Groping Style: चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे को शर्मसार करने वाले एक मामले में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक डॉक्टर को महिला मरीज की लज्जा भंग करने के आरोप में दोषी ठहराने वाले निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह सही माना है।
इलाज के बहाने आपराधिक बल का प्रयोग कर उसे भंग करना एक गंभीर अपराध
हाईकोर्ट की जस्टिस सुस्मिता फुकन खौंड की एकल पीठ ने साफ किया कि महिला अस्मिता से जुड़े मामलों में पीड़िता का बयान ही आरोपी को दोषी ठहराने के लिए कानूनी रूप से पर्याप्त है। अदालत ने कहा, कोई भी डॉक्टर या स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynaecologist) अनियमित माहवारी (Irregular Periods) या प्रेग्नेंसी टेस्ट के नाम पर किसी महिला मरीज के स्तनों को गलत तरीके से छूने या टटोलने (Groping) को ‘रूटीन मेडिकल एग्जामिनेशन’ नहीं बता सकता। डॉक्टर की यह दलील पूरी तरह से बेतुकी और कानूनन अस्वीकार्य है। एक बालिग महिला की शालीनता और लज्जा (Modesty) उसके शरीर का अभिन्न हिस्सा है, और इलाज के बहाने आपराधिक बल का प्रयोग कर उसे भंग करना एक गंभीर अपराध है।
मामला क्या है?: इलाज के बहाने चैंबर में यौन उत्पीड़न
यह कानूनी विवाद एक डॉक्टर के खिलाफ दर्ज कराई गई आपराधिक शिकायत से जुड़ा है, जो लंबे समय से कानूनी प्रक्रियाओं में था।
घटनाक्रम: एक महिला मरीज अनियमित माहवारी (Periods) की समस्या की शिकायत लेकर डॉक्टर के क्लिनिक गई थी। जांच के बहाने डॉक्टर ने उसके ब्लाउज के बटन खोल दिए, उसके स्तनों को गलत तरीके से दबाया और टटोला। पीड़िता द्वारा विरोध करने के बावजूद डॉक्टर ने उसके निजी अंगों को छुआ, उसके होठों को काटा और उसके निचले स्कर्ट (मेखला) के अंदर हाथ डालने की कोशिश की, जबकि वह लगातार पीड़िता को यह दिलासा देता रहा कि यह सामान्य जांच है।
निचली अदालतों का रुख: साल 2013 में ट्रायल कोर्ट ने डॉक्टर को IPC की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल) के तहत दोषी पाते हुए 2 साल की साधारण कैद और ₹10,000 जुर्माने की सजा सुनाई थी। 2014 में सेशंस कोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा, जिसके खिलाफ आरोपी डॉक्टर ने हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) दायर की थी।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: डॉक्टर का अजीबोगरीब और आत्मघाती बचाव
जस्टिस सुस्मिता फुकन खौंड ने आरोपी डॉक्टर की दलीलों को खारिज करते हुए केस के विधिक और चिकित्सीय पहलुओं पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
पीड़िता का बयान ही अचूक साक्ष्य: हाई कोर्ट ने दोहराया कि जब किसी महिला की शालीनता या यौन उत्पीड़न से जुड़ा मामला हो, तो पीड़िता की सुसंगत गवाही ही सजा के लिए काफी है, क्योंकि ऐसे बंद कमरों के अपराधों में प्रत्यक्षदर्शी (Eyewitnesses) का मिलना मुमकिन नहीं होता। पीड़िता का बयान CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज मजिस्ट्रेट के बयान से पूरी तरह मेल खाता था।
माहवारी आंतरिक समस्या, ब्लाउज खुलवाने की जरूरत नहीं: अदालत ने अपीलीय अदालत के इस निष्कर्ष को सही ठहराया कि अनियमित पीरियड एक आंतरिक (Internal) समस्या है, जिसके परीक्षण के लिए महिला को अपना ब्लाउज अनहुक करने या डॉक्टर द्वारा स्तनों को दबाने की कोई चिकित्सीय आवश्यकता नहीं होती।
डॉक्टर का आत्मघाती बयान (Self-Implicating Statement): आरोपी डॉक्टर ने CrPC की धारा 313 के तहत अदालत को दिए अपने बयान में खुद स्वीकार कर लिया कि उसने ‘रूटीन प्रेग्नेंसी टेस्ट’ के लिए महिला के पेट को छुआ और स्तनों को दबाया था। कोर्ट ने इस पर तंज कसते हुए कहा, कोई भी डॉक्टर प्रेग्नेंसी टेस्ट के लिए पेट या एब्डोमेन को छू सकता है, लेकिन इसके लिए महिला के स्तनों को भींचना (Squeeze) पूरी तरह से बेतुका और अप्राकृतिक है। डॉक्टर का यह बयान स्वयं को फंसाने वाला (Self-Implicating) है और पीड़िता की गवाही की पुष्टि करता है।
अदालत का अंतिम फैसला और सजा में बदलाव
उच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता और विधिक पहलुओं को देखते हुए निम्नलिखित आदेश पारित किए।
दोषसिद्धि बरकरार: डॉक्टर की दोषसिद्धि (Conviction) को पूरी तरह से वैध और बरकरार रखा गया है।
सजा में तकनीकी संशोधन: अदालत ने नोट किया कि यह घटना 2013 के आपराधिक कानून संशोधन (जिसमें धारा 354 के तहत न्यूनतम सजा तय की गई थी) से पहले की है। चूंकि मामला बहुत पुराना हो चुका है, इसलिए कोर्ट ने डॉक्टर की 2 साल की जेल की सजा को हटाकर उसे केवल भारी जुर्माने (Fine Only) की सजा में तब्दील कर दिया।
मानसिक आघात पर जोर: कोर्ट ने माना कि भले ही पीड़िता को कोई गंभीर शारीरिक चोट न आई हो, लेकिन डॉक्टर के इस कृत्य ने उसकी मानसिक स्थिति और अंतरात्मा (Psyche) को गहरा आघात पहुंचाया है।
विधिक केस शीट: गुवाहाटी हाई कोर्ट मेडिकल अनाचार बनाम धारा 354 IPC
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय |
| संबंधित अदालत | गौहाटी उच्च न्यायालय, असम |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस सुस्मिता फुकन खौंड |
| लागू कानूनी धारा | IPC की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करना) |
| आरोपी का विधिक बचाव | गायनोकोलॉजिकल और प्रेग्नेंसी रूटीन चेकअप की दलील |
| अदालत का विधिक सिद्धांत | महिला की लज्जा (Modesty) एक अमूर्त विचार है, जिसे केवल पीड़िता ही परिभाषित कर सकती है |
| चिकित्सीय राय की अनिवार्यता | डॉक्टर की लज्जा भंग करने की मंशा साबित करने के लिए किसी अन्य मेडिकल ऑफिसर की राय Sine qua non (अनिवार्य शर्त) नहीं है |
अदालत ने यह स्पष्ट करके डॉक्टरों और मरीजों के बीच विश्वास की सीमाएं तय कर दी हैं कि किसी भी महिला की शालीनता पर हुआ हमला अक्षम्य है, चाहे वह डॉक्टर के बंद चैंबर में ही क्यों न हुआ हो। तकनीक और समय के आधार पर सजा भले ही जुर्माने में बदल गई हो, लेकिन डॉक्टर पर लगा अपराधी का यह धब्बा मेडिकल काउंसिल में उसके करियर के लिए हमेशा के लिए पूर्णविराम साबित होगा।

