Monday, August 10, 2026
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Faceless Assessment: फैसलेस असेसमेंट में बिना जांच-पूछताछ के आयकर संशोधन का निपटारा नहीं किया जा सकता; यह खबर अंत तक पढ़ें

केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण
माननीय पीठन्यायमूर्ति नेलसन सेलो (गुवाहाटी उच्च न्यायालय)
संबंधित कानूनIncome Tax Act, 1961 — Section 10(26), Section 69A, Section 143(3), Section 144(B) & Section 264
सुप्रीम कोर्ट नजीरPannalal Binjraj (Firm) vs. Union of India
मुख्य विधिक सिद्धांत1. धारा 264 के तहत रिवीजन में प्राधिकारी का दायित्व है कि वह निष्पक्ष जांच (Enquiry) करे, केवल ऑनलाइन जवाब न अपलोड होने के आधार पर फैसला न सुनाए।
2. फैसलेस असेसमेंट की तकनीकी प्रक्रिया करदाता के प्रति मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण (Humane and Pragmatic Approach) को समाप्त नहीं कर सकती।
अदालत का निर्णयरिवीजन ऑर्डर रद्द; 2 महीने के भीतर स्थल सत्यापन व जांच के बाद नया आदेश पारित करने का निर्देश।

Faceless Assessment: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने आयकर कानून (Income Tax Act) के तहत फैसलेस व्यवस्था से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है।

यह आदेश न्यायमूर्ति नेलसन सेलो (Justice Nelson Sailo) की एकल पीठ ने मिजोरम के एक करदाता द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए पारित किया।अदालत ने स्पष्ट किया कि जब करदाता (Assessee) अत्यधिक दस्तावेजों (Voluminous Records) को ऑनलाइन अपलोड करने में असमर्थता जताए और अपने व्यावसायिक स्थल पर सत्यापन (Verification at place of business) का अनुरोध करे, तो अधिकारियों को केवल दस्तावेज़ अपलोड न होने के आधार पर प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने के बजाय “मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण” (Humane and Pragmatic Approach) अपनाना चाहिए। अदालत ने माना है कि धारा 264 (Section 264) के तहत पुनरीक्षण/संशोधन प्राधिकारी (Revisional Authority) केवल ऑनलाइन/फैसलेस प्रक्रिया का हवाला देकर या यांत्रिक (Mechanical) तरीके से जांच किए बिना याचिका को खारिज नहीं कर सकते।

हाई कोर्ट की मुख्य व महत्वपूर्ण टिप्पणियां

  • धारा 264 के तहत जांच (Enquiry) की अनिवार्यता:“चूंकि आयकर अधिनियम की धारा 264 के तहत प्रदान किया गया उपाय एक वैकल्पिक उपाय (Alternative Remedy) है, इसलिए पुनरीक्षण प्राधिकारी के लिए न केवल रिकॉर्ड मंगाना आवश्यक होगा, बल्कि जांच करना या जांच करवाना (Enquire or cause an enquiry) भी आवश्यक होगा और उसके बाद कोई ऐसा आदेश पारित करना होगा जो उचित हो और करदाता के प्रतिकूल न हो।”
  • फैसलेस प्रक्रिया में मानवीय दृष्टिकोण की आवश्यकता: अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘पन्नालाल बिंजराज बनाम भारत संघ’ (Pannalal Binjraj v. Union of India) का हवाला देते हुए टिप्पणी की:“जांच किए बिना या जांच करवाए बिना केवल फैसलेस तरीके से दस्तावेजों को अपलोड करना और कार्यवाही का संचालन करना, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले के अनुसार मानवीय दृष्टिकोण (Lack of Humane Approach) की कमी के समान होगा।”

मामला क्या था? (Case Background)

  1. धारा 10(26) के तहत कर छूट का दावा
    • याचिकाकर्ता मिजोरम के लुंगलेई (Lunglei) की निवासी और एक अनुसूचित जनजाति (ST) की महिला हैं, जो LZ Traders की प्रोपराइटर हैं।
    • आयकर अधिनियम की धारा 10(26) के तहत कुछ निर्दिष्ट क्षेत्रों (जैसे पूर्वोत्तर के अनुसूचित जनजातीय क्षेत्रों) में रहने वाले एसटी सदस्यों को वहीं से अर्जित आय पर पूर्ण कर छूट (Tax Exemption) प्राप्त है। याचिकाकर्ता ने मिजोरम के भीतर अर्जित अपनी आय पर शून्य कर योग्य आय दर्शाते हुए रिटर्न दाखिल किया था।
  2. फैसलेस असेसमेंट (Faceless Assessment) में 29 करोड़ का एडिशन
    • मामले को धारा 144(B) के तहत फैसलेस असेसमेंट के लिए चुना गया। आयकर विभाग ने उनसे एसटी प्रमाण पत्र, बैंक स्टेटमेंट और आय के समर्थन में भारी दस्तावेज मांगे।
    • अत्यधिक और भारी दस्तावेजों (Voluminous Records) को ऑनलाइन अपलोड करने में आ रही कठिनाइयों के कारण याचिकाकर्ता ने समय और अपने स्थान पर सत्यापन की मांग की। हालांकि, असेसिंग ऑफिसर ने धारा 10(26) की छूट से इनकार कर दिया और धारा 69A के तहत ₹29,00,85,052 (लगभग 29 करोड़ रुपये) को “अस्पष्टीकृत आय” (Unexplained Income) मानकर टैक्स जोड़ दिया।
  3. धारा 264 के तहत संशोधन याचिका खारिज होना
    • याचिकाकर्ता ने इस असेसमेंट ऑर्डर के खिलाफ धारा 264 के तहत संशोधन (Revision) याचिका दायर की, जिसे पुनरीक्षण प्राधिकारी ने बिना कोई स्वतंत्र जांच कराए या स्थल सत्यापन किए यांत्रिक रूप से खारिज कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का रुख किया।

⚖️ गुवाहाटी हाई कोर्ट का अंतिम आदेश

  1. आदेश निरस्त (Set Aside): हाई कोर्ट ने धारा 264 के तहत पारित पुनरीक्षण प्राधिकारी के आदेश को पूरी तरह से असतत और अवैध (Unsustainable) मानते हुए रद्द कर दिया।
  2. मामला वापस भेजा गया (Remanded Back): मामले को पुनरीक्षण प्राधिकारी को नए सिरे से विचार करने के लिए वापस भेज दिया गया है।
  3. स्थल पर सत्यापन की छूट: कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता दस्तावेजों की अधिकता या भौगोलिक दूरी के कारण उन्हें अपलोड नहीं कर पाती है, तो वह अपने व्यावसायिक स्थान (Mizoram) पर सत्यापन की मांग कर सकती है।
  4. समय सीमा: पुनरीक्षण प्राधिकारी को इस पूरी प्रक्रिया और जांच को 2 महीने के भीतर पूरा करने का सख्त निर्देश दिया गया है।

फैसलेस असेसमेंट, आयकर की धारा 264 और जनजातीय कर छूट (Section 10(26)) 

इन तीनों विषयों को गहराई से और व्यावहारिक दृष्टिकोण से समझने के लिए आप निम्नलिखित 4 प्रमुख शिक्षण और शोध विकल्पों (Learning & Research Approaches) का उपयोग कर सकते हैं।

बेयर एक्ट और कानूनी प्रावधान (Bare Act & Statutory Rules)

  • धारा 144B (फैसलेस असेसमेंट): National Faceless Assessment Centre (NaFAC) का ढांचा, ऑथेंटिकेशन का नियम, तथा प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) और Show Cause Notice (SCN) की अनिवार्यता से जुड़े प्रावधान पढ़ें।
  • धारा 264 (Revision by Commissioner): PCIT/CIT की स्व-प्रेरणा (Suo Motu) या करदाता के आवेदन पर आदेश संशोधन की शक्तियां। ध्यान दें कि यदि धारा 263 में आदेश करदाता के खिलाफ संशोधित होता है, वहीं धारा 264 का उपयोग मुख्य रूप से करदाता के पक्ष में राहत देने के लिए किया जाता है (जहां अपील न की गई हो)।
  • धारा 10(26) (अनुसूचित जनजाति कर छूट): उत्तर-पूर्वी राज्यों (जैसे असम, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश) तथा लद्दाख जैसे निर्दिष्ट क्षेत्रों के अनुसूचित जनजाति (ST) के सदस्यों की आय छूट की शर्तें।

सीबीडीटी सर्कुलर और एसओपी (CBDT Circulars & SOPs)

  • Faceless Guidelines: CBDT द्वारा समय-समय पर जारी Standard Operating Procedures (SOPs) का अध्ययन करें, जिनमें व्यक्तिगत सुनवाई (Video Conferencing) का अधिकार और पेनल्टी कार्यवाही के नियम स्पष्ट किए गए हैं।
  • धारा 264 की समय-सीमा: धारा 264 के तहत देरी की छूट (Condonation of Delay) पर सीबीडीटी के सर्कुलर पढ़ें, जिनमें यह स्पष्ट है कि यदि वास्तविक गलती हुई है तो तकनीकी कारणों से आवेदन खारिज नहीं किया जाना चाहिए।

न्यायिक निर्णय (Judicial Precedents / Case Laws)

गहराई से समझने के लिए हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क फैसलों का अध्ययन सबसे प्रभावी विकल्प है।

विषयप्रमुख केस लॉ / न्यायिक सिद्धांत
Faceless AssessmentBsbn Infrastructures vs UOI तथा Burda Media: बिना Show Cause Notice या सुनवाई का अवसर दिए बिना पास किया गया असेसमेंट ऑर्डर अमान्य (Null & Void) माना जाता है।
Section 264Anchor Pressings vs CIT: यदि करदाता असेसमेंट के दौरान छूट या डिडक्शन का दावा करना भूल गया है, तो वह धारा 264 के तहत आवेदन कर राहत प्राप्त कर सकता है।
Section 10(26)Regional Director vs Tribal Assessees: छूट का लाभ लेने के लिए व्यक्ति का अधिसूचित क्षेत्र का निवासी होना और आय का स्रोत उसी अधिसूचित क्षेत्र से होना अनिवार्य है।

व्यावहारिक पोर्टल प्रक्रिया और केस स्टडीज (Practical Portal Mechanics)

  • e-Proceedings Tab: Income Tax Portal पर Faceless Assessment के तहत ई-प्रोसीडिंग्स में जवाब (Reply) दाखिल करने और एविडेंस अपलोड करने की व्यावहारिक प्रक्रिया का अभ्यास करें।
  • Revision Application: ई-फाइलिंग पोर्टल में ‘e-File’ सेक्शन के अंतर्गत Form 35 / Section 264 Application ऑनलाइन सबमिट करने के चरणों को समझें।

यहां फैसलेस असेसमेंट (धारा 144B) का केस लॉ को विस्तार से जानेंफैसलेस असेसमेंट (धारा 144B)

फैसलेस असेसमेंट (धारा 144B) में कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice – SCN) जारी न करना और सुनवाई का अवसर (Personal Hearing via Video Conferencing) न देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (Principles of Natural Justice – Audi Alteram Partem) का सीधा उल्लंघन माना जाता है।

विभिन्न उच्च न्यायालयों (High Courts) ने इस मुद्दे पर स्पष्ट और ऐतिहासिक फैसले दिए हैं।

कारण बताओ नोटिस (SCN) की अनिवार्यता पर फैसले

यदि आयकर विभाग करदाता की आय में वृद्धि (Addition/Disallowance) करना चाहता है, तो उसे ड्राफ्ट असेसमेंट ऑर्डर के साथ SCN जारी करना कानूनन अनिवार्य है।

  • Anju Jalaj Batra vs NaFAC (Delhi High Court):
    • मामला: करदाता को बिना SCN और ड्राफ्ट ऑर्डर दिए सीधे अंतिम असेसमेंट ऑर्डर भेज दिया गया।
    • निर्णय: दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश को अवैध (Null & Void) घोषित करते हुए रद्द (Quash) कर दिया। कोर्ट ने कहा कि धारा 144B के तहत SCN जारी करना कोई प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक बाध्यकारी कानूनी आवश्यकता (Mandatory Requirement) है।
  • YCD Industries vs NaFAC (Delhi High Court):
    • निर्णय: कोर्ट ने माना कि बिना SCN के जारी किया गया कोई भी प्रतिकूल आदेश करदाता को अपना पक्ष रखने के अधिकार से वंचित करता है और ऐसा आदेश कानून की नजर में टिक नहीं सकता।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (वीसी) से व्यक्तिगत सुनवाई न मिलने पर फैसले

फैसलेस योजना में यदि करदाता SCN का जवाब देने के साथ-साथ मौखिक रूप से बात रखने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के माध्यम से सुनवाई की मांग करता है, तो उसे खारिज नहीं किया जा सकता।

  • Bharat Aluminium Company Ltd. (BALCO) vs Union of India (Delhi High Court):
    • मामला: करदाता ने SCN का लिखित जवाब देते हुए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई का अनुरोध किया था, जिसे असेसिंग ऑफिसर (AO) ने नजरअंदाज कर सीधे ऑर्डर पास कर दिया।
    • निर्णय: कोर्ट ने माना कि धारा 144B में प्रयुक्त शब्द “May” का अर्थ यह नहीं है कि विभाग सुनवाई देने से मना कर दे। जब करदाता मांग करे, तो सुनवाई का मौका देना अनिवार्य है। कोर्ट ने आदेश को रद्द कर मामला वापस पुनर्मूल्यांकन (Remand back) के लिए भेजा।
  • Pooja Singla Builders & Engineers vs NaFAC (Delhi High Court):
    • निर्णय: यदि करदाता को अपना पक्ष रखने या सबूत पेश करने के लिए पर्याप्त समय और वीसी सुनवाई नहीं मिलती है, तो पूरा असेसमेंट ऑर्डर शून्य (Non-est) माना जाएगा।

अपर्याप्त प्रतिक्रिया समय (Short Response Time) पर फैसले

  • Vedanta Ltd. vs ACIT (Delhi High Court):
    • मामला: विभाग ने SCN जारी किया लेकिन जवाब दाखिल करने के लिए बेहद कम समय (जैसे 24 या 48 घंटे) दिया या पोर्टल पर जवाब का विकल्प ही देर से खुला।
    • निर्णय: कोर्ट ने माना कि केवल कागजी नोटिस भेजना काफी नहीं है; व्यावहारिक और उचित समय (Reasonable Opportunity) देना अनिवार्य है। उचित समय दिए बिना आदेश पारित करना प्राकृतिक न्याय का हनन है।

न्यायालयों के निष्कर्ष का सार (Key Takeaways)

  1. धारा 144B की बाध्यता: फैसलेस असेसमेंट में तकनीकी सुधारों का उद्देश्य पारदर्शिता लाना है, न कि करदाता के मौलिक अधिकारों को छीनना।
  2. आदेश की वैधानिकता: SCN या VC सुनवाई के बिना पास किया गया कोई भी प्रतिकूल आदेश हाई कोर्ट द्वारा सीधे रिट याचिका (Article 226) के माध्यम से रद्द (Quash) कराया जा सकता है।
  3. परिणाम: ऐसे मामलों में कोर्ट आदेश को खारिज कर विभाग को निर्देश देती है कि वह SCN जारी कर, करदाता को लिखित जवाब और वीसी सुनवाई का अवसर देकर नए सिरे से आदेश पारित करे।

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