केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (अगस्त 2026) |
| मामले का नाम | दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (DTU) बनाम भारत सिंह रावत |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति पमिडीघंटम श्री नरसिम्हा एवं न्यायमूर्ति आलोक अराधे |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | अनुसमर्थन का सिद्धांत (Doctrine of Ratification) एवं Approbation and Reprobation |
| अदालत का फैसला | DTU की अपील स्वीकार; कर्मचारी की बहाली का हाई कोर्ट का आदेश रद्द। |
Service Law: सुप्रीम कोर्ट ने सेवा कानून (Service Law) और प्रशासनिक कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा निर्णय सुनाया है।
न्यायमूर्ति पमिडीघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (DTU) द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कर्मचारी भरत सिंह रावत को बहाल करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी स्वेच्छा से त्यागपत्र (Resignation) देता है, उससे मिलने वाले सभी वित्तीय व सेवा लाभ प्राप्त करता है और उस अनुभव प्रमाण पत्र के आधार पर नई नौकरी हासिल कर लेता है, तो वह बाद में प्रारंभिक स्वीकृति देने वाले प्राधिकारी (Authority) में तकनीकी खामी का हवाला देकर अपना इस्तीफा वापस लेने या बहाली (Reinstatement) की मांग नहीं कर सकता।
मामला क्या था? (Background)
- इस्तीफा और स्वीकृति: DTU के कर्मचारी भारत सिंह रावत ने 19 मई 2016 को नोटिस अवधि (Notice Period) की छूट मांगते हुए अपना इस्तीफा सौंपा। कुलपति (VC) की अनुपस्थिति में कुलपति का प्रभार संभाल रहे प्रोफेसर ने 25 मई 2016 को इस्तीफा स्वीकार कर लिया।
- लाभों की प्राप्ति व नई नौकरी: कर्मचारी को कार्यमुक्त (Relieve) कर दिया गया और उसने अपना नो-ड्यूज सर्टिफिकेट, लास्ट पे सर्टिफिकेट (LPC) और अनुभव प्रमाण पत्र प्राप्त कर लिया। इस अनुभव प्रमाण पत्र का उपयोग करके उसने एनआईटी कालीकट (NIT Calicut) में डिप्टी रजिस्ट्रार का पद हासिल कर लिया।
- इस्तीफा वापसी का प्रयास: लगभग चार महीने बाद (22 सितंबर 2016) कर्मचारी ने अपना इस्तीफा वापस लेने की मांग की और तर्क दिया कि उसका इस्तीफा सक्षम प्राधिकारी यानी बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट (BOM) द्वारा स्वीकार नहीं किया गया था।
- BOM द्वारा अनुसमर्थन (Ratification): 26 सितंबर 2016 को DTU के बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट (BOM) ने कुलपति द्वारा स्वीकार किए गए इस्तीफे को मंजूरी (Ratify) दे दी और इस्तीफा वापसी की अर्जी खारिज कर दी।
- हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट: हाई कोर्ट की एकल और खंडपीठ ने कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उसकी बहाली का आदेश दिया था, जिसके खिलाफ DTU ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां (Key Supreme Court Observations)
न्यायमूर्ति आलोक अराधे द्वारा लिखे गए फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने हाई कोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए दो मुख्य कानूनी सिद्धांतों को रेखांकित किया।
आप केक खा भी नहीं सकते और उसे बचाकर भी नहीं रख सकते (Approbation and Reprobation)
कोर्ट ने कहा कि कोई कर्मचारी अपनी सुविधानुसार दोहरे रुख नहीं अपना सकता।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “राहत, सेटलमेंट और सर्टिफिकेट प्राप्त करने के बाद और उस सर्टिफिकेट का उपयोग दूसरी नियुक्ति का दरवाजा खोलने के लिए करने के बाद, कर्मचारी उस इस्तीफे को अमान्य नहीं ठहरा सकता जिसे उसने खुद प्राप्त किया था… वह दोनों तरफ का लाभ (Have his cake and eat it too) नहीं उठा सकता।”
अनुसमर्थन का सिद्धांत (Doctrine of Ratification)
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि प्रारंभिक स्वीकृति बिना पूर्ण अधिकार वाले प्राधिकारी द्वारा दी गई थी, तो सक्षम प्राधिकारी (BOM) द्वारा बाद में किया गया अनुसमर्थन (Ratification) उसे शुरुआत की तिथि से ही वैध बना देता है।
अनुसमर्थन के सिद्धांत पर सुप्रीम कोर्ट के 6 विधिक नियम (Principles of Ratification)
सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसमर्थन के सिद्धांत पर निम्नलिखित 6 मुख्य विधिक बिंदु तय किए।
- अवैध कार्य को वैध बनाना: अनुसमर्थन का अर्थ किसी पहले से किए गए अनधिकृत कार्य को बाद में स्वीकृति देकर वैध बनाना है।
- पूर्व अधिकार के बराबर: बाद में दिया गया अनुसमर्थन कानून की नजर में पूर्व स्वीकृति के समान ही माना जाता है (Ratihabitio mandato aequiparatur)।
- भूतलक्षी प्रभाव (Retrospective Effect): अनुसमर्थन उस मूल तिथि से लागू होता है जिस दिन वह अनधिकृत कार्य किया गया था, न कि केवल अनुसमर्थन की तारीख से।
- केवल सक्षम प्राधिकारी द्वारा संभव: अनुसमर्थन केवल वही प्राधिकारी कर सकता है जिसे कानूनन वह कार्य करने का अधिकार प्राप्त हो।
- स्पष्ट स्वीकृति पर्याप्त: सक्षम प्राधिकारी का एक नया आदेश पारित करना आवश्यक नहीं है; बोर्ड का प्रस्ताव या निर्णय ही वैध अनुसमर्थन माना जाएगा।
- गैर-कानूनी कार्यों का अनुसमर्थन नहीं: अनुसमर्थन केवल अधिकार क्षेत्र की कमी (Defect of Authority) को ठीक करता है, लेकिन उन कार्यों को वैध नहीं बना सकता जो कानूनन स्वतः शून्य (Void/Illegal) हों।

