केस का संक्षिप्त ब्योरा (Case Snapshot)
| पहलू | विधिक विवरण |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय पीठ | जस्टिस जे.बी. पारदीवाला एवं जस्टिस के. विनोद चंद्रन |
| केस का प्रकार | स्वतः संज्ञान (Suo Moto Writ Petition – प्रिजन सुधार व जातिगत भेदभाव) |
| न्याय मित्र (Amicus Curiae) | डॉ. एस. मुरलीधर (Senior Advocate) |
| एडिशनल सॉलिसिटर जनरल | ऐश्वर्या भाटी (Aishwarya Bhati) |
| मुख्य कानूनी आधार | सुकन्या शांता बनाम भारत संघ निर्णय व मॉडल प्रिजन मैनुअल |
| अगली सुनवाई की तिथि | 10 सितंबर 2026 |
Model Prison Manual: जेलों में जातिगत भेदभाव, लिंग और विकलांगता के आधार पर होने वाले पक्षपात को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक और ऐतिहासिक आदेश जारी किया है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला (Justice JB Pardiwala) और जस्टिस के. विनोद चंद्रन (Justice K Vinod Chandran) की पीठ ऐतिहासिक सुकन्या शांता (Sukanya Shantha) फैसले के बाद जेलों में हो रहे जातिगत भेदभाव पर स्वतः संज्ञान (Suo Moto) मामले की निगरानी कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) को मॉडल प्रिजन मैनुअल (Model Prison Manual) के तहत प्रत्येक जिले में ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ (Board of Visitors – BoV) का गठन करने का कड़ा निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक जिले में बनने वाले इस बोर्ड की अध्यक्षता उस जिले के प्रधान जिला न्यायाधीश (Principal District Judge) करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश की मुख्य बातें
जेलों की बाहरी निगरानी का वैधानिक तंत्र
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बोर्ड ऑफ विजिटर्स (BoV) का गठन DLSA और BoV का संयुक्त निरीक्षण
• अध्यक्ष: जिले के प्रधान जिला न्यायाधीश (PDJ)। • जेलों में जाति आधारित भेदभाव/सफाई कार्यों
• प्रत्येक जिले और उप-जेल (Sub-jails) स्तर पर अनिवार्य। का संयुक्त निरीक्षण कर रिपोर्ट NALSA को सौंपेंगे।
न्याय मित्र (Amicus Curiae) की रिपोर्ट पर संज्ञान
पूर्व उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर (Dr S Muralidhar), जिन्हें इस मामले में न्याय मित्र (Amicus Curiae) नियुक्त किया गया है, ने अपनी स्टेटस रिपोर्ट में कोर्ट को बताया कि:
- मॉडल प्रिजन मैनुअल के क्लॉज़ 29.01 के तहत बाहरी जेल निगरानी के लिए किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश ने अब तक जिला-वार ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ (BoV) का गठन नहीं किया है।
- सुकन्या शांता फैसले के पैराग्राफ 254(viii) में स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण (DLSA) और बोर्ड ऑफ विजिटर्स (BoV) को जेलों का संयुक्त निरीक्षण करना अनिवार्य है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जातिगत भेदभाव पूरी तरह बंद हो चुका है।
जातिगत डेटा और रजिस्टरों से कॉलम हटाने का मुद्दा
अदालत ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी (Aishwarya Bhati) को निर्देश दिया कि वे सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ समन्वय बनाकर निम्नलिखित बिंदुओं पर जानकारी एकत्र करें:
- जेल रजिस्टरों और फॉर्मों से जाति वाले कॉलम (Caste Columns) को पूरी तरह हटाना।
- असम, मध्य प्रदेश, मेघालय और चंडीगढ़ द्वारा अपनाई गई जातिगत डेटा संग्रह प्रणाली का अध्ययन कर अन्य राज्यों में लागू करना।
- जेलों में सफाई कार्य के आउटसोर्सिंग (Outsourcing of cleaning work) की स्थिति।
- अर्नेश कुमार और अमानतुल्लाह खान मामलों के दिशानिर्देशों का पालन।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्देश और समयसीमा
- BoV का गठन: सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश तुरंत प्रभाव से प्रत्येक जिले में बोर्ड ऑफ विजिटर्स (BoV) का गठन करें, जिसकी अध्यक्षता प्रधान जिला न्यायाधीश (PDJ) करेंगे।
- कानूनों/मैनुअल में संशोधन: जिन राज्यों के जेल नियमों या मैनुअल में भेदभावपूर्ण (Offending) प्रावधान हैं, उन्हें संशोधित करने की वर्तमान स्थिति प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया है।
- समयसीमा (Timeline):
- राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की अनुपालन रिपोर्ट 3 सितंबर 2026 तक जमा करनी होगी।
- सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर अब अगली सुनवाई 10 सितंबर 2026 को करेगा।
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश भारत की जेल प्रणाली के भीतर दशकों से चले आ रहे जातिगत भेदभाव और मानवाधिकार उल्लंघनों को खत्म करने की दिशा में एक बहुत बड़ा प्रशासनिक कदम है। प्रधान जिला न्यायाधीशों की अगुवाई में ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ के गठन से जेलों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होगी।

