: अदालत

अदालत ने कहा, जब अभियोजन पक्ष (Prosecution) प्राथमिक तौर पर यह साबित कर देता है कि आरोपी के पास बेहिसाब संपत्ति है, तो यह पूरी तरह आरोपी की जिम्मेदारी (Burden of Proof) है कि वह उस संपत्ति के कानूनी स्रोत (Legal Source) को साबित करे। यदि आरोपी ऐसा करने में विफल रहता है, तो उसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी माना जाएगा। मुख्य आरोपी (सरकारी सेवक) की मृत्यु हो जाने या सह-आरोपी पत्नी के गंभीर बीमारी (स्टेज-4 कैंसर) से पीड़ित होने के आधार पर ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई कानूनी सजा को पलटा नहीं जा सकता।

मामला क्या है?: ₹1100 की सैलरी और ₹53 लाख की ‘अवैध’ संपत्ति

यह मामला वेल्लोर (तमिलनाडु) के कोनावट्टम में सहायक प्राथमिक शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में कार्यरत एक सहायक (Assistant) से जुड़ा है।

आरोपी और चेक पीरियड: मुख्य आरोपी आर. मुरली 1990 से 2001 के बीच सरकारी सेवा में थे। सतर्कता विभाग ने इस अवधि के दौरान उनके और उनकी पत्नी एम. वलारमथी के नाम पर अर्जित संपत्तियों की जांच की।

सैलरी बनाम संपत्ति का गणित: अदालत ने नोट किया कि 1990-91 में मुरली का मासिक वेतन मात्र ₹1,100 था। 1994 से 1997 के बीच उनका वेतन ₹2,000, 1998 में ₹2,700 और 1999 में ₹3,300 प्रति माह था। लेकिन इस मामूली वेतन के बावजूद, दंपत्ति ने अपने कार्यकाल में ₹53.30 लाख की अवैध संपत्ति अर्जित कर ली।

निचली अदालत का फैसला (2008): विशेष अदालत ने मुरली को 5 साल के सश्रम कारावास (Rigorous Imprisonment) और उनकी पत्नी वलारमथी को भ्रष्टाचार के लिए उकसाने (Abetment) का दोषी पाते हुए 4 साल की जेल की सजा सुनाई थी।

बचाव पक्ष की दलीलें: पति की मौत हो चुकी है और पत्नी को स्टेज-4 कैंसर है

हाई कोर्ट में अपील के दौरान आरोपियों के वकील के. निर्मल कुमार ने सजा को रद्द कराने के लिए कई मानवीय और कानूनी तर्क दिए।

स्वतंत्र आय का दावा: वकील ने तर्क दिया कि वलारमथी भले ही सरकारी मुलाजिम नहीं थीं, लेकिन वे एक एलआईसी (LIC) एजेंट और रियल एस्टेट ब्रोकर थीं। वे इनकम टैक्स भी भरती थीं, इसलिए उनके नाम पर खरीदी गई संपत्तियां उनकी खुद की कमाई से थीं।

मुख्य आरोपी की मृत्यु: चूंकि मुख्य आरोपी मुरली की अपील लंबित रहने के दौरान मृत्यु हो गई थी, इसलिए उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही समाप्त (Abate) हो चुकी थी। बचाव पक्ष का कहना था कि जब मुख्य आरोपी ही नहीं रहा, तो सह-आरोपी पत्नी को सजा देने का कोई औचित्य नहीं है।

गंभीर बीमारी की दुहाई: अदालत को सूचित किया गया कि वलारमथी वर्तमान में स्टेज-4 कैंसर से पीड़ित हैं, इसलिए मानवीय आधार पर उनकी सजा को रद्द या कम किया जाना चाहिए।

Also Read; Corrupt Practices: गंभीर आरोपों में सिर्फ देरी के आधार पर विभागीय जांच रद्द नहीं हो सकती…पुलिस इंस्पेक्टर के खिलाफ जांच से जुड़ा केस पढ़ें

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: तलाक का झूठा दावा किया, कमाई का कोई सबूत नहीं

जस्टिस जी. के. इलानथिरइयन ने बचाव पक्ष की सभी दलीलों को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले में किसी भी तरह की विधिक कमी या अवैधता होने से इनकार कर दिया।

कमाई के दावे पूरी तरह हवाई

अदालत ने कहा कि हालांकि पत्नी ने एलआईसी एजेंट और रियल एस्टेट डीलर होने का दावा किया, लेकिन वह अदालत के सामने अपनी इस ‘स्वतंत्र कमाई’ का कोई भी ठोस दस्तावेजी सबूत पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहीं। इसके उलट, ट्रायल कोर्ट में उन्होंने खुद को बचाने के लिए यह तक झूठ बोला था कि उनका अपने पति मुरली से कोई लेना-देना नहीं है और वे तलाक ले चुकी हैं, जिसका कोई सबूत वे नहीं दे पाईं।

विभाग से छिपाई संपत्ति की जानकारी

रिकॉर्ड से यह स्पष्ट था कि सरकारी कर्मचारी मुरली ने अपनी सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) से पूर्व अनुमति लिए बिना अपनी पत्नी के नाम पर बड़े पैमाने पर अचल संपत्तियां खरीदी थीं, जिसके कारण उनके विभाग ने उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी शुरू की थी। साक्ष्यों से साबित होता है कि दोनों पति-पत्नी संयुक्त रूप से इन बेहिसाब संपत्तियों का आनंद ले रहे थे।

कानून के सामने बीमारी या मौत ढाल नहीं

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुख्य आरोपी की मृत्यु हो जाने से सह-आरोपी (पत्नी) का अपराध कम नहीं हो जाता, क्योंकि उसने लोक सेवक को भ्रष्टाचार की कमाई खपाने में सीधे तौर पर मदद की थी। अदालत ने मानवीय आधार पर सजा टालने से इनकार करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में अपराध की गंभीरता को देखते हुए कानून अपना काम करेगा, चाहे आरोपी स्टेज-4 कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से ही क्यों न जूझ रहा हो।

केस शीट: मद्रास उच्च न्यायालय निर्णय (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निष्कर्ष
संबंधित अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस जी. के. इलानथिरइयन
मुख्य दोषी (मृत)आर. मुरली (पूर्व सहायक, प्राथमिक शिक्षा विभाग, वेल्लोर)
सह-दोषी (पत्नी)एम. वलारमथी (सजा: 4 साल का सश्रम कारावास)
आय से अधिक संपत्तिवैध स्रोतों से 123.99% अधिक (कुल ₹53.30 लाख की अवैध संपत्ति)
कानूनी धाराएंभ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) और आईपीसी
अदालत का अंतिम आदेशअपील पूरी तरह खारिज; ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई जेल की सजा और जुर्माना बरकरार।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
moderate rain
30.1 ° C
30.1 °
30.1 °
69 %
5.3kmh
98 %
Tue
33 °
Wed
37 °
Thu
37 °
Fri
36 °
Sat
33 °

Recent Comments