केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | राजस्थान उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (2026) |
| संबंधित अदालत | राजस्थान उच्च न्यायालय (Rajasthan High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू |
| केस संदर्भ | 2026 LiveLaw (Raj) 308 |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या जांच के दौरान मिली जानकारी के आधार पर दूसरी FIR (Second FIR) दर्ज की जा सकती है? |
| अदालत का विधिक स्टैंड | हाँ। यदि नई सामग्री किसी अलग अपराध या व्यापक साजिश (Larger Conspiracy) का खुलासा करती है जो पहले लेनदेन से अलग है, तो दूसरी FIR पूरी तरह वैध है। |
| BNS पर स्पष्टीकरण | BNS के तहत मामला दर्ज होगा या IPC के तहत, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अपराध किस तारीख को अंजाम दिया गया। |
| अंतिम निर्णय | FIR रद्द करने की याचिका खारिज (Dismissed)। |
Second FIR Case: राजस्थान हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों में दूसरी FIR दर्ज करने से जुड़े एक महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत को दोहराया है। अदालत ने माना है कि केवल इसलिए कि बाद की FIR का आधार बनने वाली सामग्री पहली FIR की जांच के दौरान सामने आई थी, बाद में दर्ज की गई दूसरी FIR अवैध या रद्द करने योग्य नहीं हो जाती।
जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की एकल पीठ ने याचिका खारिज करते हुए टिप्पणी की कि यदि बाद में सामने आई जानकारी किसी अलग घटना, भिन्न आपराधिक गतिविधि या किसी बड़ी साजिश (Larger Conspiracy) को उजागर करती है जो एक ही लेनदेन (Same Transaction) का हिस्सा नहीं है, तो दूसरी FIR का पंजीकरण पूरी तरह से कानूनी रूप से अनुमत है।
मामला क्या था? (Case Background)
- यह याचिकाकर्ता द्वारा दायर की गई एक FIR को रद्द करने (Quashing Petition) की याचिका थी, जिसमें तर्क दिया गया था कि नई एफआईआर उसी लेनदेन से संबंधित है जिसके लिए पहले ही IPC की धारा 420 के तहत एक पहली FIR दर्ज की जा चुकी थी और दोनों में लगभग समान आरोप थे।
- राज्य सरकार का पक्ष: राज्य ने अदालत को बताया कि पहली FIR एक व्यक्तिगत शिकायतकर्ता के आधार पर दर्ज की गई थी, जिसने धोखाधड़ी का आरोप लगाया था।
- जांच में बड़ा खुलासा: हालांकि, पहली FIR की जांच के दौरान याचिकाकर्ता के ठिकानों से ऐसी सामग्री बरामद हुई जिससे यह बात सामने आई कि यह मामला केवल एक व्यक्ति से धोखाधड़ी तक सीमित नहीं था, बल्कि याचिकाकर्ता एक संगठित साइबर-धोखाधड़ी (Organized Cyber-Fraud) गतिविधियों में शामिल था।
- फॉरेक्स ट्रेडिंग और फर्जी फर्में: जांच में पाया गया कि आरोपी अपनी कंपनी (‘कैपामॉरफेक्स’) के जरिए लोगों को फॉरेक्स ट्रेडिंग में उच्च रिटर्न का लालच देकर भारी रकम निवेश कराते थे। इस पैसे को विभिन्न फर्जी फर्मों और बैंक खातों के माध्यम से रूट किया जाता था और आभासी मुद्रा (USDT/Virtual Currency) में लेनदेन किया जाता था।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: “पहली FIR की जांच में सामग्री मिलने मात्र से नई FIR अमान्य नहीं होती”
जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की पीठ ने उच्चतम न्यायालय के विभिन्न ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत तय किए।
एक ही लेनदेन (Same Transaction) बनाम बड़ी साजिश (Larger Conspiracy)
अदालत ने कहा कि यदि दूसरी FIR का दायरा और प्रकृति पहली FIR से काफी व्यापक और भिन्न है, या वह किसी व्यापक आपराधिक साजिश को उजागर करती है, तो यह नहीं माना जा सकता कि दोनों एफआईआर एक ही लेनदेन से जुड़ी हैं। इसलिए दूसरी FIR दर्ज करना कानूनन सही है।
नए कानून (BNS) के लागू होने का सिद्धांत
याचिकाकर्ता का एक तर्क यह भी था कि चूंकि पहली FIR वर्ष 2023 से संबंधित थी, इसलिए इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रावधान लागू नहीं किए जा सकते थे। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा, BNS की प्रयोज्यता (Applicability) इस बात पर निर्भर करेगी कि वर्तमान FIR में कथित अपराध का गठन करने वाले कृत्य कब किए गए थे। इसका निर्धारण जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री के आधार पर किया जा सकता है। इसलिए, इस चरण में केवल इस आधार पर वर्तमान FIR को रद्द नहीं किया जा सकता कि पहली FIR वर्ष 2023 के लेनदेन से संबंधित थी।
निर्णय (Court Verdict)
राजस्थान उच्च न्यायालय ने पाया कि वर्तमान एफआईआर में लगाए गए आरोपों की प्रकृति और दायरा पहली एफआईआर से पूरी तरह से अलग और व्यापक था। इसे ‘एक ही लेनदेन’ का हिस्सा नहीं माना जा सकता। इन निष्कर्षों के साथ अदालत ने FIR रद्द करने की याचिका को खारिज (Dismissed) कर दिया।

