नीतिगत एवं विधिक सारांश (Policy Overview Matrix)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश |
| माननीय पीठ | CJI सूर्या कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची एवं जस्टिस वी. मोहना |
| मुख्य मुद्दा | राज्य अधीनस्थ न्यायपालिका (Subordinate Judiciary) के अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाना |
| राज्यों का तर्क | वित्तीय बोझ (Financial Liability) की आड़ में प्रस्ताव का विरोध |
| अदालत का फैसला | नए अधिकारियों की भर्ती से ज्यादा सस्ता अनुभवी न्यायाधीशों को बनाए रखना है; 2 सप्ताह में पुनर्विचार के निर्देश। |
Retirement Age Of Judges’: राज्य सरकारों द्वारा न्यायिक अधिकारियों (Judicial Officers) की सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने के प्रस्ताव का विरोध करने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्या कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सभी राज्य सरकारों को दो सप्ताह के भीतर इस निर्णय पर पुनर्विचार करने और एक स्वतंत्र व व्यावहारिक फैसला लेने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि राज्यों द्वारा वित्तीय बोझ (Financial Burden) का बहाना बनाकर सेवानिवृत्ति आयु न बढ़ाना एक “गलतफहमी” (Misconceived) पर आधारित तर्क है।
सुप्रीम कोर्ट का तर्क: अनुभवी न्यायिक अधिकारियों का जारी रहना अधिक किफायती
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुभवी न्यायाधीशों की सेवाएं जारी रखने से राज्यों पर नया वित्तीय बोझ नहीं पड़ता, बल्कि नए अधिकारियों की भर्ती की तुलना में यह अधिक किफायती है।
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी: “विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा अतिरिक्त वित्तीय बोझ के आधार पर न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाने से इनकार करने के कारण गलत धारणा पर आधारित प्रतीत होते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि अनुभवी और परिपक्व न्यायिक अधिकारियों की निरंतरता से राज्य पर उनकी सेवानिवृत्ति के बाद (रिक्तियों को भरने में) होने वाले खर्च की तुलना में कम वित्तीय देनदारी आएगी।”
Retirement Age Of Judges’: फैसले और निर्देशों के मुख्य बिंदु
- समान सरकारी कर्मचारियों से अलग फैसला लें: शीर्ष अदालत ने राज्यों से आग्रह किया है कि वे अन्य सरकारी कर्मचारियों के लिए लागू सेवानिवृत्ति आयु की परवाह किए बिना न्यायिक अधिकारियों के लिए एक स्वतंत्र निर्णय लें।
- हाई कोर्ट की आपत्तियों के बावजूद निर्णय लें: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि संबंधित उच्च न्यायालयों (High Courts) ने पहले कोई आपत्ति व्यक्त की थी, तब भी राज्य सरकारों को सकारात्मक निर्णय लेने से पीछे नहीं हटना चाहिए। राज्यों को अपने स्तर पर सभी प्रासंगिक पहलुओं पर विचार कर स्वतंत्र फैसला लेना होगा।
- फुल कोर्ट मीटिंग (Full Court Meetings) में विचार: हाई कोर्ट्स को निर्देश दिया गया है कि वे अपनी ‘फुल कोर्ट’ बैठकों में इस मुद्दे पर विचार-विमर्श करें और अपने विचार संबंधित राज्य सरकारों को भेजें।
- अंतरिम अवधि में सेवानिवृत्त होने वालों को भी लाभ: यदि कोई राज्य सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाने का निर्णय लेता है, तो इसका लाभ उन न्यायिक अधिकारियों को भी दिया जाना चाहिए जो इस निर्णय की प्रक्रिया के दौरान सेवानिवृत्त हो रहे हैं।
- समय-सीमा: पूरी प्रक्रिया को प्राथमिकता के आधार पर दो सप्ताह के भीतर पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं।
2024 के फैसले का हवाला
शीर्ष अदालत ने रेखांकित किया कि वह 2024 के अपने एक फैसले में इस मुद्दे के वित्तीय पहलुओं पर पहले ही विस्तार से चर्चा कर चुकी है। कोर्ट ने दोहराया कि न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति से उत्पन्न रिक्तियों को भरने के लिए नई भर्ती प्रक्रिया आयोजित करना, प्रशिक्षण देना और नए बुनियादी ढांचे पर खर्च करना राज्यों के लिए अधिक खर्चीला साबित होता है।

