Ayatollah Ali Khamenei: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में शिया समुदाय के लोगों द्वारा ईरानी आध्यात्मिक नेताओं के पोस्टर और तस्वीरें लगाने पर कथित पुलिसिया कार्रवाई के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है।
यह दायर की थी जनहित याचिका
हाईकोर्ट के जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने याचिका को ‘अस्पष्ट’ करार देते हुए पूरी तरह बंद (Dismiss/Close) कर दिया। अदालत में केवल सामान्य और अस्पष्ट दावों (General and Vague Averments) के आधार पर जनहित याचिका (PIL) न तो बनाए रखी जा सकती है और न ही इस पर आगे बढ़ा जा सकता है। याचिकाकर्ता ने एक भी ऐसा विशिष्ट उदाहरण पेश नहीं किया है जहां किसी निजी घर या परिसर से पुलिस ने जबरन पोस्टर हटाए हों। यदि किसी नागरिक को किसी पुलिसकर्मी की कार्रवाई से व्यक्तिगत समस्या है, तो वे कानून के तहत उपलब्ध उचित कानूनी विकल्पों का सहारा ले सकते हैं, लेकिन ऐसी अस्पष्ट दलीलों के आधार पर कोई सर्वव्यापी आदेश (Omnibus Order) जारी नहीं किया जा सकता।
मामला क्या है?: ईरान के शिया नेताओं के पोस्टर पर विवाद
यह पूरा विवाद लखनऊ और उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों में शिया धार्मिक और आध्यात्मिक नेताओं के बैनर-पोस्टर लगाने और पुलिस द्वारा उन्हें हटाए जाने के दावों से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता: यह जनहित याचिका शिया विद्वानों के संगठन ‘मजलिस उलेमा-ए-हिंद’ (Majlis Ulema-E-Hind) द्वारा दायर की गई थी।
आरोप: याचिका में आरोप लगाया गया था कि उत्तर प्रदेश पुलिस शिया समुदाय के लोगों के निजी आवासीय घरों, दरवाजों और निजी वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों (दुकानों) की दीवारों से ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतल्लाह अली खामेनेई (Ayatollah Ali Khamenei) और आयतल्लाह अली अल-सिस्तानी (Ayatollah Ali Al-Sistani) के चित्रों, पोस्टरों और बैनरों को जबरन हटा रही है।
मांग: संगठन ने अदालत से गुहार लगाई थी कि शांतिपूर्ण ढंग से इन चित्रों को प्रदर्शित करने वाले लोगों के खिलाफ किसी भी दंडात्मक या दमनकारी पुलिस कार्रवाई (Coercive Action) और हिरासत (Detentions) पर तुरंत रोक लगाई जाए।
हाई कोर्ट का कड़ा रुख: ‘हवाई दावों पर अदालतें नहीं चलतीं’
मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने जब याचिका के कानूनी दस्तावेजों और दलीलों की समीक्षा की, तो पाया कि याचिका में कोई ठोस तथ्य मौजूद नहीं थे। कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां इस प्रकार थीं।
कोई विशिष्ट उदाहरण (Specific Instance) नहीं
जस्टिस राजन रॉय की पीठ ने नोट किया कि याचिका में केवल यह कह दिया गया कि “पुलिस पोस्टर हटा रही है”, लेकिन पूरी याचिका में किसी एक भी ऐसे घर, दुकान, तारीख या पीड़ित व्यक्ति का नाम या विवरण नहीं दिया गया, जिसके साथ यह घटना घटी हो।
जनहित याचिका का दुरुपयोग नहीं
अदालत ने स्पष्ट किया कि जनहित याचिका (PIL) एक गंभीर विधिक माध्यम है। इसका उपयोग व्यापक नीतिगत दिशानिर्देश जारी कराने के लिए तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि यह साबित न हो कि किसी विशेष वर्ग के अधिकारों का बड़े पैमाने पर हनन हो रहा है। यदि किसी व्यक्ति के घर से अवैध रूप से पोस्टर हटाया गया है, तो वह पीड़ित व्यक्ति सीधे अदालत आ सकता है, न कि किसी संगठन द्वारा बिना तथ्यों के एक सर्वव्यापी याचिका के जरिए।
केस शीट: इलाहाबाद उच्च न्यायालय निर्णय (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और रुख |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला (खंडपीठ) |
| मुकदमे का नाम | मजलिस उलेमा-ए-हिंद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य |
| विवाद का विषय | ईरानी नेताओं (खामेनेई और सिस्तानी) के पोस्टरों पर पुलिस कार्रवाई |
| याचिकाकर्ता के वकील | अधिवक्ता मोहम्मद कुमैल हैदर |
| अदालत का अंतिम आदेश | याचिका पूरी तरह बंद (Closed); अस्पष्टता के आधार पर राहत देने से इनकार। |

