3-Year Law Practice Rule: सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की सीधी भर्ती परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों के लिए 3 साल के वकालत/कानूनी अभ्यास (3-Year Legal Practice Mandate) की अनिवार्यता को चुनौती देने वाली पुनर्विचार याचिकाओं (Review Petitions) और रिट याचिकाओं पर सुनवाई पूरी कर अपना फैसला सुरक्षित (Reserved Verdict) रख लिया है।
मुख्य न्यायाधीश CJI सूर्या कांत (CJI Surya Kant), जस्टिस अगस्त्य जॉर्ज मसीह (Justice August George Masih) और जस्टिस के. विनोद चंद्रन (Justice K Vinod Chandran) की तीन जजों की पीठ ने विभिन्न वकीलों, न्यायमित्र (Amicus Curiae) और हस्तक्षेपकर्ताओं की दलीलें सुनने के बाद यह फैसला सुरक्षित किया।
सुनवाई के मुख्य बिंदु और दलीलें (Key Arguments)
| पक्ष / वरिष्ठ अधिवक्ता | मुख्य दलीलें / सुझाव |
| नियम का विरोध करने वाले वकील | • 3 साल के इंतजार की वजह से प्रतिभाशाली युवा और नए ग्रेजुएट्स न्यायपालिका में आने से हतोत्साहित होंगे। • इसका सबसे प्रतिकूल असर महिलाओं और दिव्यांगजनों (PwD) पर पड़ेगा। |
| वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद | • लिटिगेशन अनुभव के बजाय भर्ती के बाद न्यायिक प्रशिक्षण (Judicial Training) को मजबूत करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। • पूरे देश में राज्य न्यायिक अकादमियों के अलग-अलग मानकों की जगह एक समान प्रशिक्षण ढांचा (Uniform Training Framework) लागू होना चाहिए। |
| वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंसाल्वेस | • उम्मीदवारों को 3 साल तक वकालत में लगाने के बजाय लॉ स्कूल से निकलते ही संस्थागत प्रशिक्षण (Institutional Training) दिया जाना चाहिए। • नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज (NLUs) और कानून की अकादमियों ने भी इस 3 साल की शर्त का विरोध किया है। |
| एमिकस क्यूरी (सिद्धार्थ भटनागर) | • पूर्ण छूट देने के बजाय कुछ श्रेणियों को सीमित राहत दी जा सकती है (जैसे- महिलाओं और दिव्यांगजनों के लिए क्वालिफाइंग मार्क्स में छूट)। • न्यायिक क्लर्कशिप (Judicial Clerkships) को 3 साल के अनुभव में गिना जाना चाहिए। • PSU के लॉ अफसरों के अनुभव को भी इसमें शामिल करने का आवेदन दिया गया। |
पृष्ठभूमि: 2002 से 2026 तक का घटनाक्रम
- 2002 का फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में नए लॉ ग्रेजुएट्स को बिना किसी बार (Bar) अनुभव के सीधे ज्यूडिशियरी परीक्षा में बैठने की अनुमति दी थी।
- मई 2025 का फैसला: मई 2025 में कोर्ट ने अपने पुराने फैसले को पलटते हुए 3 साल के वकालत के अनुभव को फिर से अनिवार्य कर दिया, ताकि सिविल जजों के पास व्यावहारिक परिपक्वता हो।
- 2026 में पुनर्विचार: मई 2025 के इस आदेश के खिलाफ भारी विरोध और समीक्षा याचिकाएं दायर की गईं, जिस पर कोर्ट ने पुनर्विचार शुरू किया।
- महिलाओं पर प्रभाव: सुनवाई के दौरान CJI सूर्या कांत ने मौखिक टिप्पणी में चिंता जताई थी कि 3 साल का वेटिंग पीरियड महिला अभ्यर्थियों को पारिवारिक और सामाजिक दबावों के कारण न्यायिक सेवा से बाहर कर सकता है।

