Poojari Rights: कर्नाटक के बेलगावी (Belagavi) जिले में स्थित ऐतिहासिक श्री यल्लम्मा देवी मंदिर (Sri Yallamma Devi Temple) के मालिकाना हक और प्रबंधन को लेकर पिछले तीन दशकों (32 साल) से चले आ रहे कानूनी विवाद का पटाक्षेप हो गया।
प्राचीन Sri Yallamma Devi Temple का केस पढ़ें
कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस गीता के.बी. की एकल पीठ ने ने एक बड़ा और दूरगामी फैसला सुनाते हुए मंदिर को ‘सार्वजनिक ट्रस्ट’ (Public Trust) घोषित करते हुए इसे पंजीकृत करने के आदेश दिए हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने चैरिटी कमिश्नर और बेलगावी जिला अदालत के उन पुराने आदेशों को पूरी तरह रद्द कर दिया, जिन्होंने इस मंदिर को पब्लिक ट्रस्ट मानने से इनकार कर दिया था। अदालत ने कहा, यदि कोई मंदिर सदियों पुराना और प्राचीन है, जहाँ हिंदू समाज के लोग बिना किसी रोक-टोक के एक अधिकार के रूप में (As a matter of right) पूजा-अर्चना और दर्शन करने आते हैं, तो वह कानूनी रूप से एक सार्वजनिक धार्मिक स्थल है। केवल इसलिए कि कुछ परिवारों के पास पीढ़ी-दर-पीढ़ी मंदिर में पूजा कराने का अनुवांशिक अधिकार (Hereditary Poojari Rights) है, उस पूरे मंदिर को किसी की ‘निजी संपत्ति’ नहीं माना जा सकता। ऐसे प्राचीन मंदिर बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के तहत एक सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत होने के हकदार हैं।”
मामला क्या है?: 1994 से कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहा था मंदिर
इस मंदिर को लेकर कानूनी लड़ाई आज से लगभग 32 साल पहले शुरू हुई थी।
शुरुआत (1994): साल 1994 में श्रद्धालुओं ने सहायक चैरिटी कमिश्नर (Assistant Charity Commissioner) के सामने एक याचिका दायर कर कहा था कि यह मंदिर बेहद प्राचीन है और इसके धार्मिक व विकासात्मक कार्यों की देखरेख के लिए एक प्रबंध समिति (Managing Committee) बनाकर इसे सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में रजिस्टर्ड किया जाना चाहिए।
अदालतों के विरोधाभासी फैसले: 1997 में सहायक चैरिटी कमिश्नर ने इस मांग को स्वीकार कर लिया। लेकिन साल 2001 में मुख्य चैरिटी कमिश्नर ने इस फैसले को पलट दिया। इसके बाद साल 2005 में बेलगावी जिला अदालत ने भी चैरिटी कमिश्नर के फैसले को सही ठहराते हुए मंदिर को पब्लिक ट्रस्ट मानने से मना कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: मामला अंततः देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) तक पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को वापस कर्नाटक हाई कोर्ट को भेजते हुए (Remand back) साफ किया कि पुजारियों के ‘पूजा करने के अधिकार’ से जुड़ा पुराना विवाद इस बात को तय नहीं करता कि मंदिर सार्वजनिक है या निजी। हाई कोर्ट नए सिरे से इस पर फैसला करे।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: ‘बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट’ की कसौटी
कर्नाटक हाई कोर्ट ने 22 जून के अपने फैसले में बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट (BPT Act), 1950 के कानूनी प्रावधानों की विस्तृत व्याख्या की और पाया कि मंदिर सार्वजनिक ट्रस्ट की सभी शर्तों को पूरा करता है।
धारा 2(17) और 2(13) का कानूनी मेल
जस्टिस गीता के.बी. ने अपने आदेश में कहा, यह पूरी तरह स्थापित हो चुका है कि श्री यल्लम्मा देवी मंदिर एक प्राचीन मंदिर है और सार्वजनिक धार्मिक पूजा का स्थान है, जिसे हिंदू समुदाय के लाभ के लिए समर्पित किया गया था। आम हिंदू जनता को यहाँ अपनी भेंट चढ़ाने और पूजा करने का कानूनी अधिकार है। इसलिए यह बीपीटी एक्ट की धारा 2(17) के तहत ‘मंदिर’ की परिभाषा में आता है। चूंकि अधिनियम की धारा 2(13) में ट्रस्ट की परिभाषा में ‘मंदिर’ भी शामिल हैं, इसलिए इस अस्तित्व वाले मंदिर को एक सार्वजनिक ट्रस्ट ही माना जाएगा।
सरकारी रिकॉर्ड में देवी का नाम
अदालत ने यह भी नोट किया कि केवल एक साल को छोड़कर, सरकार के सभी पुराने राजस्व और प्रशासनिक रिकॉर्ड्स (Government Records) में इस पूरी संपत्ति का मालिकाना हक किसी व्यक्ति के नाम पर नहीं, बल्कि सीधे ‘श्री यल्लम्मा देवी मंदिर’ के नाम पर दर्ज है।
पुजारियों पर बड़ा फैसला: ‘वे मंदिर के स्तंभ हैं, ट्रस्टी बनने पर रोक नहीं’
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ तब आया जब सहायक चैरिटी कमिश्नर के उस पुराने नजरिए को हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि मंदिर के अर्चक या पुजारी (Archaks/Poojaris) ट्रस्टी नहीं बन सकते। पुजारियों के महत्व को रेखांकित करते हुए हाई कोर्ट ने कहा, “ऐसा कोई नियम नहीं है कि मंदिर का अर्चक या पुजारी मंदिर का ट्रस्टी नहीं बन सकता। पुजारी वास्तव में श्रद्धालु और भगवान के बीच एक ‘कड़ी/बिचौलिए’ (Middlemen) के रूप में काम करते हैं। यदि उन्हें भी ट्रस्ट का हिस्सा बनाया जाता है, तो इससे मंदिर के समग्र विकास में निश्चित रूप से मदद मिलेगी, क्योंकि वे मंदिर के मुख्य स्तंभ (Pillars) होते हैं।”
कोर्ट का अंतिम प्रशासनिक आदेश
अदालत ने आदेश दिया कि मंदिर के प्रबंधन के लिए: साल 1994 की मूल याचिका में जिन ट्रस्टियों के नाम प्रस्तावित किए गए थे, उन्हें शामिल किया जाए। इसके साथ ही, मंदिर में वंशानुगत रूप से पूजा करने वाले पुजारियों के दोनों परिवारों से एक-एक सदस्य को भी अनिवार्य रूप से इस पब्लिक ट्रस्ट का आधिकारिक ट्रस्टी बनाया जाए। इस मामले में अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता रामचंद्र ए. माली पेश हुए। प्रतिवादियों का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता शिवकुमार एस. बदावदगी और रविकुमार डी. गोकाकाकर ने किया, जबकि कर्नाटक राज्य की ओर से हाई कोर्ट के सरकारी वकील अभिषेक मालीपाटिल ने पैरवी की।
केस शीट: कर्नाटक उच्च न्यायालय निर्णय (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्देश |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय, बेंगलुरु |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस गीता के.बी. (एकल पीठ) |
| मामले का शीर्षक | मल्लारी बनाम लक्ष्मण राजू पूजारी (Mallari Vs Laxman Raju Poojari) |
| लागू होने वाला कानून | बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट (BPT Act), 1950 (धारा 2(13) और 2(17)) |
| विवाद का मुख्य विषय | क्या पुजारियों के अनुवांशिक अधिकार के कारण मंदिर निजी संपत्ति बन जाता है? |
| अदालत का अंतिम आदेश | मंदिर सार्वजनिक ट्रस्ट घोषित; पुजारियों को भी ट्रस्ट में शामिल करने और 1994 के प्रस्ताव के तहत पंजीकरण के निर्देश। |

