हाईकोर्ट का मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
- अराजकता की स्थिति पैदा होगी: अदालत ने बैंक के रवैये पर नाराजगी जताते हुए स्पष्ट कहा:“किसी भी मुकदमैबाज़ को अपने वकील की दलीलों के आधार पर पारित आदेशों से मुकरने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यदि इसकी अनुमति दी गई, तो इससे अदालत में अराजकता की स्थिति पैदा हो जाएगी। ऐसी परिस्थितियों में याचिकाकर्ता को ‘एक ही फल का दूसरा स्वाद’ (Second bite at the cherry) लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती।” — दिल्ली हाईकोर्ट
- वकील और मुवक्किल के रिश्ते की पवित्रता पर प्रहार: कोर्ट ने टिप्पणी की कि ‘अधिकार/निर्देश न होने’ की दलील देकर वकील के बयान से पीछे हटना अधिवक्ता और मुवक्किल के रिश्ते की बुनियाद और न्यायिक प्रक्रिया में वकील की भूमिका की पवित्रता को कमजोर करता है। वकील कोई केवल यांत्रिक एजेंट (Mechanical Agent) नहीं होता, बल्कि वह वकालतनामे के तहत कोर्ट का एक अधिकारी होता है।
- 13 महीने तक बैंक की चुप्पी पर सवाल: बैंक ने ₹14.5 लाख के ऋण चूक मामले में चेक बाउंस का केस दर्ज कराया था। सितंबर 2024 में बैंक के वकील ने लोक अदालत में बताया था कि मामला सुलझ गया है और पूरा भुगतान मिल गया है, जिसके आधार पर आरोपियों को बरी कर दिया गया।
- हाईकोर्ट ने नोट किया कि बैंक 13 महीने तक शांत रहा।
- बैंक ने उस वकील के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई भी नहीं की और उल्टा अन्य मामलों में भी उसी वकील की सेवाएं लेता रहा। ऐसे में बैंक बाद में अपनी जिम्मेदारी से नहीं भाग सकता।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने वकील-मुवक्किल संबंध (Advocate-Client Relationship), अदालत में वकील द्वारा दिए गए बयानों की विधिक बाध्यता, और लोक अदालत द्वारा पारित अवार्ड की अपरिवर्तनीयता पर एक अत्यंत कड़ा और स्पष्ट फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की एकल पीठ ने इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक लिमिटेड (Equitas Small Finance Bank Ltd) द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। बैंक ने सितंबर 2024 में राष्ट्रीय लोक अदालत द्वारा नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 के तहत दायर चेक बाउंस मामले में पारित अवार्ड को रद्द करने और केस को दोबारा खोलने की मांग की थी। अदालत ने व्यवस्था दी है कि कोई भी वादकारी अपने स्वयं के वकील द्वारा अदालत में दी गई दलीलों या दर्ज कराए गए बयानों के आधार पर पारित आदेशों से बाद में ‘निर्देशों या प्राधिकार के अभाव’ (Lack of Instructions/Authority) का बहाना बनाकर पीछे नहीं हट सकता। अदालत ने दो टूक कहा कि यदि ऐसी छूट दी गई तो पूरी न्यायिक प्रणाली में अराजकता (Chaos) की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं अवलोकन
1. ‘वकील के बयानों से मुकरना अराजकता पैदा करेगा; बैंक को दोबारा मौका नहीं दिया जा सकता’ न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने न्यायिक निर्णयों की स्थिरता और वकील के बयानों की गरिमा को रेखांकित करते हुए अपने आदेश में दर्ज किया: “याचिकाकर्ता जैसा कोई भी वादकारी अपने वकील की दलीलों के बल पर पारित आदेश/आदेशों से पीछे हटने (Resile) की अनुमति नहीं पा सकता। यदि ऐसी अनुमति दी जाती है, तो इससे पूरी व्यवस्था में एक अराजक स्थिति (Chaotic Situation) पैदा हो जाएगी। ऐसी परिस्थितियों में याचिकाकर्ता को एक ही मामले में बार-बार दूसरा मौका पाने (Second bite at the cherry) की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
2. ‘वकील-मुवक्किल संबंध की नींव पर आघात’: वकील केवल मैकेनिकल एजेंट नहीं पीठ ने बैंक द्वारा अपने ही नामित वकील पर ‘बिना अधिकार के समझौता स्वीकार करने’ का आरोप लगाने की कड़ी आलोचना करते हुए कहा: “याचिकाकर्ता का अपने वकील द्वारा दिए गए बयान से ‘निर्देशों/अधिकार/अनुसमर्थन के अभाव’ की दलील देकर मुकरने का प्रयास कानून की नजर में पूरी तरह अस्थिर और अस्वीकार्य है। यह प्रयास वकील-मुवक्किल संबंध (Advocate-Client Relationship) की बुनियादी नींव पर ही चोट करता है और न्यायनिर्णयन प्रक्रिया में अदालत की सहायता करने वाले वकील की भूमिका की पवित्रता को कमजोर करता है।”
अदालत ने आगे जोड़ा कि वकील के पास वैध वकालतनामा था। वकील अदालत का एक अधिकारी (Officer of the Court) होता है, न कि अपने मुवक्किल का कोई महज यांत्रिक एजेंट (Mechanical Agent)।
3. 13 महीने की खामोशी और उसी वकील को अन्य केस सौंपने का विरोधाभास
- अदालत ने पत्रावली का विश्लेषण करते हुए पाया कि लोक अदालत का फैसला सितंबर 2024 में आया था, जबकि बैंक ने 13 महीने से अधिक समय तक पूरी तरह चुप्पी साधे रखी।
- न तो बैंक ने अपने वकील के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की और न ही कोई स्पष्टीकरण मांगा; बल्कि बैंक अन्य मुकदमों में उसी वकील की सेवाएं लेता रहा।
- अदालत ने टिप्पणी की:“यदि याचिकाकर्ता को अपने नामित वकील के खिलाफ कोई वास्तविक या वैध शिकायत थी, तो यह अत्यधिक अस्वाभाविक है कि वह इतने लंबे समय तक पूरी तरह खामोश रहता। विद्वान जेएमएफसी और लोक अदालत दोनों ने याचिकाकर्ता के अपने अधिकृत वकील के बयानों के आधार पर ही कार्यवाही आगे बढ़ाई थी, जिसे याचिकाकर्ता ने भी नकारा नहीं है। अतः याचिकाकर्ता अब वहां घटित हुई कार्यवाही से बचकर नहीं निकल सकता।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
- ₹14.5 लाख का ऋण और चेक बाउंस: इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक ने वर्ष 2021 में उधारकर्ताओं को ₹14.5 लाख का ऋण प्रदान किया था। किस्तों के भुगतान में चूक के कारण खाता गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) घोषित हो गया।
- धारा 138 NI Act का मुकदमा: बकाये के भुगतान के एवज में उधारकर्ताओं द्वारा जारी किया गया चेक अनादरित (Dishonoured) हो गया, जिसके बाद बैंक ने मजिस्ट्रेट अदालत (JMFC) में चेक बाउंस का आपराधिक परिवाद दायर किया।
- अदालत में पूर्ण भुगतान और समझौते का बयान:
- मुकदमे की सुनवाई के दौरान बैंक के नामित वकील ने निचली अदालत को सूचित किया कि पूरी राशि प्राप्त होने के बाद विवाद का आपसी निपटारा हो चुका है।
- मामले को 14 सितंबर 2024 को आयोजित राष्ट्रीय लोक अदालत (National Lok Adalat) में भेजा गया, जहां वकील ने समझौते की पुष्टि की।
- लोक अदालत ने समझौते के आधार पर अपराध का शमन (Compounding) स्वीकार करते हुए अभियुक्त उधारकर्ताओं को बरी कर दिया और अवार्ड पारित कर दिया।
- एक साल बाद बैंक का यू-टर्न: एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद बैंक ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर दावा किया कि वकील ने बिना किसी प्राधिकार (Without Authority) और भारी भ्रम (Immense Confusion) के चलते समझौते का बयान दिया था, इसलिए लोक अदालत के अवार्ड को वापस (Recall) लिया जाए। हाईकोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक लिमिटेड बनाम निर्मला बाई शांतिलाल व अन्य [W.P.(C) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (इक्विटास बैंक) की ओर से: अधिवक्ता के.एस. महादेवा, स्वाति बंसल एवं आर. रंगराजन
- प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
- विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (Legal Services Authorities Act, 1987) की धारा 21 एवं 22E (लोक अदालत के अवार्ड की अंतिमता – कोई अपील नहीं)
- परक्राम्य लिखित अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) की धारा 138 एवं धारा 147 (अपराधों का शमन / Compounding of Offences)
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) — वकालतनामे के तहत अधिवक्ता के अंतर्निहित अधिकार एवं विधिक स्थिति
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 226 (लोक अदालत के अवार्ड के खिलाफ असाधारण रिट क्षेत्राधिकार का सीमित दायरा)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- पंजाब नेशनल बैंक बनाम लक्ष्मण शर्मा (सुप्रीम कोर्ट) एवं ब्योमकेश चक्रवर्ती बनाम भारत संघ — ‘वकील द्वारा अपने मुवक्किल की ओर से सद्भावनापूर्वक और वकालतनामे के अधिकार के तहत अदालत में दिए गए बयान मुवक्किल पर बाध्यकारी होते हैं; मुवक्किल बाद में अपनी सुविधानुसार उनसे मुकर नहीं सकता।’
- राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘लोक अदालत के अवार्ड को एक दीवानी अदालत की डिक्री का दर्जा प्राप्त है; धोखाधड़ी के ठोस और अकाट्य सबूतों के बिना केवल वकील की गलती बताकर लोक अदालत के अवार्ड को चुनौती नहीं दी जा सकती।’
- पीठ: न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी (दिल्ली उच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्णय: रिट याचिका खारिज (Petition Dismissed); लोक अदालत का अवार्ड पूरी तरह बरकरार।
Advocate-Client Relationship: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी (Justice Saurabh Banerjee) |
| मामले का नाम | Equitas Small Finance Bank Ltd vs Nirmala Bai Shanthilal & Ors. |
| मूल विवाद | चेक बाउंस (NI Act धारा 138) मामला लोक अदालत में सेटल होने के बाद बैंक द्वारा आदेश रद्द कराने की याचिका |
| हाईकोर्ट का फैसला | बैंक की याचिका खारिज; कहा- वकील द्वारा दिए गए बयान के आधार पर पारित आदेश से मुकरना अराजकता फैलाएगा। |

