Basic Facility: देश भर की जिला और तालुका अदालतों में महिला वकीलों और वादियों के लिए बुनियादी सुविधाओं के अभाव पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा और ऐतिहासिक रुख अपनाया है।
अदालत परिसरों में महिलाओं के लिए बुनियादी ढांचा देने को लेकर सुनवाई
चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सभी राज्यों के एडवोकेट जनरल्स (Advocate Generals) की मौजूदगी में यह सख्त आदेश जारी किया है। कोर्ट ने साफ किया कि अदालत परिसरों में महिलाओं के लिए बुनियादी ढांचा सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) से जुड़ा है। “शौचालय (Washroom) तक पहुंच होना किसी भी नागरिक का एक बुनियादी मानवाधिकार (Basic Human Right) है। देश की किसी भी राज्य सरकार या केंद्र शासित प्रदेश का यह बहाना कि उनके पास बजट या फंड की कमी (Revenue-Deficit) है, अदालत कतई स्वीकार नहीं करेगी। हमारी बेटियों और बहनों को अदालतों में जिन दयनीय स्थितियों (Shabby Conditions) में काम करना पड़ता है, वह बेहद निराशाजनक है। इसके लिए सरकारें चाहें तो शराब या तंबाकू पर अतिरिक्त टैक्स लगाएं, कोर्ट उसे भी वैध ठहराएगा, लेकिन अदालतों में फंक्शनल वॉशरुम हर हाल में होने चाहिए।
मामला क्या है?: महिला वकीलों की याचिका और जमीनी हकीकत
यह ऐतिहासिक सुनवाई कुछ महिला अधिवक्ताओं द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका पर हुई, जिसमें देश भर की अदालतों में महिलाओं के लिए बार रूम और शौचालयों की कमी का मुद्दा उठाया गया था।
शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर: वरिष्ठ अधिवक्ता जयना कोठारी ने विशेष रूप से कर्नाटक का हवाला देते हुए बताया कि तालुका स्तर की अदालतों में महिलाओं के लिए अलग से कोई वॉशरुम नहीं हैं। कई अदालतों में जो शौचालय हैं, वे फंक्शनल (चालू हालत में) नहीं हैं, जिससे महिला वकीलों के स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है।
गुजरात मॉडल की तारीफ: वरिष्ठ अधिवक्ता मोनिका गुसैन ने कोर्ट को सूचित किया कि गुजरात सरकार ने महज 4 हफ्तों के भीतर हलफनामा देकर अपने सभी 36 राजस्व जिलों में इस विधिक बुनियादी ढांचे को कवर करने की बात कही है। कोर्ट ने कहा कि अगर गुजरात ऐसा कर सकता है, तो बाकी राज्यों के लिए यह मुश्किल नहीं होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: शराब पर एक्स्ट्रा टैक्स लगाओ, लेकिन शौचालय बनाओ
सीजेआई सूर्यकांत की बेंच ने साफ कर दिया कि बजट की कमी का रोना रोकर महिलाओं की गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता।
फंड जुटाने के लिए सख्त तंज: सीजेआई ने राज्य सरकारों को कड़ा संदेश देते हुए कहा, “अगर आपके पास फंड नहीं है, तो हमें कोई आपत्ति नहीं होगी यदि आप इसके लिए शराब (Liquor) या तंबाकू (Tobacco) की बिक्री पर अतिरिक्त टैक्स या उत्पाद शुल्क लगा दें। हम अदालत में उस टैक्स को बरकरार (Uphold) रखेंगे।” इस पर हल्के-फुल्के अंदाज में अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने चुटकी लेते हुए कहा, “इसमें सोशल मीडिया सेस (Cess) भी जोड़ा जा सकता है।”
डिजिटल सबूत की मांग: सुप्रीम कोर्ट ने कागजी दावों पर भरोसा करने से इनकार करते हुए निर्देश दिया कि राज्य सरकारें 6 सप्ताह के भीतर हलफनामा दायर कर यह बताएं कि काम शुरू हो चुका है। साथ ही कोर्ट ने कहा कि यदि राज्य पेन-ड्राइव (Pen-Drive) में चल रहे निर्माण कार्य के वीडियो और तस्वीरें पेश करेंगे, तो कोर्ट उसकी सराहना करेगा।
दिव्यांगों और ट्रांसजेंडर्स के लिए भी व्यवस्था: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.डी. संजय ने बिहार का उदाहरण देते हुए बताया कि नए कोर्ट परिसरों में पुरुषों और महिलाओं के अलावा दिव्यांगों (PWD) और ट्रांसजेंडर श्रेणी के लोगों के लिए भी अलग और सुलभ शौचालयों का निर्माण किया जा रहा है, जो कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा साल 2005 के ‘राजीव कलिता बनाम भारत संघ’ मामले में दिए गए निर्देशों के अनुरूप है।
पीडब्ल्यूडी (PWD) को सीधे और कड़े निर्देश
उच्चतम न्यायालय ने इस पूरी विधिक मुहिम को समयबद्ध (Time-Bound) बनाने के लिए निर्देश जारी किए हैं।
फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट: सभी राज्यों के एडवोकेट जनरल अपने-अपने राज्यों के हाई कोर्ट, जिला कोर्ट और तालुका कोर्ट से एक जमीनी रिपोर्ट तैयार करेंगे।
4 हफ्ते में काम शुरू हो: रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपे जाने के 4 हफ्तों के भीतर सभी राज्यों के लोक निर्माण विभाग (PWD) की यह सीधी जिम्मेदारी होगी कि वे प्रभावित अदालतों में पानी और स्वच्छता सुविधाओं के साथ वॉशरुम का निर्माण कार्य तुरंत शुरू कराएं।
विधिक केस शीट: सुप्रीम कोर्ट बनाम राज्य/केंद्र शासित प्रदेश (अदालत अवसंरचना वाद)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्देश |
| संबंधित अदालत | सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, नई दिल्ली |
| माननीय न्यायाधीश | सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना |
| संबंधित संवैधानिक अधिकार | भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 (मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार) |
| मुख्य कानूनी विसंगति | जिला और तालुका अदालतों में महिलाओं के लिए कार्यात्मक शौचालयों का न होना |
| न्यायालय का सख्त आदेश | फंड की कमी का बहाना अमान्य; अतिरिक्त टैक्स लगाकर भी राजस्व जुटाने की विधिक छूट |
| समय सीमा (Timeline) | 4 हफ्ते में PWD काम शुरू करे; 6 हफ्ते में राज्य वीडियो/फोटो के साथ स्टेटस रिपोर्ट सौंपें |
सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने “फंड की कमी कोई बहाना नहीं है” कहकर और सरकारों को शराब-तंबाकू पर अतिरिक्त टैक्स लगाने तक की खुली छूट देकर नौकरशाही के भागने के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं। पेन-ड्राइव में वीडियो सबूत मांगने का कोर्ट का यह अनूठा तरीका फाइलों में होने वाले ‘कागजी विकास’ पर लगाम लगाएगा और देश की अदालतों को हमारी बहनों और बेटियों के लिए सचमुच सुरक्षित और गरिमापूर्ण कार्यस्थल बनाएगा।

