केस एवं विधिक सारांश (Overview Matrix)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (August 2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति संजय कुमार एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन (सुप्रीम कोर्ट) |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या अलग-अलग Committal Orders होने पर Sessions Court Joint Trial चला सकती है? |
| संबंधित कानूनी प्रावधान | CrPC Sections 209, 223 & 233 (BNSS के सुसंगत प्रावधान) |
| अदालत की व्यवस्था | 1. Committal Order केवल क्षेत्राधिकार देता है, Trial का तरीका तय नहीं करता। 2. एक ही घटना से जुड़े मामलों में Joint Trial का निर्णय लेना Trial Court के स्वविवेक पर निर्भर करता है। |
Joint Trial: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि कमिटल आदेश (Committal Orders – निचले मजिस्ट्रेट द्वारा मामले को सेशन कोर्ट भेजने का आदेश) यह तय नहीं करते हैं कि विचारण (Trial) संयुक्त रूप से आयोजित किया जाएगा या अलग से।
शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया कि यह निर्णय लेने का अनन्य विशेषाधिकार (Exclusive Discretion) पूरी तरह से सत्र न्यायालय (Trial Court/Sessions Court) के पास है। न्यायाधीश संजय कुमार और न्यायाधीश के. विनोद चंद्रन की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा, कमिटल आदेश यह निर्धारित नहीं करते हैं कि विचारण एकल, पृथक या संयुक्त होगा; यह पूरी तरह से अदालत के विशेषाधिकार और विवेक के अधीन है। कमिटल आदेश सत्र अदालत को केवल उन व्यक्तियों के विचारण पर प्रसंज्ञान (Cognizance) लेने का अधिकार देता है जिन्हें सुपुर्द किया गया है; यह इस बात को नियंत्रित नहीं करता कि विचारण किस तरीके से आयोजित किया जाएगा।
🏛️ सुप्रीम कोर्ट की मुख्य विधिक व्यवस्था व सिद्धांत
- धारा 223/233 CrPC (BNSS के सुसंगत प्रावधान) और संयुक्त विचारण का नियम
- अदालत ने माना कि यदि एक ही घटना/लेनदेन (Same Transaction) के क्रम में या एक ही अपराध के लिए अलग-अलग समय पर अलग-अलग कमिटल आदेश जारी किए गए हैं, तो सत्र न्यायालय उन्हें एक साथ मिलाकर संयुक्त विचारण चला सकता है।
- फरार/अनुपस्थित आरोपियों के मामले में: जब एक या एक से अधिक आरोपी शुरुआत में अनुपस्थित रहने के कारण छूट जाते हैं, लेकिन मुख्य विचारण शुरू होने से पहले उपलब्ध हो जाते हैं और उन्हें बाद में कमिट (सत्र अदालत को प्रेषित) किया जाता है, तो सेशन जज दो अलग-अलग मुकदमे चलाने के लिए बाध्य नहीं है।
- पूर्वाग्रह (Prejudice) सिद्ध होना आवश्यक:
- पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक आरोपी यह साबित नहीं कर देता कि संयुक्त विचारण से उसके बचाव के अधिकार को कोई गंभीर नुकसान या पूर्वाग्रह (Prejudice) पहुंचा है, तब तक केवल अलग-अलग कमिटल आदेशों के आधार पर विचारण को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)
- मामला और प्रक्रियागत स्थिति:
- एक ही घटना और एक ही प्राथमिकी (FIR) से जुड़े मामले में दो अलग-अलग कमिटल आदेश पारित किए गए थे। शुरुआत में दो सत्र मामलों (Sessions Cases) में साक्ष्य अलग-अलग दर्ज किए गए थे।
- इसके बाद, सत्र न्यायालय ने दोनों मामलों को एक साथ जोड़कर संयुक्त विचारण आयोजित किया। हालांकि, फैसला सुनाते समय अदालत ने एक ही दिन दोनों मामलों में अलग-अलग निर्णय दिए।
- सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:
- न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि इस मामले में आयोजित संयुक्त विचारण में कोई अवैधता नहीं थी क्योंकि आरोपियों को इससे कोई कानूनी नुकसान/पूर्वाग्रह नहीं पहुंचा था।

