Tuesday, August 25, 2026
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Adults’ Choice: 21 साल की बिटिया अपनी मर्जी से जीने को स्वतंत्र है…जबरन निकाह से भाग आई युवती केस की टिप्पणी सभी माता-पिता जरूर पढ़ें

Adults’ Choice: हैदराबाद से अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ जबरन शादी के बंधन से बचकर मुंबई आई एक 21 वर्षीय युवती को बड़ी राहत देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करने वाला एक बेहद अहम फैसला सुनाया है।

किससे शादी करना चाहती है या आगे उच्च शिक्षा लेगी, यह युवती पर छोड़ें

हाईकोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और जस्टिस गौतम आंखड़ की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि माता-पिता के अपने बच्चों के प्रति अधिकार उनके बालिग होने के बाद उनकी स्वायत्तता (Personal Autonomy) को खत्म नहीं कर सकते। अदालत ने कहा, एक 21 वर्ष की युवती कानूनी रूप से बालिग है और वह कहां रहना चाहती है, किससे शादी करना चाहती है या आगे उच्च शिक्षा पाना चाहती है, यह तय करने का उसे पूरा हक है। ये सभी विषय पूरी तरह से उसके व्यक्तिगत चयन (Personal Choice) के दायरे में आते हैं, जिन्हें भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 (Right to Life and Personal Liberty) संरक्षण देता है। कोई भी माता-पिता या राज्य की मशीनरी (पुलिस) किसी वयस्क महिला को उसकी मर्जी के खिलाफ घर लौटने या जबरन शादी करने के लिए कतई मजबूर नहीं कर सकते।

मामला क्या है?: 10 साल बड़े चचेरे भाई से जबरन शादी का दबाव

यह मामला रूढ़िवादिता और अपनी आकांक्षाओं के बीच फंसी एक पढ़ी-लिखी लड़की के संघर्ष की कहानी बयां करता है।

घर से पलायन (15 जून): याचिकाकर्ता युवती ने बताया कि वह हैदराबाद के एक बेहद रूढ़िवादी और कट्टपंथ की सोच रखने वाले परिवार से ताल्लुक रखती है, जहाँ उसकी निजी राय की कोई कीमत नहीं थी। उसके माता-पिता उस पर मानसिक दबाव बनाकर उसकी शादी उसके चचेरे भाई (Cousin) से करना चाहते थे, जो उम्र में उससे लगभग 10 साल बड़ा था।

सपनों के लिए उड़ान: युवती अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थी और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहती थी। इसलिए वह 15 जून को चुपचाप अपना घर छोड़कर मुंबई आ गई। उसके जाने के बाद, परिजनों ने हैदराबाद पुलिस में उसकी गुमशुदगी (Missing Person Complaint) की रिपोर्ट दर्ज करा दी।

हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया: पुलिस की दबिश और परिवार द्वारा जबरन शादी कराए जाने के डर से युवती ने बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अपनी सुरक्षा और स्वतंत्रता की गुहार लगाई। वर्तमान में वह मुंबई में एक पेइंग गेस्ट (PG) के रूप में रह रही है, एक एनजीओ (NGO) के साथ काम करती है और ऑनलाइन रिव्यूअर के तौर पर खुद पैसे कमा रही है।

जजों ने चैंबर में की लड़की से गुप्त बात; माता-पिता की दलीलें खारिज

अदालत ने इस संवेदनशील मामले की सच्चाई जानने के लिए एक बेहद संवेदनशील और व्यावहारिक प्रक्रिया अपनाई।

चैंबर में सीधी बातचीत: कोई भी आदेश पारित करने से पहले, न्यायाधीशों ने युवती से बिना उसके माता-पिता की मौजूदगी के अपने पर्सनल चैंबर में मुलाकात की। कोर्ट ने पाया कि लड़की अत्यधिक परिपक्व, अपनी बात स्पष्ट रूप से रखने वाली और अपने फैसलों के परिणामों के प्रति पूरी तरह जागरूक थी। उस पर किसी बाहरी दबाव या बहकावे का कोई नामोनिशान नहीं था।

माता-पिता का हलफनामा: कोर्ट ने लड़की के माता-पिता से भी अलग से बात की। माता-पिता ने कोर्ट में एक हलफनामा (Affidavit) दायर कर यह आश्वासन दिया कि वे अपनी बेटी को शादी के लिए मजबूर नहीं करेंगे और उसकी पढ़ाई में कोई बाधा नहीं डालेंगे।

कोर्ट का सख्त रुख: हाई कोर्ट ने माता-पिता के इस लिखित आश्वासन को रिकॉर्ड पर तो लिया, लेकिन साथ ही दो टूक शब्दों में कहा कि माता-पिता का यह आश्वासन भी उनकी बेटी की व्यक्तिगत प्राथमिकताओं और इच्छाओं से ऊपर नहीं हो सकता।

हाई कोर्ट का अंतिम आदेश: ‘गुमशुदगी का केस बंद करे पुलिस’

खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के बाद पाया कि चूंकि युवती अपनी मर्जी से और बालिग होने के नाते स्वतंत्र जीवन जी रही है, इसलिए उसे ‘गुमशुदा’ मानने का कोई कानूनी आधार (No Justification) नहीं है।

अदालत ने तेलंगाना पुलिस को तुरंत निर्देश दिए कि वह हैदराबाद में दर्ज युवती की गुमशुदगी की रिपोर्ट (Missing Person Report) को बंद करने के लिए आवश्यक कदम उठाए। इसके साथ ही महाराष्ट्र पुलिस को युवती को किसी भी तरह के उत्पीड़न या जबरन कस्टडी में लिए जाने के खिलाफ सुरक्षा देने को कहा।

अदालत में युवती की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मिहिर देसाई, देवयानी कुलकर्णी, ऋषिका अग्रवाल और संस्कृति याज्ञनिक पेश हुए। माता-पिता का पक्ष अधिवक्ता स्वाति सिन्हा और राज्य का पक्ष अतिरिक्त लोक अभियोजक एम. एम. देशमुख ने रखा।

केस शीट: बॉम्बे उच्च न्यायालय निर्णय (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और सुरक्षात्मक निर्देश
संबंधित अदालतबॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court)
माननीय न्यायाधीशकार्यकारी मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और जस्टिस गौतम आंखड़
याचिकाकर्तासुरक्षा के लिए छिपकर रह रही 21 वर्षीय युवती (XYZ v. State of Maharashtra)
संविधान का मूल आधारअनुच्छेद 21 — व्यक्तिगत स्वायत्तता और जीवन जीने का अधिकार
अदालत का अंतिम निर्देशयुवती पूरी तरह स्वतंत्र; तेलंगाना पुलिस गुमशुदगी की फाइल बंद करे और परिवार उसे परेशान न करे।
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