याचिका में उठाए गए मुख्य तर्क
- नए कानून स्नातकों (Law Graduates) का बहिष्कार: याचिका में कहा गया कि 3 साल के अनुभव की यह शर्त प्रतिभाशाली और नए लॉ ग्रेजुएट्स तथा नए नामांकित वकीलों को भर्ती प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर करती है, जो मनमाना और भेदभावपूर्ण है।
- प्रशिक्षण से हो सकती है योग्यता सुनिश्चित: याचिकाकर्ता का तर्क है कि वकालत के 3 साल के अनुभव के बजाय चयनित उम्मीदवारों को स्ट्रक्चर्ड इंडक्शन ट्रेनिंग (संरचित प्रशिक्षण), प्रोबेशन पीरियड और वरिष्ठ वकीलों/अभियोजकों के साथ प्रैक्टिकल ट्रेनिंग देकर कार्यकुशल बनाया जा सकता है।
- सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हवाला: याचिका में अगस्त 2026 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की भर्ती पर दिए गए ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने निचली न्यायपालिका (Judiciary) में भर्ती के लिए अनिवार्य 3 साल की प्रैक्टिस शर्त में ढील दी थी और लॉ क्लर्कशिप व स्ट्रक्चर्ड ट्रेनिंग को पात्रता के रूप में स्वीकार करने का मार्ग प्रशस्त किया था।
- अन्य राज्यों के नियमों से तुलना: याचिका में बताया गया कि हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे पड़ोसी राज्यों में प्रवेश स्तर (Entry-level) के एपीपी पदों के लिए 3 साल की प्रैक्टिस की कोई अनिवार्य शर्त नहीं है।
- दिव्यांगजनों (PwD) के लिए कम आरक्षण का मुद्दा: याचिका में यह चिंता भी जताई गई कि 140 एपीपी रिक्तियों में से दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए केवल 8 पद आरक्षित किए गए हैं, जो निर्धारित नियमों के अनुरूप नहीं है।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली अभियोजन निदेशालय (Directorate of Prosecution) में सहायक लोक अभियोजक (Assistant Public Prosecutor – APP) के पदों पर सीधी भर्ती के लिए अनिवार्य 3 वर्ष के वकालत अनुभव (Bar Practice Requirement) की संवैधानिक वैधता, युवाओं व नए वकालत स्नातकों के समान अवसर के अधिकार (अनुच्छेद 14 व 16), और हाल ही में सिविल जज कैडर के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए ऐतिहासिक निर्णय के प्रभाव पर संज्ञान लिया है।
दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने गैर-सरकारी संस्था ‘भूमिका ट्रस्ट’ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि 140 सहायक लोक अभियोजकों की चल रही भर्ती प्रक्रिया में पात्र नए कानून स्नातकों को अनंतिम रूप से (Provisionally) शामिल करने की अंतरिम प्रार्थना पर अगली सुनवाई पर विचार किया जाएगा। अदालत ने दिल्ली सरकार द्वारा जनवरी 2026 में अधिसूचित नए सेवा नियमों के खिलाफ दायर जनहित याचिका (PIL) पर केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार (GNCTD), संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और दिल्ली हाईकोर्ट रजिस्ट्री को औपचारिक नोटिस जारी कर 4 सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
याचिका में उठाए गए प्रमुख विधिक आधार एवं तर्क
1. नए कानून स्नातकों का मनमाना निष्कासन (Arbitrary Exclusion)
- याचिका में ‘अभियोजन निदेशालय, जीएनसीटीडी सहायक लोक अभियोजक भर्ती नियम, 2025’ (जो जनवरी 2026 में अधिसूचित किए गए) की वैधानिक शर्त को चुनौती दी गई है।
- याचिकाकर्ता ने दलील दी कि 3 साल के बार अनुभव की कठोर शर्त बिना किसी तार्किक औचित्य के मेधावी युवा वकीलों और नए नामांकित अधिवक्ताओं को भर्ती प्रक्रिया में बैठने से ही रोक देती है।
- क्षमता संवर्धन का विकल्प: याचिका में कहा गया है कि अभियोजन की दक्षता बार में 3 साल बिताने से ही सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि इसे कठोर चयन परीक्षा, संरचित इंडक्शन ट्रेनिंग (Structured Induction Training), परिवीक्षा अवधि (Probation), व्यावहारिक अदालती अटैचमेंट और वरिष्ठ अभियोजकों के अधीन व्यावहारिक प्रशिक्षण से अधिक प्रभावी ढंग से सुनिश्चित किया जा सकता है।
2. सिविल जज भर्ती पर सुप्रीम कोर्ट के अगस्त 2026 के ऐतिहासिक फैसले का हवाला
- याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के अगस्त 2026 के उस ऐतिहासिक फैसले पर मुख्य रूप से भरोसा जताया है, जिसमें शीर्ष अदालत ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) / न्यायिक सेवा के प्रवेश स्तर पर अनिवार्य 3 साल के वकालत अनुभव के नियम को संशोधित करते हुए लॉ क्लर्कशिप, अकादमिक उत्कृष्टता और संरचित प्रशिक्षण को पात्रता ढांचे का हिस्सा बनाने की अनुमति दी थी:“यद्यपि न्यायिक सेवा और अभियोजन सेवा को शासित करने वाला संवैधानिक व वैधानिक ढांचा अलग है, फिर भी अंतर्निहित सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक है कि क्या लोक अभियोजन सेवा में प्रवेश के लिए 3 पूर्ण वर्ष की बार प्रैक्टिस ही सक्षमता सुनिश्चित करने का एकमात्र उचित और आनुपातिक (Proportionate) साधन है।”
3. पड़ोसी राज्यों (UP, हरियाणा, राजस्थान) से तुलनात्मक विसंगति
- याचिका में रेखांकित किया गया कि दिल्ली के आस-पास के राज्यों में प्रवेश स्तर की अभियोजन परीक्षाओं (APO/APP) में 3 साल की पूर्व वकालत का कोई अनिवार्य बंधन नहीं है:
- उत्तर प्रदेश (UP PSC – APO): विधि स्नातक (LL.B.) फ्रेशर्स सीधे परीक्षा में बैठने के पात्र हैं।
- हरियाणा एवं राजस्थान: प्रारंभिक स्तर के सहायक लोक अभियोजकों के लिए 3 वर्ष की वकालत अनिवार्य नहीं है।
- एक ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में दिल्ली के उम्मीदवारों पर यह अतिरिक्त और अनुचित बोझ डालना समानता के सिद्धांत के विपरीत है।
4. दिव्यांगजन (PwD) आरक्षण में उपेक्षा का मुद्दा
- याचिका में 140 पदों के लिए विज्ञापित मौजूदा भर्ती में दिव्यांगजनों के अधिकारों (RPwD Act, 2016) की अनदेखी का भी मुद्दा उठाया गया।
- याचिका के अनुसार, कुल 140 रिक्तियों में से केवल 8 सीटें ही दिव्यांग श्रेणी (PwD) के लिए आरक्षित की गई हैं, जो न्यूनतम विहित 4% आरक्षण के रोस्टर और उचित श्रेणीवार वितरण पर सवाल खड़े करती हैं।
उच्च न्यायालय की कार्यवाही और अंतरिम राहत का पहलू
- चार सप्ताह में जवाब तलब: अदालत ने चारों प्रमुख हितधारकों (केंद्रीय गृह मंत्रालय, दिल्ली सरकार, यूपीएससी और हाईकोर्ट प्रशासन) को नोटिस का जवाब देने के लिए चार हफ्ते का समय दिया।
- 140 पदों की मौजूदा भर्ती में भाग लेने की मांग: याचिकाकर्ता ने अंतरिम प्रार्थना की थी कि 140 एपीपी पदों की चल रही भर्ती में उन सभी उम्मीदवारों को आवेदन करने और बैठने की अनुमति दी जाए जो 3 वर्ष की शर्त को छोड़कर अन्य सभी शैक्षणिक अर्हताएं पूरी करते हैं।
- पीठ ने आदेश दिया कि इस अंतरिम प्रार्थना पर अगली सुनवाई पर विचार किया जाएगा।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: भूमिका ट्रस्ट बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार (GNCTD), UPSC एवं अन्य [W.P.(C) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता जयंत सिंह राघव
- केंद्र सरकार की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा
- दिल्ली सरकार (अभियोजन निदेशालय) की ओर से: स्थायी वकील समीर वशिष्ठ
- प्रासंगिक कानून एवं नियम:
- अभियोजन निदेशालय, जीएनसीटीडी सहायक लोक अभियोजक भर्ती नियम, 2025 (अधिसूचित जनवरी 2026)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 18 / पूर्ववर्ती CrPC की धारा 25 (सहायक लोक अभियोजकों की नियुक्ति)
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act, 2016) की धारा 34 (रोजगार में आरक्षण)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर) एवं अनुच्छेद 226
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘प्रवेश स्तर के न्यायिक पदों पर फ्रेश लॉ ग्रेजुएट्स के प्रवेश और कठोर संस्थागत प्रशिक्षण के लाभ।’
- सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ एवं विकास कुमार बनाम यूपीएससी (2021) — ‘सार्वजनिक रोजगार के नियमों को आनुपातिकता (Proportionality) और गैर-भेदभाव के संवैधानिक पैमाने पर खरा उतरना अनिवार्य है।’
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया (दिल्ली उच्च न्यायालय)
Delhi Govt: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ (Judges) | मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय एवं न्यायमूर्ति तेजस कारिया |
| याचिकाकर्ता | भूमिका ट्रस्ट (Bhumika Trust) |
| प्रतिवादी | केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, UPSC एवं दिल्ली हाईकोर्ट प्रशासन |
| विवादित नियम | जनवरी 2026 में अधिसूचित APP भर्ती नियम, 2025 (3 साल की अनिवार्य प्रैक्टिस शर्त) |
| कुल पद | 140 सहायक सरकारी वकील (APP) पद |

