Age Count: दिल्ली हाई कोर्ट ने अपराधियों की परिवीक्षा अधिनियम, 1958 (Probation of Offenders Act, 1958) के एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान की व्याख्या करते हुए बड़ा स्पष्टीकरण दिया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले (सुदेश कुमार बनाम उत्तराखंड राज्य, 2008) का हवाला देते हुए यह कानूनी स्थिति साफ की। अदालत ने फैसला सुनाया है कि अधिनियम की धारा 6 का लाभ किसी आरोपी को केवल तभी मिल सकता है, जब वह सजा सुनाए जाने की तारीख (Date of Imposition of Punishment) पर 21 वर्ष से कम आयु का हो, न कि अपराध करने की तारीख (Date of Commission of Offence) पर।
अदालत की मुख्य कानूनी व्याख्या (Key Legal Interpretations)
आयु निर्धारण का सही समय क्या है?: हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अपराध करते समय आरोपी की उम्र क्या थी, यह धारा 6 के तहत प्रोबेशन (परिवीक्षा) का लाभ देने के लिए प्रासंगिक नहीं है। “यदि दोषसिद्धि (Conviction) और सजा (Sentence) के आदेश की तारीख पर आरोपी की उम्र 21 वर्ष से कम है, केवल तभी इस अधिनियम की धारा 6 के प्रावधान लागू होंगे। यदि सजा सुनाए जाने के वक्त वह 21 वर्ष की आयु पार कर चुका है, तो वह इस विशेष सुरक्षा का हकदार नहीं होगा।
आजीवन कारावास वाले अपराधों में कोई प्रोबेशन नहीं: पीठ ने याद दिलाया कि प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट उन अपराधियों पर प्रतिबंध लगाता है जो कम उम्र के हैं, ताकि उन्हें जेल न भेजा जाए। लेकिन इसकी एक अनिवार्य शर्त है, आरोपी भले ही 21 साल से कम उम्र का हो, लेकिन उसने जो अपराध किया है वह मृत्युदंड या आजीवन कारावास (Imprisonment for Life) से दंडनीय नहीं होना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि और विवाद (Case Background)
- यह मामला पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) और आईपीसी की धाराओं के तहत एक गंभीर अपराध से जुड़ा था।
- मूल मामला: प्रतिवादी दीपक को आईपीसी की धारा 363 (अपहरण), 366 (शादी के लिए मजबूर करने के लिए महिला का अपहरण), 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना) और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 (गंभीर मर्मभेदी यौन हमला / Aggravated Penetrative Sexual Assault) के तहत दोषी ठहराया गया था।
- प्रतिवादी (दोषी) का तर्क: दोषी का कहना था कि साल 2014 में जब यह घटना हुई थी, तब वह लगभग 21 वर्ष का था। उसने यह भी दलील दी कि अब पीड़ित और वह दोनों अपने-अपने जीवन में व्यवस्थित हो चुके हैं, इसलिए उसे प्रोबेशन का लाभ देकर छोड़ दिया जाना चाहिए।
- राज्य (अभियोजन) का रुख: अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) अमन उस्मान ने दलील दी कि चूंकि पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत न्यूनतम 10 साल की कठोर कैद का प्रावधान है (जो आजीवन कारावास तक बढ़ सकता है), इसलिए कानूनन इसमें प्रोबेशन का लाभ नहीं दिया जा सकता।
हाई कोर्ट का अंतिम निर्णय और सजा
- अदालत ने दो मुख्य आधारों पर दोषी दीपक की प्रोबेशन की मांग को खारिज कर दिया।
- उम्र का आधार: सजा सुनाए जाने के दिन प्रतिवादी की उम्र 21 वर्ष से अधिक हो चुकी थी, इसलिए वह तकनीकी रूप से धारा 6 के दायरे से बाहर था।
- अपराध की गंभीरता: पॉक्सो कानून बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए बनाया गया एक विशेष कानून है। चूंकि इसके तहत उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है, इसलिए नीतिगत और कानूनी तौर पर ऐसे जघन्य मामलों में प्रोबेशन का लाभ नहीं दिया जा सकता।
- पीड़िता को मुआवजा: हाई कोर्ट ने प्रतिवादी को प्रोबेशन देने से इनकार करते हुए, पीड़ित बच्ची के साथ हुए जघन्य अपराध (बलात्कार) के एवज में उसे ₹10.5 लाख का मुआवजा (Compensation) देने का आदेश जारी किया।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी बिंदु | दिल्ली हाई कोर्ट का निर्णय |
| पीठ (Bench) | जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा |
| केंद्रीय कानून | प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट की धारा 6 बनाम पॉक्सो एक्ट की धारा 6 |
| तय सिद्धांत | प्रोबेशन के लिए सजा के दिन उम्र 21 वर्ष से कम होनी चाहिए, अपराध के दिन नहीं। |
| पीड़ित राहत | पीड़ित बच्ची को 10.5 लाख रुपये का मुआवजा मंजूर। |
निष्कर्ष (Takeaway)
यह फैसला अदालतों में चल रहे उन मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर है जहां मुकदमे की लंबी सुनवाई (Trial) के कारण आरोपी अपराध के समय तो नाबालिग या युवा (21 से कम) होता है, लेकिन सजा होते-होते वयस्क हो जाता है। दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून की उदारता का लाभ केवल उन्हीं को मिलेगा जो सजा के दिन भी कानूनी रूप से युवा (Under 21) हैं, बशर्ते उनका अपराध आजीवन कारावास की श्रेणी का न हो।

