Tuesday, September 1, 2026
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Forgery Sign on PIL : जनहित याचिका में वकीलों के जाली दस्तखत…यह कृत्य बर्दाश्त नहीं होगा, अब वकील-मुवक्किल के खिलाफ मजिस्ट्रेट कोर्ट में केस

Forgery Sign on PIL : एक जनहित याचिका (PIL) में फर्जीवाड़े को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने के बेहद गंभीर मामला मानते हुए सख्त रुख अपनाया।

सीधे तौर पर न्याय प्रशासन को कलंकित करने का किया जा रहा प्रयास: अदालत

हाईकोर्ट के जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने रजिस्ट्री को आदेश दिया है कि वे प्रयागराज के सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष छह महीने के भीतर शिकायत दर्ज कराएं। आरोपी वकील और उनकी मुवक्किल (Client) दोनों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर कानूनी कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। कहा, अदालत कोई ऐसा मंच नहीं है जहां फर्जीवाड़ा करके न्याय की आंखों में धूल झोंकी जा सके। यदि कोई अधिवक्ता और याचिकाकर्ता खुद को बचाने या मामले को वापस लेने के लिए कोर्ट के ही रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ और दूसरे वकीलों के जाली दस्तखत (Forgery) करते हैं, तो यह सीधे तौर पर न्याय प्रशासन को कलंकित करने जैसा है। ऐसे गंभीर कृत्य को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और आरोपियों को नए आपराधिक कानून के तहत मजिस्ट्रेट कोर्ट में मुकदमे का सामना करना होगा।

मामला क्या है?: याचिका वापस लेने के लिए जाली दस्तखत का खेल

यह पूरा विवाद संगीता गुप्ता नामक महिला द्वारा अधिवक्ता अशरफ अली के माध्यम से दायर की गई एक जनहित याचिका से शुरू हुआ था।

मूल PIL: याचिकाकर्ता संगीता गुप्ता ने कुशीनगर जिले के फतेह मेमोरियल इंटर कॉलेज और तमकुहीराज एजुकेशन सोसायटी के मैनेजर की नियुक्ति में कथित अवैधताओं को सुधारने के लिए हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी।

फर्जीवाड़ा कैसे हुआ?: याचिका के लंबित रहने के दौरान, जब याचिकाकर्ता ने इस केस को वापस (Withdraw) लेने के लिए आवेदन दिया, तो उन्होंने प्रतिवादी (Respondent) के वकील के जाली दस्तखत बना दिए। ऐसा यह दिखाने के लिए किया गया कि याचिका वापस लेने के आवेदन की एक कॉपी प्रतिवादी के वकील को मिल चुकी है (Copy Served)।

पोल खुली: प्रतिवादी पक्ष ने अदालत में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 379 (न्यायिक प्रक्रियाओं में फर्जी सबूत पेश करने या झूठ बोलने पर मुकदमा चलाने की प्रक्रिया) के तहत एक आवेदन दायर कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता संगीता गुप्ता, उनके वकील अशरफ अली और एक अन्य वकील ए.पी. सिंह मिलकर इस तरह की फर्जी याचिकाएं दायर करने के आदी हैं।

हाई कोर्ट का विधिक रुख: नए कानून BNSS के तहत चलेगा मुकदमा

मामले की गंभीरता और जाली दस्तखत के प्रथम दृष्टया सबूतों को देखते हुए अदालत ने माना कि यह कोर्ट की पवित्रता को धूमिल करने का गंभीर प्रयास है।

BNSS की धारा 215(1)(b) के तहत अपराध: कोर्ट ने कहा कि वह प्रथम दृष्टया इस बात से संतुष्ट है कि अधिवक्ता अशरफ अली और संगीता गुप्ता ने अदालती कार्यवाही को गुमराह करने और फर्जीवाड़ा करने का अपराध किया है।

मजिस्ट्रेट को शिकायत का आदेश: हाई कोर्ट ने रजिस्ट्रार (चयन एवं नियुक्ति) को निर्देश दिया कि वे छह महीने के भीतर प्रयागराज के सक्षम मजिस्ट्रेट के पास इस जालसाजी की लिखित शिकायत दर्ज कराएं।

कड़ा कानूनी संदेश: खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया: प्रयागराज के संबंधित क्षेत्राधिकारी मजिस्ट्रेट शिकायत प्राप्त होने पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं के अनुसार मामले में तुरंत आगे की कार्यवाही सुनिश्चित करेंगे।

अदालत का कड़ा संदेश: फर्जी याचिकाकर्ताओं का गठजोड़ टूटेगा

अदालत ने केवल इस केस की जालसाजी को ही नहीं कोसा, बल्कि वकीलों और मुवक्किलों के उस गठजोड़ पर भी प्रहार किया जो निजी हितों या ब्लैकमेलिंग के उद्देश्य से अदालतों में फर्जी जनहित याचिकाएं (Frivolous PILs) दायर करते हैं और पकड़े जाने के डर से धोखाधड़ी कर केस वापस लेने की कोशिश करते हैं।

विधिक केस शीट: इलाहाबाद हाई कोर्ट बनाम जाली दस्तखत मामला (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज
माननीय न्यायाधीशजस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र
केस संदर्भसंगीता गुप्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
मुख्य आरोपीअधिवक्ता अशरफ अली और याचिकाकर्ता संगीता गुप्ता
लागू नई आपराधिक संहिताBNSS, 2023 की धारा 379 और धारा 215(1)(b)
अदालत का अंतिम निर्देश6 महीने के भीतर प्रयागराज मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज कराकर मुकदमा शुरू हो

नए कानूनी प्रावधानों (BNSS 2023) के तहत इस मामले को सीधे मजिस्ट्रेट कोर्ट में मुकदमे के लिए भेजकर हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वकालत का काला कोट पहन लेने से किसी को भी आपराधिक धोखाधड़ी की छूट नहीं मिल जाती। यह आदेश अदालती फाइलों की पवित्रता बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी और स्वागत योग्य कदम है।

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