Railway Booking: सुप्रीम कोर्ट ने मालगाड़ियों के जरिए होने वाली माल ढुलाई और उसमें होने वाले नुकसान की भरपाई से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण व्यापारिक और विधिक मामले में रेलवे के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है।
रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल और गुवाहाटी हाई कोर्ट के पुराने फैसलों को सही ठहराया
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने मैसर्स बजाज ट्रेडिंग कंपनी बनाम रेलवे मामले में सुनवाई करते हुए रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल और गुवाहाटी हाई कोर्ट के पुराने फैसलों को सही ठहराया। शीर्ष अदालत ने कहा, यदि कोई व्यापारी या कंसाइनर रेलवे के माध्यम से ‘ओनर्स रिस्क’ (Owner’s Risk – मालिक के जोखिम पर) दर पर माल की बुकिंग कराता है, और रेलवे कर्मचारियों ने बुकिंग के समय खुद उस सामान की गिनती या तौल (Counting or Weighing) नहीं की है, तो रास्ते में माल कम होने (Short Delivery) पर रेलवे को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। ऐसी स्थिति में, रेलवे रसीद पर ‘सैट टू कंटेन’ (Said to Contain – ऐसा कहा गया है कि इसमें यह सामान है) लिखना रेलवे को जवाबदेही से मुक्त करता है, जब तक कि व्यापारी यह साबित न कर दे कि नुकसान रेलवे की लापरवाही के कारण हुआ था।
मामला क्या है?: 2009 का नमक विवाद, 1742 बोरियां कम होने का दावा
यह विवाद लगभग 17 साल पुराना है और गुजरात से असम के बीच नमक के परिवहन से जुड़ा है।
मूल घटना: नवंबर 2009 में अपीलकर्ता बजाज ट्रेडिंग कंपनी ने गुजरात के चिराई जंक्शन से असम के धरमनगर के लिए नमक की 40,444 बोरियां बुक की थीं।
माल की कमी: जब मालगाड़ी असम पहुंची, तो वहां कथित तौर पर केवल 38,702 बोरियां ही पाई गईं, यानी 1,742 बोरियां कम थीं। रेलवे ने माल कम होने का एक ‘शॉर्टेज सर्टिफिकेट’ तो जारी कर दिया, लेकिन मुआवजा देने से साफ मना कर दिया।
रेलवे का विधिक तर्क: रेलवे का कहना था कि यह माल ‘ओनर्स रिस्क रेट’ पर बुक किया गया था और रसीद पर ‘सैट टू कंटेन’ लिखा हुआ था। इसका मतलब यह था कि रेलवे के स्टाफ ने माल की लोडिंग के समय बोरियों की खुद गिनती नहीं की थी, बल्कि व्यापारी के दावे को ही रसीद पर दर्ज किया था।
सुप्रीम कोर्ट का विधिक रुख: व्यापारी को खुद साबित करना होगा सबूत
सर्वोच्च अदालत ने रेलवे अधिनियम, 1989 (Railways Act, 1989) के विभिन्न विधिक प्रावधानों की व्याख्या करते हुए व्यापारी की अपील को खारिज कर दिया।
धारा 97 बनाम धारा 93: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि रेलवे अधिनियम की धारा 93 रेलवे पर माल की सुरक्षा की सामान्य जिम्मेदारी डालती है, लेकिन जब माल ‘ओनर्स रिस्क’ पर बुक होता है, तो धारा 97 प्रभावी हो जाती है। धारा 97 के तहत रेलवे को केवल तभी दोषी माना जा सकता है जब रेलवे की तरफ से कोई गंभीर लापरवाही (Negligence) या दुराचरण (Misconduct) साबित हो।
केयर ऑफ ड्यूटी (Duty of Care) कब पैदा होती है?: खंडपीठ ने अपने फैसले में टिप्पणी की, “यदि रेलवे अधिकारी पारगमन (Transit) से पहले किसी भी स्तर पर माल की नोटिंग, गिनती या तौल करने में शामिल होते—जिससे उन्हें यह सटीक जानकारी होती कि कितना माल ले जाया जा रहा है—तब यह कहा जा सकता था कि उनकी जिम्मेदारी (Duty of Care) बनती है कि वे उतनी ही मात्रा सुरक्षित रूप से गंतव्य तक पहुंचाएं। लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं था।”
धारा 65(2) का विधिक बोझ: कोर्ट ने कानून की धारा 65(2) के प्रावधान का हवाला देते हुए कहा कि जब रेलवे रसीद पर ‘सैट टू कंटेन’ लिखा हो, तो यह साबित करने का कानूनी बोझ (Burden of Proof) पूरी तरह से व्यापारी या कंसाइनी पर होता है कि उन्होंने वास्तव में उतनी ही मात्रा गाड़ी में लोड की थी। अपीलकर्ता कंपनी यह साबित करने वाले दस्तावेज (जैसे नमक की खरीद, प्रोसेसिंग और डिस्पैच की रसीदें) कोर्ट में पेश करने में नाकाम रही।
विधिक केस शीट: सुप्रीम कोर्ट बनाम बजाज ट्रेडिंग कंपनी (रेलवे क्लेम विवाद)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय |
| संबंधित अदालत | सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, नई दिल्ली |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली |
| याचिकाकर्ता फर्म | मैसर्स बजाज ट्रेडिंग कंपनी (Bajaj Trading Company) |
| संबंधित कानून | रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 65(2), 93 और 97 |
| विवादित वस्तु | गुजरात से असम भेजी गई नमक की 1,742 लापता बोरियां (साल 2009) |
| न्यायालय का अंतिम निर्णय | व्यापारी की अपील खारिज; रेलवे पर मुआवजे का कोई दायित्व नहीं |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | ‘Owner’s Risk’ और ‘Said to Contain’ के मामलों में माल की मात्रा साबित करने का दायित्व कंसाइनर का है |
अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर आप कम भाड़े के चक्कर में ‘मालिक के जोखिम’ का विकल्प चुन रहे हैं और रसीद पर ‘सैट टू कंटेन’ दर्ज है, तो रास्ते में होने वाले किसी भी शॉर्टेज के लिए आप रेलवे की जेब से मुआवजा नहीं निकाल सकते, जब तक कि आप ठोस दस्तावेजों से रेलवे की क्रूर लापरवाही साबित न कर दें। यह फैसला रेलवे को फर्जी या अनवेरिफाइड दावों के कारण होने वाले भारी वित्तीय नुकसान से बचाएगा।

