Wednesday, September 2, 2026
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Marital Rape Exception: क्या वैवाहिक दुष्कर्म की छूट पत्नी की चोट या मौत के मामलों में पति का ढाल बन सकती है?…अब सुप्रीम समीक्षा होगी

Marital Rape Exception: वैवाहिक क्रूरता और महिला अधिकारों के दायरे को लेकर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक बेहद गंभीर और नया कानूनी सवाल आया है।

एनजीओ ‘रेड डॉट फाउंडेशन’ की याचिका पर सुनवाई

चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने एनजीओ ‘रेड डॉट फाउंडेशन’ (Red Dot Foundation) की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को वैवाहिक बलात्कार की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली मुख्य याचिकाओं के साथ टैग कर दिया है और इसकी अंतिम सुनवाई 9 सितंबर 2026 तय की है।

यह है मामला

“यदि कोई पति अपनी पत्नी के साथ उसकी मर्जी के बिना जबरन शारीरिक संबंध (Non-Consensual Sexual Act) बनाता है और इस क्रूरता के कारण पत्नी को गंभीर शारीरिक चोट (Grievous Hurt) आती है या उसकी मृत्यु हो जाती है, तो क्या देश का कानून पति को ‘वैवाहिक बलात्कार की छूट’ (Marital Rape Exception) के नाम पर बचा सकता है? कानूनन बलात्कार का मुकदमा भले न चले, लेकिन क्या चोट पहुंचाने, गैर-इरादतन हत्या या मर्डर का मुकदमा भी दर्ज नहीं होगा?”

मामला क्या है?: मुख्य वैवाहिक बलात्कार मामलों से कैसे अलग है यह याचिका?

सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 63 के अपवाद 2 (जो पहले आईपीसी की धारा 375 का अपवाद था) को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं लंबित हैं। यह अपवाद कहता है कि यदि पत्नी बालिग है, तो उसके साथ पति द्वारा बनाए गए गैर-सहमति वाले शारीरिक संबंध को ‘बलात्कार’ नहीं माना जाएगा।

पुरानी याचिकाओं का रुख: वे अदालत से मांग कर रही हैं कि वैवाहिक बलात्कार को पूरी तरह से ‘आपराधिक कृत्य’ (Criminalise) घोषित किया जाए और इस अपवाद को असंवैधानिक मानकर खत्म किया जाए।

इस नई याचिका (Red Dot Foundation) का बिल्कुल अलग स्टैंड: यह याचिका एक बहुत ही गंभीर व्यावहारिक स्थिति की ओर इशारा करती है। याचिका में दलील दी गई है कि जब तक अदालत वैवाहिक बलात्कार के मुख्य अपवाद पर कोई अंतिम फैसला नहीं लेती या यदि यह अपवाद कानून में बना भी रहता है, तब भी क्या यह अपवाद पति को उन मामलों में भी अभियोजन (Prosecution) से बचा सकता है जहां जबरन किए गए कृत्य के कारण पत्नी को गंभीर चोटें आईं या उसकी जान चली गई?

हाई कोर्ट और कानूनी शून्य (Legal Vacuum) की चुनौती

वरिष्ठ अधिवक्ता एन.एस. नप्पिनाई और अधिवक्ता स्थावी अस्थाना के माध्यम से दायर इस याचिका में देश के आपराधिक ढांचे में मौजूद एक बड़े ‘लूपहोल’ (खामी) को उजागर किया गया है।

गंभीर चोट या मौत पर भी ढाल: याचिकाकर्ता का कहना है कि वर्तमान विधिक व्याख्या के कारण एक खतरनाक ‘कानूनी शून्य’ पैदा हो गया है। कई मामलों में पुलिस और निचली अदालतें इस अपवाद का हवाला देकर पतियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं करतीं, भले ही जबरन बनाए गए संबंधों के कारण पत्नी को गंभीर शारीरिक क्षति पहुंची हो या उसकी मौत हो गई हो।

अन्य आपराधिक धाराएं लागू हों: याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट यह स्पष्ट घोषणा (Declaration) करे कि वैवाहिक बलात्कार की छूट किसी भी परिस्थिति में पति को गंभीर चोट पहुंचाने (Grievous Hurt), गैर-इरादतन हत्या (Culpable Homicide) या हत्या (Murder) जैसे गंभीर अपराधों के मुकदमों से सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकती।

औपनिवेशिक मानसिकता पर प्रहार: याचिका में इस बात को फिर रेखांकित किया गया है कि यह अपवाद अंग्रेजों के जमाने की ‘अपरिवर्तनीय वैवाहिक सहमति’ (Irrevocable Marital Consent) के सिद्धांत पर आधारित है, जो आज के समय में एक विवाहित महिला के समानता, गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता (Bodily Autonomy) के मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है।

जस्टिस जे.एस. वर्मा कमेटी की सिफारिशों की अनदेखी

याचिका में कोर्ट को याद दिलाया गया कि साल 2012 के कुख्यात निर्भया सामूहिक बलात्कार मामले के बाद गठित की गई जस्टिस जे.एस. वर्मा कमेटी ने साफ शब्दों में वैवाहिक बलात्कार के इस अपवाद को कानून से हटाने की सिफारिश की थी। इसके बावजूद, संसद ने 2013 के आपराधिक कानून संशोधन और हालिया नए कानूनों (BNS) में भी इस अपवाद को बनाए रखा।

विधिक केस शीट: सुप्रीम कोर्ट बनाम केंद्र सरकार (वैवाहिक क्रूरता एवं शारीरिक क्षति वाद)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय
संबंधित अदालतसुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, नई दिल्ली
माननीय न्यायाधीशसीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना
याचिकाकर्ता संस्थारेड डॉट फाउंडेशन (NGO)
संबंधित कानूनी धाराभारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 63 का अपवाद 2
याचिका की मुख्य मांगजबरन शारीरिक संबंध से चोट या मौत होने पर पति को ‘मैरिटल रेप एक्सेप्शन’ का बचाव न मिले
सुनवाई की अगली तारीख9 सितंबर 2026 (अंतिम सुनवाई / Final Hearing)

यदि कोई पुरुष विवाह के सर्टिफिकेट को अपनी पत्नी के शरीर पर ‘क्रूरता करने का लाइसेंस’ समझ लेता है और उस क्रूरता से पत्नी की जान चली जाती है, तो कानून मूकदर्शक नहीं बना रह सकता। 9 सितंबर को होने वाली अंतिम सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्टीकरण देश की लाखों पीड़ित विवाहित महिलाओं को कम से कम उन पतियों के खिलाफ हत्या और गंभीर चोट की धाराओं में मुकदमा चलाने का अधिकार देगा जो इस अपवाद को अपनी ढाल बना लेते हैं।

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