दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- धारा 19(iii) का स्पष्ट अर्थ (“Last Resided Together”): हाईकोर्ट ने माना कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 19(iii) में स्पष्ट लिखा है कि याचिका उस अदालत में पेश की जा सकती है जहाँ “विवाह के पक्षकार अंतिम बार एक साथ रहे हों” (last resided together)।“केवल संगम विहार में डेढ़ से दो साल के पुराने निवास पर भरोसा करने से फैमिली कोर्ट को क्षेत्राधिकार नहीं मिल जाता, जब यह स्वीकार किया गया है कि इसके बाद दोनों गुरुग्राम शिफ्ट हो गए थे और अंतिम बार वहीं साथ रहे थे।”
- तकनीकी/प्रक्रियात्मक खामी (Procedural Defect): अदालत ने अपील में एक बड़ी गंभीर प्रक्रियात्मक गलती भी पाई। पत्नी ने अपने पति (जो कि मूल प्रतिवादी था) को पक्षकार बनाने के बजाय NCT दिल्ली सरकार (State of NCT of Delhi) के खिलाफ अपील दायर कर दी थी। अदालत ने कहा कि बिना पति को पक्षकार बनाए यह अपील पोषणीय (Maintainable) ही नहीं थी, हालांकि कोर्ट ने फिर भी मेरिट के आधार पर मामले का निपटारा किया।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) के तहत वैवाहिक विवादों में क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र (Territorial Jurisdiction) को लेकर एक महत्वपूर्ण विधिक स्थिति स्पष्ट की है।
न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति रेणु भटनागर की खंडपीठ ने साकेत फैमिली कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर महिला की अपील को खारिज कर दिया, जिसमें अधिकार क्षेत्र न होने के कारण तलाक की अर्जी को उचित अदालत में प्रस्तुत करने हेतु लौटा दिया गया था (Order VII Rule 10 CPC)। अदालत ने फैसला सुनाया है कि केवल इसलिए कि पति-पत्नी पूर्व में कभी दिल्ली में साथ रहे थे, दिल्ली की फैमिली कोर्ट को क्षेत्राधिकार नहीं मिल जाता—यदि वे बाद में कहीं और शिफ्ट हो गए थे और अंत में किसी अन्य स्थान पर साथ रहे थे।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. HMA की धारा 19(iii) के तहत ‘अंतिम निवास स्थान’ ही मुख्य आधार कानूनी प्रावधान की व्याख्या करते हुए खंडपीठ ने कहा: “केवल संगम विहार में लगभग डेढ़ वर्ष तक पूर्व में साथ रहने के आधार पर फैमिली कोर्ट को क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र प्राप्त नहीं हो सकता, जब यह स्वीकार्य तथ्य है कि उसके बाद दोनों पक्ष गुरुग्राम शिफ्ट हो गए थे और अंतिम बार वहीं एक साथ रहे थे। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19(iii) के तहत वैधानिक आवश्यकता यह है कि पक्षकार उस अदालत के अधिकार क्षेत्र के भीतर ‘अंतिम बार साथ रहे हों’ (Last Resided Together)।”
2. पूर्व निवास के आधार पर स्थायी क्षेत्राधिकार का दावा गलत अदालत ने पत्नी की उन दलीलों और पुरानी नजीरों को खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि संगम विहार में उनका रहना कोई अस्थायी या क्षणिक प्रवास नहीं था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून का कोई भी फैसला इस बात का समर्थन नहीं करता कि पूर्व में जहां भी पति-पत्नी रहे हों, वे सभी स्थान बाद के स्थायी निवास को दरकिनार कर हमेशा के लिए अदालत को अधिकार क्षेत्र प्रदान करते रहेंगे।
अपील में गंभीर प्रक्रियात्मक खामी (पति को पक्षकार न बनाना)
हाईकोर्ट ने अपील की संरचना में एक विचित्र और गंभीर विधिक खामी को रेखांकित किया:
- राज्य को बनाया पक्षकार, पति को छोड़ा: पत्नी ने फैमिली कोर्ट के तलाक आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील तो दायर की, लेकिन उसने मूल प्रतिवादी यानी अपने पति को पक्षकार (Implead) बनाने के बजाय ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य’ (State of NCT of Delhi) के खिलाफ अपील दाखिल कर दी।
- अदालत की टिप्पणी: “हम यह समझने में असमर्थ हैं कि पति-पत्नी के बीच तलाक की कार्यवाही के आदेश को चुनौती देने वाली वर्तमान अपील दिल्ली सरकार के खिलाफ कैसे पोषणीय (Maintainable) हो सकती है, विशेषकर तब जब प्रतिवादी-पति को इस अपील में पक्षकार ही नहीं बनाया गया है।”
हालांकि तकनीकी रूप से अपील पोषणीय नहीं थी, फिर भी अदालत ने मामले का गुण-दोष (Merits) के आधार पर परीक्षण किया और क्षेत्राधिकार के बिंदु पर फैमिली कोर्ट के रुख को सही पाया।
मामले की पृष्ठभूमि (गुरुग्राम बनाम दिल्ली निवास विवाद)
- विवाह और निवास का क्रम: दोनों पक्षों का विवाह जनवरी 2019 में गुरुग्राम (हरियाणा) में हुआ था। शादी के बाद वे लगभग डेढ़ से दो साल तक दिल्ली के संगम विहार में रहे।
- गुरुग्राम में 4 साल का वास: इसके बाद दोनों गुरुग्राम शिफ्ट हो गए और वहां 4 साल से अधिक समय तक एक साथ रहे।
- साकेत कोर्ट में तलाक की अर्जी: पत्नी ने क्रूरता के आधार पर साकेत फैमिली कोर्ट (दिल्ली) में तलाक की याचिका दायर की।
- फैमिली कोर्ट का आदेश: साकेत फैमिली कोर्ट ने माना कि चूंकि दोनों अंतिम बार गुरुग्राम में रहे थे और विवाह भी वहीं हुआ था, इसलिए दिल्ली अदालत के पास क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र नहीं है। कोर्ट ने सीपीसी के आदेश VII नियम 10 के तहत याचिका को सक्षम अदालत (गुरुग्राम फैमिली कोर्ट) में पेश करने के लिए वापस लौटा दिया।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
- फैमिली कोर्ट का आदेश बहाल: हाईकोर्ट ने माना कि सक्षम क्षेत्राधिकार गुरुग्राम की अदालत का है, दिल्ली की अदालत का नहीं।
- अपील खारिज: उच्च न्यायालय ने प्रक्रियात्मक त्रुटि और गुण-दोष दोनों आधारों पर पत्नी की अपील को खारिज कर दिया।
विधिक विवरण
- प्रासंगिक कानूनी प्रावधान: हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 19(iii); सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) का आदेश VII नियम 10
- पीठ: न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति रेणु भटनागर
Resided Together: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठासीन पीठ | जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेणु भटनागर |
| कानूनी प्रावधान | हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 19(iii) & CPC का आदेश 7 नियम 10 |
| विवाद का केंद्र | संगम विहार (दिल्ली) बनाम गुरुग्राम (हरियाणा) का निवास |
| अदालत का फैसला | फैमिली कोर्ट का आदेश सही; गुरुग्राम में अंतिम बार साथ रहने के कारण दिल्ली कोर्ट का क्षेत्राधिकार नहीं। |

