केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति संजीव कुमार शर्मा (गुवाहाटी उच्च न्यायालय) |
| संबंधित कानून | Negotiable Instruments Act, 1881 – Section 138 (Proviso b) & Section 139 |
| संबंधित नजीर | Supreme Court ruling in Central Bank of India v. Saxons Farma (1999) |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | 1. धारा 138 के लीगल नोटिस में ‘Demand’ शब्द का शाब्दिक इस्तेमाल अनिवार्य नहीं है; यदि ‘Advice’ या ‘Request’ शब्द के माध्यम से भुगतान की मांग और कानूनी चेतावनी स्पष्ट है, तो नोटिस वैध है। 2. हस्ताक्षर स्वीकार होने पर धारा 139 की विधिक उपधारणा (Presumption of Liability) लागू होती है। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज; धारा 138 के तहत दोषसिद्धि बरकरार। |
Using of Words In Notice: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI Act) की धारा 138 के तहत जारी किए जाने वाले वैधानिक नोटिस (Statutory Notice) से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट किया है।
यह फैसला न्यायमूर्ति संजीव कुमार शर्मा (Justice Sanjeev Kumar Sharma) की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता प्रोतिमा दत्ता कलिता (Protima Dutta Kalita) की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) को खारिज करते हुए सुनाया। अदालत ने माना है कि चेक बाउंस के नोटिस में स्पष्ट रूप से “मांग” (Demand) शब्द का उपयोग किया जाना अनिवार्य नहीं है, यदि पूरे नोटिस को पढ़ने से चेक की राशि का भुगतान करने की आवश्यकता स्पष्ट रूप से संप्रेषित (Communicate) होती है।
हाई कोर्ट की मुख्य व महत्वपूर्ण टिप्पणियां
- समग्र नोटिस का अर्थ और भाषा का शिष्टाचार:“NI Act की धारा 138 के परंतुक (b) की आवश्यकता यह है कि चेक बाउंस होने पर, आहरी (Payee) द्वारा दराज (Drawer) को चेक की राशि का भुगतान करने की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से संप्रेषित किया जाए। ‘सलाह’ (Advice) शब्द ‘अनुरोध’ (Request) की तरह केवल भाषा का एक विनम्र प्रयोग है, लेकिन इसे NI Act की धारा 138 के उद्देश्य से कानूनी रूप से मांग ही माना जाना चाहिए, यदि नोटिस पूरी तरह से चेक राशि के भुगतान की अनिवार्यता को व्यक्त करता है।”
- सर्वोच्च न्यायालय की मिसाल (Supreme Court Precedent): हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया बनाम सैक्सन्स फार्मा (1999)’ [Central Bank of India v. Saxons Farma] का हवाला दिया। कोर्ट ने दोहराया कि नोटिस में इस्तेमाल की गई भाषा का रूप महत्वपूर्ण नहीं है, बशर्ते वह भुगतान करने की आवश्यकता और भुगतान न करने पर कानूनी कार्रवाई के परिणामों को स्पष्ट रूप से दर्शाती हो।
मामला क्या था? (Case Background)
- ऋण और चेक बाउंस का मामला
- प्रोतिमा दत्ता कलिता ने अपने बेटे की शादी के खर्च के लिए रीना बोरगोहेन (Rina Borgohain) से 1,30,000 रुपये का ऋण लिया था और इसके बदले 16 दिसंबर 2016 की तारीख का एसबीआई (Dergaon Branch) का चेक तथा एक हस्तलिखित नोट जारी किया था।
- बैंक में जमा करने पर चेक बाउंस हो गया, जिसके बाद रीना बोरगोहेन ने 9 जनवरी 2017 को वैधानिक नोटिस भेजा और फिर NI Act की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज कराई।
- निचली अदालतों द्वारा सजा
- CJM, गोलाघाट: 21 फरवरी 2017 को आरोपी को दोषी ठहराते हुए 1 साल की कैद और 3,00,000 रुपये के मुआवजे का आदेश दिया।
- सेशन जज, गोलाघाट: अपील में सजा घटाकर 6 महीने की कैद और 2,60,000 रुपये का मुआवजा कर दी गई, जिसके खिलाफ आरोपी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
- हाई कोर्ट में याचिकाकर्ता के तर्क और कोर्ट का फैसला
- तर्क 1: ऋण देने की सटीक तारीख का खुलासा नहीं किया गया था।
- कोर्ट का रुख: धारा 139 NI Act के तहत कानूनी उपधारणा (Presumption) लागू होती है कि चेक वैध देनदारी के लिए जारी किया गया था। आरोपी इस धारणा को खंडित करने में विफल रही।
- तर्क 2: नोटिस में ‘Demand’ शब्द के बजाय केवल भुगतान करने की ‘Advice’ दी गई थी, जो कानूनन अमान्य है।
- कोर्ट का रुख: ‘Advice’ या ‘Request’ जैसे शब्दों का प्रयोग केवल एक विनम्र अभिव्यक्ति है। चूंकि नोटिस में भुगतान न करने पर कानूनी कार्रवाई (Court of Law) की चेतावनी दी गई थी, इसलिए यह वैध मांग नोटिस है।
- तर्क 1: ऋण देने की सटीक तारीख का खुलासा नहीं किया गया था।
⚖️ गुवाहाटी हाई कोर्ट का अंतिम आदेश
- पुनरीक्षण याचिका खारिज: हाई कोर्ट ने प्रोतिमा दत्ता कलिता की याचिका खारिज कर दी।
- दोषसिद्धि बरकरार: धारा 138 NI Act के तहत आरोपी की दोषसिद्धि और सजा को सही ठहराया गया।

