Court Directive: अदालती वर्गीकरण, रजिस्ट्री की प्रक्रियाओं और संवैधानिक व्यवस्था को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण तकनीकी और कानूनी स्पष्टीकरण जारी किया है।
हाईकोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस मनीष शर्मा की खंडपीठ ने साफ किया कि रिट याचिकाओं का चरित्र अंततः संवैधानिक होता है, भले ही उनके भीतर उठाए गए मुद्दे आपराधिक मामलों से संबंधित क्यों न हों। कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को इस पुरानी और गलत परिपाटी को तुरंत बंद करने का आधिकारिक निर्देश (Directive) जारी किया है।
क्रिमिनल रिट पिटीशन जैसी किसी भी अलग श्रेणी या अवधारणा का कोई प्रावधान नहीं
अदालत ने कहा, भारत के संविधान में क्रिमिनल रिट पिटीशन (Criminal Writ Petition) जैसी किसी भी अलग श्रेणी या अवधारणा का कोई प्रावधान नहीं है। यदि कोई याचिका किसी आपराधिक मामले से जुड़े कानूनी मुद्दों को उठाने के लिए दायर की जाती है, तब भी कोर्ट रजिस्ट्री उसे एक स्वतंत्र ‘क्रिमिनल रिट’ के नाम से दर्ज नहीं कर सकती। ऐसी सभी याचिकाओं को केवल और केवल ‘रिट पिटीशन’ (Writ Petition) के रूप में ही पंजीकृत किया जाना चाहिए।
मामला क्या है?: 2018 से लंबित याचिका पर कोर्ट की नाराजगी
यह निर्देश साल 2018 से अदालत में लंबित पड़ी एक पुरानी याचिका की सुनवाई के दौरान आया। अनिश्चितकालीन देरी पर नाराजगी: हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस बात पर गहरी नाखुशी और नाराजगी जताई कि यह मामला बिना किसी ठोस कारण के लंबे समय से अनिश्चित काल के लिए स्थगित होता आ रहा था।
रजिस्ट्री की कोताही: मामले के रिकॉर्ड को खंगालने पर कोर्ट ने पाया कि रजिस्ट्री ने इसे डी.बी. क्रिमिनल रिट पिटीशन (D.B. Criminal Writ Petition) के रूप में दर्ज कर रखा था। इसी बिंदु पर कोर्ट ने संविधान के तहत रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) की मूल भावना को स्पष्ट किया।
हाई कोर्ट की संवैधानिक व्याख्या: रिट केवल ‘रिट’ होती है
जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा की पीठ ने संविधान के तहत अदालती वर्गीकरण को सुव्यवस्थित करते हुए कहा, रजिस्ट्री ने इस मामले को ‘क्रिमिनल रिट पिटीशन’ के रूप में स्वीकार किया है, जबकि संविधान में क्रिमिनल रिट पिटीशन जैसी कोई अवधारणा प्रदान नहीं की गई है। कोई भी रिट याचिका ऐसे मुद्दों को उठाने के लिए दायर की जा सकती है जो किसी आपराधिक मामले से संबंधित हो सकते हैं, लेकिन इसके बावजूद उसे ‘क्रिमिनल रिट पिटीशन’ के रूप में नहीं माना जाएगा। उसे केवल एक रिट पिटीशन के रूप में ही पंजीकृत किया जा सकता है।
रोस्टर तय करना केवल कोर्ट का विशेषाधिकार
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी मामले की प्रकृति को देखकर यह तय करना कि उसे किस उपयुक्त बेंच या रोस्टर (Roster) के सामने रखा जाना चाहिए, यह पूरी तरह से अदालत का विशेष अधिकार (Prerogative) है। रजिस्ट्री अपने स्तर पर नामकरण करके इसका वर्गीकरण तय नहीं कर सकती।
अदालत का अंतिम निर्देश: ‘क्रिमिनल’ हटाकर ‘सिविल रिट’ में बदलें रिकॉर्ड
भविष्य के लिए व्यवस्था तय करते हुए खंडपीठ ने रजिस्ट्री को सख्त और स्पष्ट आदेश जारी किया। अब से, रजिस्ट्री को निर्देशित किया जाता है कि वह किसी भी मामले को ‘क्रिमिनल रिट पिटीशन’ के रूप में पंजीकृत न करे। इसके साथ ही, वर्तमान मामले के रिकॉर्ड को पूरी तरह दुरुस्त करने के लिए कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस वर्तमान ‘डी.बी. क्रिमिनल रिट पिटीशन’ को ‘डी.बी. सिविल रिट पिटीशन’ (D.B. Civil Writ Petition) के रूप में पुनर्वर्गीकृत (Re-classify) किया जाए। सांख्यिकीय उद्देश्यों (Statistics) के लिए पुरानी क्रिमिनल रिट प्रविष्टि को बंद कर दिया गया। इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मिथिलेश कुमार पेश हुए, जबकि राजस्थान राज्य का प्रतिनिधित्व सरकारी अधिवक्ता एवं अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) राजेश चौधरी ने किया।
केस शीट: राजस्थान उच्च न्यायालय निर्देश (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्देश |
| संबंधित अदालत | राजस्थान उच्च न्यायालय |
| माननीय न्यायाधीश | कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस मनीष शर्मा |
| मूल विधिक आधार | भारत का संविधान (अनुच्छेद 226/227 – रिट क्षेत्राधिकार) |
| विवाद का विषय | रजिस्ट्री द्वारा मामलों को ‘क्रिमिनल रिट पिटीशन’ के रूप में दर्ज करने की प्रथा |
| अदालत का अंतिम आदेश | भविष्य के लिए ‘क्रिमिनल रिट’ नामकरण पर रोक; सभी मामलों को केवल रिट पिटीशन के रूप में दर्ज करने और वर्तमान मामले को सिविल रिट में बदलने के निर्देश। |

