केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (अगस्त 2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी (इलाहाबाद उच्च न्यायालय) |
| याचिका का प्रकार | RTI अधिनियम, 2005 के तहत रिट याचिका (Party-in-Person) |
| मुख्य सिद्धांत | 1. RTI का उपयोग न्याय प्रशासन को बाधित करने के लिए नहीं हो सकता। 2. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा है, मौलिक अधिकार नहीं। |
| अदालत का आदेश | याचिका खारिज; ₹6.7 लाख का जुर्माना हाई कोर्ट लीगल सर्विस कमेटी में 4 सप्ताह में जमा करने का निर्देश। |
RTI ACT-I: इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) का बार-बार दुरुपयोग करने, कोर्ट के आंतरिक कामकाज से जुड़ी भ्रामक आरटीआई अर्जियां दाखिल करने और अदालती कार्यवाही की मर्यादा को ठेस पहुंचाने पर स्वयं पैरवी (Party-in-Person) कर रहे एक याचिकाकर्ता पर ₹6.70 लाख का भारी जुर्माना (Costs) लगाया है।
न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग (UP SIC) के आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को जुर्माने की पूरी राशि 4 सप्ताह के भीतर हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी (High Court Legal Services Committee) में जमा करने का आदेश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि और हाई कोर्ट का रुख
- मूल मामला और सूचना आयोग का आदेश:
- याचिकाकर्ता ने यूपी राज्य सूचना आयोग के 28 जुलाई 2023 के आदेश को चुनौती देते हुए दावा किया था कि उसे आरटीआई के तहत मांगी गई पूरी जानकारी नहीं मिली है।
- हालांकि, रिकॉर्ड की जांच के बाद हाई कोर्ट ने पाया कि वांछित जानकारी पहले ही पंजीकृत डाक से भेजी जा चुकी थी, जिसे याचिकाकर्ता ने रिकॉर्ड पर नहीं रखा। कोर्ट ने कहा कि सूचना आयोग के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।
- RTI का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग (24 अर्जियां):
- हाई कोर्ट की रजिस्ट्री और उप-रजिस्ट्रार (RTI) की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट द्वारा चेतावनी दिए जाने के बावजूद याचिकाकर्ता ने 4 जून से 17 जुलाई 2026 के बीच 24 नई RTI अर्जियां दाखिल कर दीं।
- इन अर्जियों में कोर्ट की आंतरिक प्रशासनिक प्रक्रियाएं, जैसे—ऑफिस नोट शीट्स, बैकएंड सर्वर लॉग्स, सिस्को वेबेक्स (Cisco Webex) सेशन लॉग्स, बेंच सेक्रेटरी लॉग एंट्रीज, रोस्टर संबंधी रिकॉर्ड्स और ‘पास ओवर’ (Pass Over) किए गए मामलों के कारण मांगे गए थे, जिनका याचिकाकर्ता से कोई प्रत्यक्ष लेना-देना नहीं था।
- कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की अर्जियां अदालत के कर्मचारियों का कीमती समय बर्बाद करती हैं और न्याय प्रशासन में बाधा पैदा करती हैं।
- वर्चुअल पेशी मौलिक अधिकार नहीं:
- याचिकाकर्ता ने व्यक्तिगत रूप से पेश होने के स्पष्ट अदालती आदेश का उल्लंघन कर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेशी ली।
- न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की महत्वपूर्ण टिप्पणी:“वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (Virtual Appearance) के माध्यम से पेश होना केवल सुविधा का एक माध्यम (Mode of Convenience) है, इसे मौलिक अधिकार (Fundamental Right) के रूप में दावा नहीं किया जा सकता। वर्चुअली पेश होने की अनुमति कोर्ट के विवेक पर निर्भर करती है और जब व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया गया हो, तो बिना किसी उचित कारण के उसका पालन करना अनिवार्य है।”
जुर्माने का ब्रेकअप (Total Costs Breakdown)
कोर्ट ने याचिकाकर्ता के विभिन्न अनुचित कृत्यों पर कुल ₹6,70,000 का जुर्माना लगाया।
| कृत्य / उल्लंघन | जुर्माने की राशि |
| 24 तुच्छ RTI अर्जियों के लिए (प्रत्येक अर्जी पर ₹5,000) | ₹1,20,000 |
| गलत और भ्रामक हलफनामा/आवेदन दाखिल करने पर | ₹50,000 |
| अदालती कार्यवाही में बाधा डालने व अवमाननापूर्ण आचरण पर | ₹5,00,000 |
| कुल देय राशि (4 सप्ताह में जमा करने का निर्देश) | ₹6,70,000 |
अवमाननापूर्ण आचरण और कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि याचिकाकर्ता ने “औपचारिक लिखित विरोध घोषणा” (Formal Written Declaration of Protest) शीर्षक से एक ईमेल भेजा था जो भ्रामक और अवमाननापूर्ण था। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को वकील प्रदान करने का प्रस्ताव भी दिया था, लेकिन याचिकाकर्ता अड़ा रहा और व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने देश की शीर्ष अदालतों में स्वयं पैरवी करने वाले (Party-in-Person) कुछ मुकदमों में बढ़ते अमर्यादित और अशिष्ट व्यवहार पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि न्याय प्रशासन की गरिमा से खिलवाड़ करने वाले किसी भी कृत्य को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

