Friday, July 31, 2026
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Judicial Officer Road Rage: न्यायिक पद को कोर्ट रूम के बाहर उतारा नहीं जा सकता…रोड रेज मामले में जज पर सख्त रुख; कार्रवाई पर लगाई रोक

केस मैट्रिक्स: Karnataka High Court Order on Judicial Officer Road Rage

पहलूविवरण
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस एम. नागप्रसन्ना (Justice M Nagaprasanna)
संबंधित अधिकारीगायत्री (मुख्य सिविल जज एवं न्यायिक मैजिस्ट्रेट, मालूर)
मूल मामलाओवरटेक करने पर रोड रेज व पुलिस का दुरुपयोग कर झूठी प्राथमिकी दर्ज कराना
अदालत का निर्णयपीड़ितों पर जांच पर रोक; प्रशासनिक/अनुशासनात्मक कार्रवाई हेतु चीफ जस्टिस को मामला प्रेषित

Judicial Officer Road Rage: कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक रोड रेज (Road Rage) विवाद में अपने न्यायिक पद का कथित दुरुपयोग करने पर एक महिला जज (माहुर की मुख्य सिविल जज एवं न्यायिक मैजिस्ट्रेट) को कड़ी फटकार लगाई है।

जस्टिस एम. नागप्रसन्ना (Justice M Nagaprasanna) की पीठ ने आरोपी दोपहिया चालकों की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि एक जज का आचरण कोर्ट रूम के बाहर भी संस्थान में जनविश्वास को प्रभावित करता है। सीसीटीवी फुटेज (CCTV Footage) देखने के बाद हाई कोर्ट ने माना कि जज ने न केवल दोपहिया वाहन चालकों के साथ बहस की, बल्कि पुलिस प्रभाव का इस्तेमाल कर उनके खिलाफ आपराधिक मामला भी दर्ज करवा दिया।

कर्नाटक हाई कोर्ट (जस्टिस एम. नागप्रसन्ना) की प्रमुख टिप्पणियां

अदालत ने घटना के वायरल वीडियो और पुलिस की एकतरफा कार्रवाई पर कर्नाटक हाई कोर्ट का कड़ा रुख, यदि वीडियो को देखा जाए, तो यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि एक न्यायिक अधिकारी के लिए अपनी कार से उतरकर आम इंसान से बहस करना पूरी तरह से अनुचित है। उनका केवल इतना कथित अपराध था कि उन्होंने जज की निजी कार को ओवरटेक किया और कार धीरे चलाने को कहा। यदि इससे न्यायिक अधिकारी का अहंकार आहत हुआ, तो यह न्यायिक पद के दुरुपयोग का इससे बड़ा उदाहरण नहीं हो सकता।

न्यायिक पद ऐसा नहीं है जिसे कोर्ट रूम के भीतर पहना जाए और उसकी चौखट पर उतार दिया जाए। यह पद निरंतर जनविश्वास से जुड़ा है। अदालत के भीतर क्या होता है केवल वही मायने नहीं रखता; अदालत के बाहर का आचरण भी संस्थान में जनता के विश्वास को बनाए रखता है या उसे तोड़ता है।

मामला क्या था?: ओवरटेक करने पर पीछा और 70 वर्षीय बुजुर्ग की गिरफ्तारी

  1. घटनाक्रम: सिविल जज गायत्री और उनके पति अपनी निजी इनोवा कार में यात्रा कर रहे थे। एक दोपहिया वाहन पर सवार दो व्यक्तियों ने उनकी कार को ओवरटेक किया। आरोप है कि इससे जज और उनके पति का अहंकार आहत हुआ और उन्होंने अपनी कार से दोपहिया का पीछा कर उन्हें रोका और कहासुनी की।
  2. पुलिस की मनमानी कार्रवाई: जज के कहने पर पुलिस ने मामला दर्ज किया और केवल दोपहिया सवार दो व्यक्तियों को ही नहीं, बल्कि एक 70 वर्षीय बुजुर्ग (तीसरे व्यक्ति) को भी हिरासत में ले लिया, जिसका घटना से कोई लेना-देना नहीं था।
  3. वकीलों की संस्था का विरोध: बेंगलुरु एडवोकेट्स एसोसिएशन (AAB) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डी.आर. रविशंकर ने कोर्ट को बताया कि एसोसिएशन ने उक्त जज के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए पहले ही प्रशासनिक न्यायाधीश को आवेदन दिया है, क्योंकि उनका आचरण पहले भी विवादों में रहा है।

हाई कोर्ट का अंतिम आदेश

  • आपराधिक जांच पर अंतरिम रोक: हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता दोपहिया सवारों के खिलाफ दर्ज एफआईआर की आगे की जांच पर अंतरिम स्टे (Interim Stay) लगा दिया।
  • चीफ जस्टिस को अनुशासनात्मक कार्रवाई हेतु सिफारिश: कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि इस आदेश की प्रति कर्नाटक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के समक्ष रखी जाए ताकि उक्त महिला जज के खिलाफ उचित प्रशासनिक और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सके।
  • पुलिस की खिंचाई: अदालत ने कहा कि केवल इसलिए कि शिकायतकर्ता एक जज हैं, नागरिकों के साथ इस तरह का मनमाना व्यवहार नहीं किया जा सकता।

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