हलफनामे में लगाए गए मुख्य आरोप
- चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप: मनोज कुमार ने आरोप लगाया कि मनन कुमार मिश्रा राज्य बार कौंसिलों के पदाधिकारियों के चुनाव में हस्तक्षेप कर रहे हैं। राज्य बार कौंसिलों द्वारा चुने गए प्रतिनिधि ही BCI के अगले राष्ट्रीय पदाधिकारियों का चुनाव करेंगे। यदि राज्य स्तर पर निष्पक्षता से समझौता होता है, तो पूरी BCI चुनाव प्रक्रिया प्रभावित होगी।
- हितों का टकराव (Conflict of Interest): हलफनामे में तर्क दिया गया कि इस महत्वपूर्ण अवधि के दौरान मिश्रा का अध्यक्ष पद पर बने रहना चुनावी निष्पक्षता के लिए खतरा पैदा करता है। इसलिए जब तक राज्य बार कौंसिलों और BCI के चुनाव पूरे नहीं हो जाते, उन्हें BCI के कामकाज और चुनाव प्रक्रिया से पूरी तरह अलग रखा जाना चाहिए।
- विधि अधिकारियों की अनदेखी: याचिकाकर्ता ने यह भी उजागर किया कि भारत के अटॉर्नी जनरल (AG) और सॉलिसिटर जनरल (SG) BCI के पदेन (Ex-officio) सदस्य होते हैं, फिर भी काउंसिल की बैठकों के नोटिस और एजेंडा उन्हें नहीं भेजे जाते थे।
वैकल्पिक व्यवस्था का सुझाव (Proposed Solution)
एन. मनोज कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्ताव रखा है कि:
- BCI के निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए भारत के अटॉर्नी जनरल (AG) या सॉलिसिटर जनरल (SG) की अध्यक्षता में एक तदर्थ समिति (Ad-hoc Committee) बनाई जाए।
- यह समिति चुनाव पूरे होने और BCI के पुनर्गठन तक संस्था के दैनिक प्रशासनिक कामकाज को संभाले।
- BCI ट्रस्ट, PEARL-FIRST ट्रस्ट, वित्तीय लेन-देन, नियुक्तियों और लॉ कॉलेजों के निरीक्षण व मान्यता प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच (Independent Scrutiny) कराई जाए।
नई दिल्ली: देश के 20 लाख से अधिक वकीलों की सर्वोच्च विनियामक संस्था ‘बार काउंसिल ऑफ इंडिया’ (Bar Council of India – BCI) के शीर्ष नेतृत्व, चुनावी शुचिता, वित्तीय पारदर्शिता और कानूनी शिक्षा के निरीक्षण तंत्र पर संस्था के भीतर से ही एक बड़ा आंतरिक विद्रोह सामने आया है।
मनोज कुमार ने शीर्ष अदालत से गुहार लगाई है कि जब तक राज्य बार काउंसिलों के चुनाव और उसके बाद बीसीआई का विधिवत पुनर्गठन (Reconstitution) पूरा नहीं हो जाता, तब तक मनन कुमार मिश्रा को बीसीआई अध्यक्ष कार्यालय और समूची चुनावी प्रक्रिया से पूरी तरह अलग रखा जाए। उन्होंने सुझाव दिया है कि इस अंतरिम अवधि में संस्था का दिन-प्रतिदिन का कामकाज संभालने के लिए भारत के अटॉर्नी जनरल (AG) आर. वेंकटरमणी या सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता की अध्यक्षता में एक एड-हॉक कमेटी (Ad-hoc Committee) गठित की जाए। बीसीआई के निर्वाचित सदस्य और केरल बार काउंसिल के प्रतिनिधि एन. मनोज कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में एक विस्तृत जवाबी हलफनामा (Reply Affidavit) दाखिल कर वर्तमान अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा पर राज्य बार काउंसिलों के चुनावों और प्रतिनिधियों के चयन में अनुचित प्रभाव डालने का गंभीर आरोप लगाया है।
बीसीआई सदस्य एन. मनोज कुमार के हलफनामे में लगाए गए प्रमुख आरोप
1. चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप और भविष्य के बीसीआई चुनाव को प्रभावित करने का प्रयास
- हलफनामे में कहा गया है कि मनन कुमार मिश्रा राज्य बार काउंसिलों (State Bar Councils) के पदाधिकारियों के गठन और चुनाव प्रक्रिया में सक्रिय हस्तक्षेप कर रहे हैं और बीसीआई प्रतिनिधियों के चयन को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं।
- मनोज कुमार ने रेखांकित किया:“राज्य बार काउंसिलों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि ही वह निर्वाचक मंडल (Electoral College) बनाते हैं जो भविष्य में बीसीआई के पदाधिकारियों का चुनाव करता है। यदि इन प्रतिनिधियों के चुनाव को प्रभावित या समझौताग्रस्त किया जाता है, तो इसके परिणामस्वरूप बीसीआई के भावी पदाधिकारियों का चुनाव भी स्वतः दूषित हो जाएगा। इस महत्वपूर्ण अवधि में मौजूदा अध्यक्ष की पद पर निरंतर मौजूदगी चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप का अवसर और प्रोत्साहन पैदा करती है।”
2. अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को बैठकों से दूर रखना
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act) के तहत भारत के महान्यायवादी (AG) और सॉलिसिटर जनरल (SG) बीसीआई के पदेन सदस्य (Ex-officio Members) हैं।
- हलफनामे में आरोप लगाया गया कि बीसीआई की बैठकों के नोटिस और एजेंडे दोनों शीर्ष विधि अधिकारियों को कभी नहीं भेजे गए, जिससे वे परिषद के विचार-विमर्श से पूरी तरह कटे रहे। बार-बार आश्वासन दिए जाने के बावजूद इस प्रथा को नहीं सुधारा गया।
3. एकतरफा निर्णय और नालसार (NALSAR) विवाद
- सदस्य ने आरोप लगाया कि अधिवक्ता अधिनियम के तहत अधिकार बीसीआई में एक सामूहिक निकाय (Collective Body) के रूप में निहित हैं, जिसे किसी एक पदाधिकारी की व्यक्तिगत सत्ता में तब्दील नहीं किया जा सकता।
- एजेंडे बैठक शुरू होने के कुछ मिनट पहले मैसेजिंग ग्रुप्स में डाले जाते थे और बैठकों के कार्यवृत्त (Minutes) कभी भी पुष्टि के लिए सदस्यों के बीच प्रसारित नहीं किए गए।
- नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ (हैदराबाद) के 2026 बैच के छात्रों के वकालत पंजीकरण पर एकतरफा रोक लगाने का विवादित निर्देश भी जनरल काउंसिल की बैठक में रखे बिना मनमाने ढंग से जारी किया गया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान के बाद वापस लेना पड़ा था।
4. PEARL-FIRST ट्रस्ट और AIBE फंड्स की स्वतंत्र जांच की मांग
मनोज कुमार ने अदालत से बीसीआई के समानांतर चल रहे ट्रस्ट और वित्तीय मामलों की स्वतंत्र ऑडिट/जांच कराने की प्रार्थना की है:
- बीसीआई ट्रस्ट ‘पर्ल-फर्स्ट’ (PEARL-FIRST Trust): 2020 के ट्रस्ट डीड में कुछ व्यक्तियों को “स्थायी प्रबंध ट्रस्टी” (Permanent Managing Trustees) बना दिया गया, जिससे वे बीसीआई सदस्य न रहने के बावजूद जीवन भर ट्रस्टी बने रह सकते हैं। गोवा में 56 एकड़ भूमि पर विश्वविद्यालय स्थापित करने के नाम पर ट्रस्ट और बीसीआई के बीच हुए वित्तीय लेन-देन संदिग्ध हैं।
- AIBE की कमाई का अंतरण: ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) से एकत्रित होने वाले करोड़ों रुपयों के परीक्षा शुल्क को एक निजी/पृथक ट्रस्ट में किस अधिकार से ट्रांसफर किया गया, इसकी पूरी जांच और बैंक खातों का ब्योरा तलब किया जाए।
- लॉ कॉलेजों के निरीक्षण और नियुक्तियां: बीसीआई में कर्मचारियों की नियुक्तियों और देश भर में लीगल एजुकेशन सेंटर्स के निरीक्षण व मान्यता (Approval) की प्रक्रियाओं की भी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट का 2 सितंबर का पूर्व आदेश और पृष्ठभूमि
- कार्यकाल विस्तार को नकारना: 2 सितंबर 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने बीसीआई द्वारा अप्रैल 2025 में पारित उस प्रस्ताव को अमान्य ठहरा दिया था जिसके तहत मनन कुमार मिश्रा के दो साल के कार्यकाल को बढ़ाकर 2030 तक पांच साल कर दिया गया था।
- प्रो-टेम (कामचलाऊ) व्यवस्था: शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि मनन कुमार मिश्रा केवल एक ‘प्रो-टेम चेयरमैन’ (Pro-tem Chairperson) हैं। वे केवल नए चुनाव होने तक दैनिक प्रशासनिक कार्य देख सकते हैं, लेकिन कोई भी नीतिगत निर्णय (Policy Decision) नहीं ले सकते।
- AG और SG की अनिवार्य भागीदारी: अदालत ने सख्त निर्देश दिया था कि बीसीआई के हर नीतिगत निर्णय में अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को अनिवार्य रूप से सक्रिय रूप से शामिल किया जाएगा।
- पुनर्गठन की समयसीमा: सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि राज्य बार काउंसिलों में महिला सदस्यों के सह-चयन (Co-option) की प्रक्रिया पूरी होने के बाद राज्य काउंसिलें 3 सप्ताह के भीतर बीसीआई के लिए अपने प्रतिनिधि का चुनाव करेंगी, जिसके बाद बीसीआई के नए अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का लोकतांत्रिक चुनाव होगा।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: योगमाया एम.जी. बनाम भारत संघ व अन्य [W.P.(C) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- हलफनामा दायरकर्ता: एन. मनोज कुमार (निर्वाचित बीसीआई सदस्य, केरल बार काउंसिल प्रतिनिधि)
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- एन. मनोज कुमार की ओर से: एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) बीजू पी. रमन
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता, अधिवक्ता दीपक प्रकाश एवं श्रीराम परक्कट
- पदेन सदस्य / केंद्र: अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी एवं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता
- प्रासंगिक कानून एवं नियम:
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) की धारा 4 (बीसीआई की संरचना), धारा 7 (बीसीआई के कार्य), धारा 10B एवं धारा 48B
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया रूल्स (BCI Rules) का भाग II, अध्याय I, नियम 12(2) (अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का अधिकतम कार्यकाल 2 वर्ष निर्धारित)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 142 एवं अनुच्छेद 32
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (सर्वोच्च न्यायालय)
- वर्तमान स्थिति: सुप्रीम कोर्ट सितंबर 2026 के अंतिम सप्ताह में राज्य बार काउंसिलों के अनुपालन और बीसीआई के पुनर्गठन पर आगे की सुनवाई करने जा रहा है।
BCI Vs Manan Mishra: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| हलफनामाकर्ता | एन. मनोज कुमार (BCI में केरल के निर्वाचित प्रतिनिधि) |
| आरोपी पदाधिकारी | मनन कुमार मिश्रा (अध्यक्ष, Bar Council of India) |
| मुख्य मांग | चुनाव संपन्न होने तक BCI प्रशासन के लिए तदर्थ समिति (Ad-hoc Committee) का गठन |
| सुप्रीम कोर्ट का पूर्व आदेश (2 सितंबर) | अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को BCI के हर फैसले में सक्रिय भाग लेने का निर्देश |

