Tuesday, September 1, 2026
HomeHigh CourtRegistered Will: वसीयत की केवल कॉपी पेश करना या एग्ज़िबिट मार्क करना...

Registered Will: वसीयत की केवल कॉपी पेश करना या एग्ज़िबिट मार्क करना काफी नहीं…प्रोबेट को लेकर यह फैसला एक बार सभी पढ़ लें

Registered Will: पंजीकृत वसीयत और उसके प्रोबेट से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी विवाद में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक बड़ा विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किया है।

भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम और साक्ष्य कानून की स्थापित प्रक्रियाओं को समझें

हाईकोर्ट के जस्टिस मृदुल कुमार कलिता की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि दस्तावेजी साक्ष्य को कानून के अनुसार साबित किया जाना आवश्यक है, केवल अदालत के रिकॉर्ड पर आ जाने से उसकी प्रामाणिकता तय नहीं हो जाती। अदालत ने कहा, “वसीयत (Will) का मूल दस्तावेज़ या उसकी प्रमाणित प्रति (Certified Copy) अदालत में केवल पेश कर देना या उस पर ‘एग्ज़िबिट’ (Exhibit) का ठप्पा लगवा लेना ही उसे कानूनी रूप से साबित करना नहीं माना जा सकता। जब तक वसीयत को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम और साक्ष्य कानून की स्थापित प्रक्रियाओं के तहत गवाहों द्वारा पूरी तरह साबित नहीं किया जाता, तब तक अदालत उस पर प्रोबेट (Probate) ग्रांट नहीं कर सकती। क्योंकि प्रोबेट का सीधा असर प्राकृतिक कानूनी वारिसों को उनकी संपत्ति से वंचित करने के रूप में हो सकता है, इसलिए इसके लिए सख्त कानूनी अनुपालन (Strict Compliance) अनिवार्य है।

मामला क्या है?: सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में मूल वसीयत और प्रोबेट का विवाद

यह मामला जिला न्यायालय, बारपेटा के उस फैसले के खिलाफ दायर एक अपील (Intest. Case under Section 299) से जुड़ा है, जिसमें एक पंजीकृत वसीयत के आधार पर उत्तरदाताओं (Respondents) के पक्ष में प्रोबेट जारी कर दिया गया था।

उत्तरदाताओं का कदम: उत्तरदाताओं ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 276 के तहत एक पंजीकृत वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन किया था। चूंकि मूल वसीयत सब-रजिस्ट्रार के कार्यालय में जमा थी, इसलिए उन्होंने शुरुआत में याचिका के साथ केवल एक प्रमाणित प्रति (Certified Copy) संलग्न की। बाद में मूल वसीयत भी कोर्ट में जमा करा दी गई, और जिला अदालत ने उनके पक्ष में प्रोबेट दे दिया।

अपीलकर्ता की आपत्ति: मूल कानूनी वारिस (अपीलकर्ता) ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। उनकी दलील थी कि निचली अदालत ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 (द्वितीयक साक्ष्य/Secondary Evidence से जुड़े नियम) और भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 63(सी) (वसीयत के सत्यापन/Attestation के नियम) का पालन किए बिना ही वसीयत को वैध मान लिया।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: एग्ज़िबिट मार्क करने और ‘साबित’ करने में क्या अंतर है?

जस्टिस मृदुल कुमार कलिता ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए वसीयत को प्रमाणित करने के संबंध में कई महत्वपूर्ण विधिक कमियों को रेखांकित किया।

एग्ज़िबिट (Exhibit) होना ही सबूत नहीं: हाई कोर्ट ने साफ किया कि किसी दस्तावेज़ का साक्ष्य में स्वीकार होना (Admissibility) और उसका साबित होना (Proof) दो अलग बातें हैं। कोर्ट ने कहा, दस्तावेजी साक्ष्य को कानून के अनुसार साबित किया जाना आवश्यक है। किसी दस्तावेज़ को केवल साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर लेना और उस पर एग्ज़िबिट नंबर डाल देना ही उसका प्रमाण नहीं माना जाता।

गवाहों के सामने मूल वसीयत पेश न करना: कोर्ट ने नोट किया कि हालांकि मूल वसीयत बाद में एक आवेदन के साथ कोर्ट में जमा करा दी गई थी, लेकिन गवाहों के बयान दर्ज होते समय उसे किसी भी गवाह के सामने नहीं रखा गया और न ही उनके हस्ताक्षर का मिलान कराया गया। इस कारण वसीयत पर मौजूद हस्ताक्षरों को कानूनी रूप से साबित नहीं माना जा सकता।

धारा 63(सी) का उल्लंघन (Attestation Fail): वसीयत के लिए कानूनन कम से कम दो गवाहों (Attesting Witnesses) की गवाही जरूरी होती है, जो यह कहें कि उन्होंने वसीयतकर्ता (Testator) को अपनी मौजूदगी में दस्तखत करते देखा था और खुद भी उसकी मौजूदगी में हस्ताक्षर किए थे। हाई कोर्ट ने पाया कि उत्तरदाताओं ने चारों गवाहों को तो पेश किया, लेकिन किसी भी गवाह ने स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा कि उन्होंने वसीयतकर्ता की उपस्थिति में वसीयत पर हस्ताक्षर किए थे।

अदालत का अंतिम आदेश: प्रोबेट रद्द

उच्च न्यायालय ने उत्तरदाताओं द्वारा वसीयत के उचित सत्यापन (Due Attestation) को साबित करने में विफल रहने पर निम्नलिखित निर्णय दिया।

जिला जज का फैसला रद्द: बारपेटा जिला न्यायालय द्वारा प्रोबेट ग्रांट करने के आदेश को पूरी तरह से निरस्त (Set Aside) कर दिया गया है।

अपील स्वीकार: हाई कोर्ट ने अपीलकर्ता की याचिका को स्वीकार करते हुए वसीयत को कानूनी रूप से अप्रमाणित घोषित कर दिया।

धारा 281 पर राहत (निर्देशात्मक प्रकृति): हालांकि, कोर्ट ने यह माना कि याचिका के साथ गवाहों के सत्यापन संबंधी धारा 281 का पालन न करना पूरी तरह से प्रक्रियात्मक था और इसे केवल ‘निर्देशात्मक’ (Directory) माना जाएगा, जिससे पूरा केस खारिज नहीं होता, लेकिन मुख्य वसीयत को साबित न कर पाना केस के खारिज होने का मुख्य आधार बना।

विधिक केस शीट: गुवाहाटी हाईकोर्ट प्रोबेट बनाम वसीयत सत्यापन (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय
संबंधित अदालतगौहाटी उच्च न्यायालय, असम
माननीय न्यायाधीशजस्टिस मृदुल कुमार कलिता
साइटेशन संदर्भ2026 LiveLaw (Gau) 91
मुख्य कानूनी विसंगतिबिना गवाहों के सामने पेश किए मूल वसीयत को वैध मान लेना
आवश्यक विधिक धाराएंभारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 63(सी) व संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 3
अदालत का विधिक सिद्धांतप्रोबेट के मामलों में प्राकृतिक वारिसों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कड़े प्रमाण आवश्यक हैं

अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वसीयत एक ऐसा दस्तावेज़ है जो वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद प्रभावी होता है, इसलिए उसकी सत्यता जांचने की जिम्मेदारी कोर्ट की होती है। जब तक गवाही के कटघरे में खड़े होकर गवाह यह न कह दे कि उसने वसीयतकर्ता को दस्तखत करते देखा था और मूल कागज़ पर बने हस्ताक्षर को प्रमाणित न कर दे, तब तक वह महज़ एक कागज़ का टुकड़ा है, कोई कानूनी वसीयत नहीं।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
light rain
31 ° C
31 °
31 °
74 %
4.1kmh
94 %
Tue
32 °
Wed
27 °
Thu
33 °
Fri
32 °
Sat
32 °

Recent Comments