Wednesday, September 2, 2026
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CPC की धारा 47: सिर्फ क्लेरिकल गलती के कारण डिक्री के लाभ से वंचित नहीं कर सकते…इलाहाबाद हाई कोर्ट ने संपत्ति विवाद में यह दिया फैसला

CPC की धारा 47: डिक्री के निष्पादन (Execution) से जुड़ी एक बेहद पुरानी कानूनी जटिलता को सुलझाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी है।

विवादित संपत्ति के विवरण में लिपिकीय या टंकण भूल होने का मामला

हाईकोर्ट के जस्टिस मनीष कुमार निगम की एकल पीठ ने स्पष्ट किया है कि डिक्री में सुधार करने की शक्ति केवल डिक्री पारित करने वाली अदालत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि निष्पादन अदालत भी विधिक अस्पष्टता को दूर करने के लिए पूरी तरह सक्षम है। यदि किसी अदालती डिक्री (Decree) में विवादित संपत्ति के विवरण को लेकर कोई लिपिकीय (Clerical) या टंकण (Typographical) संबंधी मानवीय भूल हो गई है, तो निष्पादन न्यायालय (Executing Court) सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 47 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए उस गलती को खुद सुधार सकता है। सफल वादी को सालों तक मुकदमा लड़ने के बाद सिर्फ एक लिपिकीय चूक के कारण अपनी ही संपत्ति के विधिक अधिकार (Fruits of Decree) से वंचित नहीं किया जा सकता।

मामला क्या है?: 1967 का एग्रीमेंट टू सेल और 59 साल का कानूनी सफर

यह मामला भारतीय न्याय प्रणाली में मुकदमों के लंबे खिंचने और तकनीकी अड़चनों की एक बानगी है।

विवाद की शुरुआत: प्रतिवादियों के पूर्वज ‘पूरन लाल’ ने याचिकाकर्ताओं के पूर्वज ‘माया देवी’ के खिलाफ 31 दिसंबर 1967 के एक बिक्री समझौते (Agreement to Sell) के आधार पर विशिष्ट अनुपालन (Specific Performance) का मुकदमा दायर किया था।

लंबी विधिक लड़ाई: कई दौर की कानूनी लड़ाई के बाद, अंततः प्रथम अपीलीय अदालत ने वर्ष 1975 में पूरण लाल के पक्ष में डिक्री पारित की। इस डिक्री के खिलाफ दायर की गई दूसरी अपील को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वर्ष 2006 में खारिज कर दिया था। इस बीच डिक्री धारकों (Decree-holders) ने 1994 में ही डिक्री के क्रियान्वयन (Execution) के लिए आवेदन कर दिया था।

टाइपिंग की चूक: निष्पादन प्रक्रिया के दौरान जब ड्राफ्ट सेल डीड (Draft Sale Deed) तैयार की गई, तो उसमें संपत्ति का पता ‘मोहल्ला-शिकलापुर’ दर्ज था, जबकि मूल अदालती डिक्री में क्लर्क की गलती के कारण इसे ‘मोहल्ला-गुलाब नगर’ लिख दिया गया था।

अदालती रुख: डिक्री धारकों ने निष्पादन अदालत में अर्जी देकर रिकॉर्ड और डिक्री में ‘गुलाब नगर’ की जगह ‘शिकलापुर’ करने की मांग की। निष्पादन अदालत और बाद में पुनरीक्षण अदालत (Revisional Court) ने इस सुधार को मंजूरी दे दी। इसके खिलाफ देनदारों (Judgment-debtors) ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट का विधिक दृष्टिकोण: क्या निष्पादन अदालत डिक्री के पीछे जा सकती है?

आमतौर पर यह स्थापित विधिक सिद्धांत है कि निष्पादन अदालत मूल डिक्री के ‘पीछे नहीं जा सकती’ (Cannot go behind the decree)। लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले में सीपीसी की धारा 47 की सीमाओं और अपवादों को रेखांकित किया।

धारा 47(1) के तहत अनिवार्य शक्ति: जस्टिस मनीष कुमार निगम ने अपने फैसले में कहा, जहां डिक्री की शर्तें स्पष्ट और असंदिग्ध हैं, वहां उन शर्तों को उसी रूप में लागू किया जाना चाहिए। हालांकि, जहां भी डिक्री अस्पष्ट या भ्रामक है, वहां निष्पादन अदालत के लिए यह पूरी तरह न्यायसंगत है कि वह डिक्री के पीछे जाकर मूल निर्णय (Judgment) और पक्षकारों के अभिवचनों (Pleadings) को देखे ताकि उस विधिक अस्पष्टता को दूर किया जा सके। सीपीसी की धारा 47 ऐसी प्रक्रिया को अपनाने में आड़े नहीं आएगी।

सच्चाई से अवगत थे पक्षकार: कोर्ट ने रिकॉर्ड की समीक्षा में पाया कि मूल वाद (Plaint) के मुख्य हिस्से में संपत्ति का पता ‘शिकलापुर’ ही लिखा था, जो मूल एग्रीमेंट से मेल खाता था। केवल वाद के अंत में क्लर्क की टाइपिंग गलती से ‘गुलाब नगर’ छप गया था। प्रतिवादी ने ट्रायल कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट तक कभी भी संपत्ति की पहचान को लेकर कोई विवाद नहीं उठाया था, इसलिए निष्पादन के स्तर पर आकर वे यह दावा नहीं कर सकते कि उन्हें भ्रमित किया गया था।

धारा 152 और 47 का समन्वय: कोर्ट ने माना कि यह चूक पूरी तरह से आकस्मिक और टंकण संबंधी थी। ऐसी गलतियों को सीपीसी की धारा 152 (लिपिकीय गलतियों का सुधार) या धारा 47 (निष्पादन के प्रश्नों का निर्धारण) दोनों के तहत ठीक किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के नजीर का हवाला: ‘प्रतिभा सिंह बनाम शांति देवी’

हाई कोर्ट ने अपने फैसले को मजबूती देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय प्रतिभा सिंह बनाम शांति देवी प्रसाद (Pratibha Singh v. Shanti Devi Prasad) का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में व्यवस्था दी थी कि किसी सफल वादी को किसी आकस्मिक पर्ची या अनजाने में हुई क्लैरिकल गलती के कारण मुकदमे के अंतिम परिणाम से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के ‘विलय के सिद्धांत’ (Doctrine of Merger) के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि यहां सवाल डिक्री के विलय का नहीं, बल्कि न्याय के हित में निष्पादन अदालत को मिली विधिक शक्तियों के इस्तेमाल का है।

विधिक केस शीट: सीपीसी धारा 47 बनाम डिक्री संशोधन वाद (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय, उत्तर प्रदेश
माननीय न्यायाधीशजस्टिस मनीष कुमार निगम (एकल पीठ)
संबद्ध कानूनी धाराएंसिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 47 और धारा 152
मुख्य कानूनी सिद्धांतडिक्री के अस्पष्ट होने पर निष्पादन कोर्ट फैसले और अभिवचनों (Pleadings) को देख सकता है
विवाद की प्रकृतिडिक्री में संपत्ति के पते (मोहल्ला) की टाइपोग्राफिकल/लिपिकीय त्रुटि
न्यायालय का अंतिम निर्देशयाचिकाएं खारिज; निष्पादन अदालत द्वारा डिक्री में पते के सुधार को वैध माना गया

जस्टिस मनीष कुमार निगम ने स्पष्ट संदेश दिया है कि न्याय का उद्देश्य डिक्री के व्यावहारिक लाभ को पीड़ित पक्ष तक पहुंचाना है, न कि उसे तकनीकी शब्दों के मायाजाल में फंसाना। 1967 से शुरू हुए इस 59 साल पुराने कानूनी सफर के अंत में कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि अनजाने में हुई क्लैरिकल गलतियों को सुधारने के लिए निष्पादन अदालतें पूरी तरह सशक्त हैं।

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