Women Legal Equality: देश की अदालतों में महिला वकीलों की सुरक्षा, समावेशी प्रतिनिधित्व (Inclusive Representation) और संस्थागत सुधारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है।
महिला वकीलों का मानना है कि उनका पेशेवर सफर बेहद कठिन: याचिका
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) द्वारा दायर एक व्यापक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। भारत की आजादी के बाद से आज तक कोई भी महिला देश की अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल नहीं बनी है। देश की 81% से अधिक महिला वकीलों का मानना है कि पुरुषों की तुलना में उनका पेशेवर सफर बेहद कठिन रहा है। कानून का पेशा (Legal Profession) केवल कागजों पर समान नहीं हो सकता; जब तक महिला अधिवक्ताओं को बुनियादी ढांचा, मातृत्व सुरक्षा और गरिमापूर्ण माहौल नहीं मिलता, तब तक उनका समानता का संवैधानिक अधिकार अधूरा है।
मामला क्या है?: 2,600 महिला वकीलों के सर्वे ने खोली सिस्टम की पोल
यह याचिका केवल कुछ मांगों का पुलिंदा नहीं है, बल्कि यह SCBA की ‘लेडीज वेलफेयर सब-कमेटी’ द्वारा देश भर की 2,600 से अधिक महिला वकीलों के बीच किए गए दो बड़े राष्ट्रीय सर्वेक्षणों (Surveys) के चौंकाने वाले आंकड़ों पर आधारित है। दिलचस्प बात यह है कि इस सर्वे की रिपोर्ट को खुद सीजेआई सूर्यकांत ने इस साल मार्च में बेंगलुरु में आयोजित SCBA के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में रिलीज किया था।
सर्वेक्षण के मुख्य और कड़वे आंकड़े
कठिन सफर: 81.3% महिला वकीलों ने माना कि पुरुष वकीलों की तुलना में उनका करियर ग्राफ बहुत चुनौतीपूर्ण और बाधाओं से भरा रहा है।
सीनियर का तमगा: 53.9% महिलाओं का दर्द था कि पुरुषों के लिए ‘सीनियर एडवोकेट’ (Senior Advocate) का दर्जा पाना महिलाओं की तुलना में कहीं ज्यादा आसान होता है।
नेटवर्किंग में रुकावट: 72.3% महिलाओं ने कहा कि देर रात अकेले सफर करने, अदालतों से देर से लौटने या बाहरी शहरों के होटलों में रुकने जैसी व्यावहारिक बंदिशों के कारण वे पुरुषों की तरह प्रोफेशनल नेटवर्किंग नहीं कर पातीं, जिससे उनका काम प्रभावित होता है।
यौन उत्पीड़न: 16.1% महिला वकीलों ने कोर्ट परिसरों या पेशे के दौरान यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment) का सामना करने की बात कबूली, जबकि 12.7% ने इस संवेदनशील विषय पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।
मातृत्व और संवैधानिक अधिकारों की दुहाई
याचिका में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड प्रज्ञा बघेल और वरिष्ठ अधिवक्ताओं (विकास सिंह, मोनिका गोसैन और अनिंदिता पुजारी) ने कोर्ट के सामने महिलाओं की जैविक और पारिवारिक मजबूरियों को विधिक रूप से रखा।
शिशु जन्म के दौरान दिक्कतें: 55.2% महिला वकीलों ने शिकायत की कि गर्भावस्था या बच्चे के जन्म के समय उन्हें अदालतों से अपने केस टालने (Deferment) या मोहलत पाने में भारी मानसिक और व्यावहारिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
रिटर्नशिप प्रोग्राम: लगभग 90% महिलाओं ने मांग की कि पारिवारिक कारणों से करियर में ब्रेक लेने वाली महिला वकीलों की दोबारा कोर्ट प्रैक्टिस शुरू कराने के लिए औपचारिक ‘रिटर्नशिप’ (Returnship) कार्यक्रम शुरू होने चाहिए।
SCBA ने अपनी दलील को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19(1)(g) और 21 (समानता, गरिमा और आजीविका का अधिकार) से जोड़ते हुए कहा कि बुनियादी ढांचे के बिना महिलाओं के लिए वकालत करने का अधिकार पूरी तरह अर्थहीन है। याचिका में अंतरराष्ट्रीय संधि CEDAW (महिलाओं के खिलाफ सभी प्रकार के भेदभाव उन्मूलन पर कंवेंशन) का भी हवाला दिया गया।
SCBA ने सुप्रीम कोर्ट से क्या-क्या मांगें की हैं?
महिला वकीलों के कार्यस्थल को बेहतर बनाने के लिए याचिका में कई विधिक और प्रशासनिक सुधारों (Reliefs) की मांग की गई है।
सरकारी पैनलों में आरक्षण: सरकारी लॉ अफसरों और वकीलों के पैनल (Empanelment) में महिलाओं के लिए जेंडर-समावेशी नीति बने।
मातृत्व नीति (Maternity Framework): चाइल्डकैअर के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (Virtual Appearance) के जरिए पेश होने और केसों को आगे बढ़ाने की विशेष विधिक छूट मिले।
क्रैच सुविधाएं (Crèche Facilities): देश की सभी छोटी-बड़ी अदालतों के भीतर कामकाजी माताओं के बच्चों के लिए फंक्शनल क्रैच (शिशुगृह) अनिवार्य हों।
मेंटल हेल्थ हेल्पलाइन: वकीलों के मानसिक तनाव को दूर करने के लिए एक समर्पित राष्ट्रीय मेंटल हेल्थ हेल्पलाइन शुरू की जाए।
चैंबर आवंटन और स्टाइपेंड: महिला वकीलों और पहली पीढ़ी के वकीलों (First-Generation Advocates) को प्राथमिकता के आधार पर कोर्ट चैंबर मिलें और जूनियर वकीलों के लिए एक न्यूनतम वजीफा (Stipend Framework) तय हो।
विधिक केस शीट: सुप्रीम कोर्ट बनाम केंद्र व राज्य (महिला वकील अधिकार वाद)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय |
| संबंधित अदालत | सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, नई दिल्ली |
| माननीय न्यायाधीश | सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना |
| याचिकाकर्ता संस्था | सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) |
| संवैधानिक आधार | भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19(1)(g) और 21 |
| वैश्विक संधियां | CEDAW (धारा 7, 8 और 11(1)(d) – समान काम के लिए समान वेतन) |
| अदालत का अंतरिम निर्देश | केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी, मामले को पुरानी लंबित याचिका के साथ टैग किया |
आजादी के 79 सालों बाद भी एक महिला का एडिसनॉल सॉलिसिटर जनरल या सॉलिसिटर जनरल के पद तक न पहुंच पाना हमारे कानूनी नेतृत्व की लैंगिक असमानता को दर्शाता है। अगर सुप्रीम कोर्ट इस याचिका के जरिए देश की सभी अदालतों में अनिवार्य क्रैच, वर्चुअल मैटर डेफरमेंट और न्यूनतम स्टाइपेंड जैसी नीतियां लागू करवा देता है, तो यह देश की हजारों प्रतिभाशाली युवा बेटियों को वकालत के पेशे में आने और टिके रहने का एक नया हौसला देगा।

