मामले के मुख्य बिंदु और हाईकोर्ट का फैसला
- समीक्षा के लिए ‘नया तथ्य’ अनिवार्य: अदालत ने कहा कि एक बार जब वैध मंजूरी के तहत आपराधिक मामला शुरू हो जाता है, तो प्राधिकारी अपनी समीक्षा शक्ति का उपयोग करके मंजूरी वापस नहीं ले सकते, जब तक कि कोई नया तथ्य सामने न आया हो। इस मामले में, मंजूरी वापस लेने का फैसला उन्हीं सामग्रियों के आधार पर लिया गया था जिन पर मंजूरी देते समय विचार किया जा चुका था।
- 20% छूट और आय से अधिक संपत्ति का सवाल ट्रायल कोर्ट तय करे: याचिकाकर्ता का तर्क था कि उनकी कुल आय और संपत्तियों की गणना में त्रुटि थी तथा उनकी संपत्ति 2008 के सरकारी दिशानिर्देशों के तहत अनुमेय 20% सीमा के भीतर थी। इस पर कोर्ट ने कहा कि आय से अधिक संपत्ति 20% से कम है या ज्यादा, यह बात मुकदमा (Trial) के दौरान विशेष अदालत तय करेगी और याचिकाकर्ता वहां अपनी बात रख सकते हैं।
- धारा 19 का उद्देश्य बनाम दुरुपयोग:हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि धारा 19 लोक सेवकों को अनावश्यक मुकदमों से सुरक्षा प्रदान करती है, लेकिन उपलब्ध सामग्री पर संतुष्ट होकर एक बार मंजूरी देने के बाद, बिना किसी नई सामग्री के केवल पूर्व निर्णय को बदलना न्यायसंगत नहीं है।
अमरावती: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (PC Act) की धारा 19 के तहत लोक सेवकों के खिलाफ दी जाने वाली अभियोजन मंजूरी (Prosecution Sanction), उसके पुनरीक्षण (Review), और बिना किसी नए साक्ष्य के मंजूरी वापस लेने की प्रशासनिक शक्तियों की सीमा पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत दोहराया है।
न्यायमूर्ति बालाजी मेदामल्ली की एकल पीठ ने नगर प्रशासन एवं शहरी विकास विभाग (MA&UD) के एक सेवानिवृत्त कार्यपालक अभियंता (Executive Engineer) द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार के उस आदेश (G.O.Rt. No. 763 दिनांक 3 अक्टूबर 2024) को चुनौती दी थी, जिसके तहत मंजूरी वापस लेने के उसके पिछले फैसले को निरस्त कर याचिकाकर्ता के खिलाफ भ्रष्टाचार के आपराधिक मुकदमे को पुनः बहाल कर दिया गया था। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि एक बार सक्षम प्राधिकारी द्वारा वैध रूप से अभियोजन मंजूरी दिए जाने, आरोप पत्र (Chargesheet) दाखिल होने और सक्षम आपराधिक अदालत द्वारा संज्ञान ले लिए जाने के बाद, सरकार या प्राधिकारी उसी पुरानी सामग्री के आधार पर अपनी “राय बदलकर” (Mere change of opinion) अभियोजन मंजूरी वापस नहीं ले सकते। ऐसा पुनरीक्षण केवल और केवल तभी संभव है जब कोई नई और पुख्ता सामग्री (Fresh Material) सामने आए।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं अवलोकन
1. ‘समान सामग्री पर राय बदलना मंजूरी वापसी का वैध आधार नहीं’ न्यायमूर्ति बालाजी मेदामल्ली ने सक्षम प्राधिकारी की समीक्षा शक्तियों की कानूनी सीमाओं को स्पष्ट करते हुए अपने आदेश में कहा: “एक बार जब वैध अभियोजन मंजूरी के अनुसरण में आपराधिक अभियोजन शुरू (Set in motion) हो जाता है, तो प्राधिकारी किसी ऐसी नई सामग्री के अभाव में, जो ऐसे पुनर्विचार का औचित्य सिद्ध करती हो, अपनी पुनरीक्षण शक्ति (Power of Review) का प्रयोग करके मंजूरी वापस नहीं ले सकते। वर्तमान मामले में अभियोजन का ऐसा कोई रुख नहीं है कि मंजूरी दिए जाने या आरोप पत्र दाखिल होने के बाद कोई नई सामग्री प्रकाश में आई थी जिसके चलते मंजूरी वापस लेना आवश्यक हुआ हो। मंजूरी वापस लेने की सिफारिश उसी सामग्री के आधार पर की गई थी जिस पर मंजूरी देते समय पहले ही विचार किया जा चुका था।”
2. ‘20% से कम या अधिक संपत्ति का विवाद ट्रायल कोर्ट का विषय’
- याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि उनके आय के वैध स्रोतों की सही गणना नहीं की गई थी और 2008 के सरकारी मीमो के तहत निर्धारित 20% की अनुमेय भिन्नता (Permissible Variation) के भीतर उनकी संपत्ति आती है।
- अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए स्पष्ट किया:“याचिकाकर्ता की आय से अधिक संपत्ति उसके ज्ञात आय स्रोतों के 20% से अधिक थी या कम—यह एक ऐसा तथ्यात्मक विषय है जिस पर सक्षम आपराधिक अदालत द्वारा ट्रायल (विचारण) के दौरान ही विचार किया जा सकता है। याचिकाकर्ता को उक्त अदालत के समक्ष इस संबंध में अपनी सभी आपत्तियां व दलीलें उठाने का पूरा अवसर उपलब्ध है। इसलिए, जब आपराधिक मुकदमा पहले ही शुरू हो चुका है, तब इस मुद्दे को अभियोजन मंजूरी वापस लेने का आधार नहीं बनाया जा सकता।”
3. एसीबी (ACB) के हस्तक्षेप और सरकार द्वारा आदेश सुधारने को ठहराया सही
- अदालत ने रेखांकित किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 का उद्देश्य लोक सेवकों को अनावश्यक या दुर्भावनापूर्ण मुकदमों से बचाना है। परंतु जब सरकार ने मूल रिकॉर्ड पर संतुष्ट होकर वैध मंजूरी दी थी, तो बाद में बिना किसी नई सामग्री के G.O.Ms. No. 63 के जरिए मंजूरी वापस लेना कानूनन टिकने योग्य नहीं था।
- भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के महानिदेशक द्वारा कानूनी स्थिति और न्यायिक निर्णयों से सरकार को अवगत कराना पूरी तरह उचित था, जिसके आधार पर सरकार ने अपनी गलती सुधारते हुए 3 अक्टूबर 2024 को G.O.Rt. No. 763 जारी कर पूर्व अभियोजन को बहाल किया।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं कालक्रम
- 1977 से 2017 का सेवाकाल: याचिकाकर्ता 1977 में नगर प्रशासन एवं शहरी विकास विभाग में शामिल हुए थे और वर्ष 2017 में कार्यपालक अभियंता पद से सेवानिवृत्त हुए।
- 2010 में ACB का छापा: वर्ष 2010 में एसीबी ने उनके खिलाफ ज्ञात स्रोतों से अधिक अनुपातहीन संपत्ति (Disproportionate Assets) अर्जित करने का मामला दर्ज किया। जांच पूरी होने के बाद विशाखापत्तनम स्थित एसीबी मामलों की विशेष अदालत में चार्जशीट दायर की गई।
- 2014 में अभियोजन मंजूरी (G.O.Ms. No. 200): सक्षम सरकारी प्राधिकारी ने 20 सितंबर 2014 को औपचारिक जांच सामग्री का परीक्षण करने के बाद आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने की वैधानिक मंजूरी प्रदान कर दी।
- 2024 में अभियोजन मंजूरी की वापसी (G.O.Ms. No. 63): सेवानिवृत्ति के बाद आरोपी ने कई अभ्यावेदन दिए कि आय के वैध स्रोतों को शामिल नहीं किया गया है। सरकार ने उसी पुरानी पत्रावली का पुनः परीक्षण कर माना कि संपत्ति 20% के अनुमेय दायरे में है और 16 मई 2024 को मंजूरी वापस ले ली।
- डीजी एसीबी की आपत्ति और बहाली (G.O.Rt. No. 763): एसीबी महानिदेशक ने सरकार को पत्र लिखकर आगाह किया कि अदालत संज्ञान ले चुकी है और बिना किसी नए तथ्य के केवल राय बदलकर मंजूरी वापस लेना सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लंघन है। इसके बाद सरकार ने 3 अक्टूबर 2024 को मंजूरी वापसी का आदेश निरस्त कर आपराधिक मुकदमे को पुनः आगे बढ़ाने का आदेश दिया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: सेवानिवृत्त कार्यपालक अभियंता बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, नगर प्रशासन एवं शहरी विकास विभाग, व महानिदेशक, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) [W.P. – आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (PC Act, 1988) की धारा 19 (अभियोजन के लिए पूर्व मंजूरी की अनिवार्यता)
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(e) सहपठित 13(2) (लोक सेवक द्वारा आय से अधिक संपत्ति रखना)
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 197 / भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 218 (लोक सेवकों के अभियोजन हेतु प्रक्रिया)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 226 (असाधारण रिट क्षेत्राधिकार)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश बनाम निशांत सरीन (2010, सुप्रीम कोर्ट) — ‘सक्षम प्राधिकारी उसी सामग्री पर अपनी राय बदलकर पहले से दी गई अभियोजन मंजूरी को न तो वापस ले सकता है और न ही बिना किसी नई सामग्री के पूर्व आदेश की समीक्षा कर सकता है।’
- सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) बनाम अशोक कुमार अग्रवाल (2014, सुप्रीम कोर्ट) — ‘अभियोजन मंजूरी देने या वापस लेने का अधिकार एक प्रशासनिक विवेक है, परंतु यह स्थापित विधिक सिद्धांतों से बंधा है; एक बार संज्ञान हो जाने के बाद ट्रायल कोर्ट ही साक्ष्यों का अंतिम निर्णायक है।’
- दिनेश कुमार बनाम चेयरमैन, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (2012, सुप्रीम कोर्ट) — ‘मंजूरी के चरण में साक्ष्यों का सूक्ष्म मूल्यांकन या बचाव पक्ष के दावों की सत्यता जांचना आवश्यक नहीं है; यह परीक्षण ट्रायल का विषय है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति बालाजी मेदामल्ली (आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्णय: रिट याचिका खारिज (Writ Petition Dismissed); विशाखापत्तनम एसीबी विशेष अदालत में आपराधिक ट्रायल जारी रहेगा।
PC Act:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय (High Court of Andhra Pradesh) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति बालाजी मेडमल्ली (Justice Balaji Medamalli) |
| याचिकाकर्ता | मेत्ता अप्पन्ना (सेवानिवृत्त कार्यकारी अभियंता) |
| संबंधित कानून | भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 19 |
| मुख्य मुद्दा | क्या सरकार मुकदमा चलाने की अपनी ही पूर्व-स्वीकृति (Prosecution Sanction) को बिना किसी नई सामग्री के वापस ले सकती है? |
| अदालत का फैसला | याचिका खारिज; मंजूरी की समीक्षा केवल नए तथ्यों/सबूतों के आधार पर ही संभव है, राय बदलकर नहीं। |

