Sunday, October 4, 2026
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Criminal Jurisprudence: क्या बिना हैंडलर की गवाही के स्निफर डॉग का साक्ष्य मान्य है?…खोजी कुत्ते की भूमिका पर स्पष्ट कानूनी नीति यहां पढ़ें

Criminal Jurisprudence: फौजदारी कानून और वैज्ञानिक साक्ष्यों की स्वीकार्यता को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और मार्गदर्शक फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने आगरा की सत्र अदालत (Trial Court) द्वारा साल 2020 में दी गई उम्रकैद की सजा को पूरी तरह से रद्द (Set Aside) करते हुए चार आरोपियों भंवर सिंह, बेनीराम, ओम प्रकाश और कप्तान सिंह—को बाइज्जत बरी कर दिया। इन पर साल 1998 में हुई एक हत्या का आरोप था, जिसमें पुलिस ने मुख्य रूप से ‘स्निफर डॉग’ की थ्योरी पर पूरा केस टिकाया था।

यह रही पुलिस की खोजी प्रक्रिया संबंधी टिप्पणी

अदालत ने कहा, आपराधिक मुकदमों में खोजी कुत्तों (Sniffer Dogs) द्वारा संदिग्धों को ढूंढने या उनके घर तक पहुंचने के दावे को तब तक अचूक कानूनी सबूत नहीं माना जा सकता, जब तक कि उस पूरी खोजी प्रक्रिया (Tracking) का एक-एक विवरण स्पष्ट रूप से पंचनामे (Panchnama) में दर्ज न हो। इसके साथ ही, अदालत में उस खोजी कुत्ते के ट्रेनर या हैंडलर (Dog Handler) का मुख्य गवाह के रूप में परीक्षण होना और उसका जिरह (Cross-examination) की कसौटी पर खरा उतरना अनिवार्य है। केवल इस बात के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि पुलिस का कुत्ता घटनास्थल से चलकर किसी के दरवाजे पर जाकर रुक गया था।”

मामला क्या है?: 1998 का मर्डर केस, दो विरोधाभासी कहानियां और CBCID की एंट्री

यह पूरा मामला लगभग 28 साल पुराना है और इसकी कानूनी कड़ियां उलझी हुई थीं।

वारदात (अक्टूबर 1998): आगरा के एक गांव का रहने वाला सुखपाल उर्फ मुन्ना 14 अक्टूबर 1998 की रात डेयरी पर दूध देने निकला था, जिसके बाद वह लापता हो गया। बाद में उसका गोलियों से भुना और चाकुओं से गोदा हुआ शव एक खेत में मिला।

कहानी नंबर 1 (मृतक का भाई): मृतक के भाई (शिकायतकर्ता) ने प्राथमिकी दर्ज कराई कि उसने और उसके परिवार ने टॉर्च की रोशनी में तीन आरोपियों (शिवराज, मंगल और हरपाल) को घटनास्थल से भागते देखा था। (हालांकि, कोर्ट ने इन तीनों को जनवरी 2014 में ही पूरी तरह बरी कर दिया था)।

कहानी नंबर 2 (ग्रामीणों का दावा): ग्रामीणों ने पुलिस कप्तान को आवेदन दिया कि पुरानी रंजिश में उन तीन लोगों को फंसाया जा रहा है। असल में मृतक का चरित्र ठीक नहीं था और उसके पड़ोस के गांव की दो महिलाओं से अवैध संबंध थे। ग्रामीणों के मुताबिक, घटना के बाद जब डॉग स्क्वायड आया था, तो वह ‘फूल सिंह’ नाम के शख्स के कमरे पर गया था, जिससे लगा कि हत्या किसी और ने की है।

CBCID की चार्जशीट: मामले की जांच सीबीसीआईडी (CBCID) को सौंपी गई। सीबीसीआईडी ने पहली कहानी (भाई की गवाही) को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने ग्रामीणों की थ्योरी को पकड़ा और अफवाहों के आधार पर दावा किया कि इन चार वर्तमान अपीलकर्ताओं (भंवर सिंह आदि) ने अपने परिवार की महिलाओं के साथ मृतक के कथित अवैध संबंधों की अफवाहों से नाराज होकर उसकी हत्या की है।

हाई कोर्ट का रुख: संदेह और अफवाहें सबूत नहीं बन सकतीं

निचली अदालत ने सीबीसीआईडी की कहानी को सही मानते हुए जनवरी 2020 में इन चारों को उम्रकैद सुना दी थी। इसके खिलाफ वे हाई कोर्ट पहुंचे। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड्स की जांच के बाद निचली अदालत के फैसले को कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण माना।

अभियोजन पक्ष खुद भ्रमित था

हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मामले में अभियोजन पक्ष (Prosecution) बुनियादी रूप से खुद भ्रमित और अनिश्चित था। उसे खुद साफ अंदाजा नहीं था कि वह किस थ्योरी पर केस लड़ रहा है और किन आरोपियों के खिलाफ साक्ष्य दे रहा है। मुख्य गवाहों ने जिरह में स्वीकार किया कि उन्होंने न तो अपराध होते देखा था और न ही कभी कथित अवैध संबंध अपनी आंखों से देखे थे; वे केवल ‘गांव की गपशप’ और भीड़ की बातें दोहरा रहे थे।

संदेह कितना भी गहरा हो, वह ‘सबूत’ की जगह नहीं ले सकता

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘सुजीत बिस्वास बनाम असम राज्य’ का हवाला देते हुए दोहराया कि कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि संदेह (Suspicion), चाहे वह कितना भी गंभीर या गहरा क्यों न हो, कभी भी विधिक प्रमाण (Proof) का स्थान नहीं ले सकता।

स्निफर डॉग साक्ष्य (Canine Evidence) पर तय किया कड़ा कानूनी पैमाना

इस मामले में पुलिस का सबसे बड़ा दावा यह था कि खोजी कुत्ते ने मृतक के कपड़े सूंघने के बाद सीधे इन चारों आरोपियों के घरों का रास्ता तय किया था। इस वैज्ञानिक/फोरेंसिक साक्ष्य को पूरी तरह खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक विधिक सिद्धांत (Ratio Decidendi) तय किया कि हमारी राय में, पंचनामे में इस बात का एक विश्वसनीय और पूर्ण रिकॉर्ड होना चाहिए कि ट्रैकिंग (खोजी प्रक्रिया) वास्तव में किस तरह की गई थी। खोजी कुत्ते से जुड़ा साक्ष्य पूरी तरह से स्पष्ट, संपूर्ण और अदालत में ‘डॉग हैंडलर’ (कुत्ते के ट्रेनर) की गवाही द्वारा विधिवत प्रमाणित होना चाहिए। पंचनामे में दर्ज विवरण और अदालत के सामने हैंडलर द्वारा दिए गए बयानों में कोई विसंगति (Discrepancy) नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा, हैंडलर की गवाही को अदालत में स्वतंत्र रूप से जिरह (Cross-Examination) की परीक्षा पास करनी होगी। चूंकि इस मामले में न तो कोई आधिकारिक पंचनामा था, न कुत्ते के मूवमेंट की कोई रिपोर्ट थी और पुलिस ने ‘डॉग हैंडलर’ को कभी गवाह के रूप में कोर्ट में पेश ही नहीं किया, इसलिए इस दावे की कोई कानूनी प्रासंगिकता नहीं रह जाती।

खोजी कुत्तों की प्राकृतिक कमियां (Inherent Frailties)

हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2001 के एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले ‘गाडे लक्ष्मी मंगराजू उर्फ रमेश बनाम आंध्र प्रदेश राज्य’ का संदर्भ दिया, जिसमें देश की शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि कुत्तों की सूंघने की प्रवृत्ति और उनके व्यवहार में कई प्राकृतिक और अंतर्निहित कमियां (Inherent Frailties) होती हैं। मनुष्य की तरह कुत्ते यह नहीं बता सकते कि वे किस आधार पर किसी नतीजे पर पहुंचे हैं। इसलिए आपराधिक अदालतों को खोजी कुत्तों के साक्ष्यों पर बहुत अधिक भरोसा या चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, जब तक कि अन्य पुख्ता सबूत मौजूद न हों।

अदालत का अंतिम आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत ने कानूनी रूप से अस्वीकार्य सामग्री और अस्पष्ट अनुमानों (Conjectures) के आधार पर फैसला सुनाकर साक्ष्यों को पढ़ने में भारी भूल की है। खंडपीठ ने दोनों आपराधिक अपीलों को स्वीकार करते हुए चारों आरोपियों की उम्रकैद की सजा को पूरी तरह से निरस्त (Set Aside) कर दिया और उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।

केस मैट्रिक्स: इलाहाबाद हाई कोर्ट का निर्णय (2026)

कानूनी और विधिक श्रेणियांउच्च न्यायालय द्वारा तय की गई कानूनी स्थिति
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ
बरी किए गए अपीलकर्ताभंवर सिंह, बेनीराम, ओम प्रकाश और कप्तान सिंह
सत्र न्यायालय का पिछला आदेशजनवरी 2020 में उम्रकैद की सजा (आगरा कोर्ट)
मुख्य विधिक विषयक्या बिना हैंडलर की गवाही के स्निफर डॉग का साक्ष्य मान्य है?
न्यायालय का विधिक निष्कर्षनहीं, पंचनामा और हैंडलर की गवाही एवं उस पर जिरह होना अनिवार्य है।
अदालत का अंतिम निर्णयअपील स्वीकार; उम्रकैद की सजा रद्द, चारों आरोपी बाइज्जत बरी।
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