Breach of Trust: मुंबई के एक बेहद अमीर और चर्चित ₹100 करोड़ से अधिक के पारसी वसीयत विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने यह कड़ा और स्पष्ट विधिक रुख अपनाया है।
बाई आवाबाई होरमुसजी टाटा ट्रस्ट’ और अन्य केस की सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने बंबई हाई कोर्ट द्वारा दिए गए अदालत की निगरानी में आपराधिक जांच (Court-Monitored Probe) के आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा है। अदालत ने ‘बाई आवाबाई होरमुसजी टाटा ट्रस्ट’ और अन्य आरोपियों की उन दलीलों को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें दावा किया गया था कि दीवानी (Civil) या वसीयती विवादों में पुलिस जांच नहीं हो सकती।
अदालत ऐसी धोखाधड़ी पर मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकती
शीर्ष अदालत ने कहा, “भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (Indian Succession Act) संपत्ति के प्रशासन और वसीयत के विवादों को जरूर नियंत्रित करता है, लेकिन यह किसी भी व्यक्ति या ट्रस्ट को आपराधिक मुकदमों से सुरक्षा कवच प्रदान नहीं करता। यदि उत्तराधिकार की आड़ में धोखाधड़ी, दस्तावेजों की जालसाजी (Forgery), आपराधिक विश्वासघात (Criminal Breach of Trust) या संपत्ति को अवैध रूप से ट्रांसफर (Siphoning) करने की साजिश रची गई है, तो कानूनन आपराधिक जांच की जाएगी। अदालत ऐसी धोखाधड़ी पर मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकती।
मामला क्या है?: ₹100 करोड़ की संपत्ति और दो विरोधी ‘वसीयतनामा’
यह पूरा कानूनी ड्रामा मुंबई के एक अविवाहित पारसी जोरोस्ट्रियन परवेज बुरजोर दलाल की मौत (साल 2011) के बाद शुरू हुआ, जो अपने पीछे ₹100 करोड़ से अधिक की चल-अचल संपत्ति छोड़ गए थे।
दो विरोधी वसीयत (Rival Wills): दलाल की मौत के बाद अचानक दो अलग-अलग वसीयतें सामने आईं। पहली वसीयत (नवंबर 2010) के तहत शेरनाज़ फारूख लॉयर और उनकी मां को लाभार्थी बताया गया। वहीं दूसरी वसीयत (सितंबर 2011) माणेक दारा सुखदवाला द्वारा पेश की गई, जिसमें दावा किया गया कि परवेज ने अपनी पूरी संपत्ति धर्मार्थ कार्यों (Charity) के लिए दान कर दी है और सुखदवाला को एकमात्र निष्पादक (Executor) बनाया है।
अदालती रिसीवर/प्रशासक की नियुक्ति: बंबई हाई कोर्ट ने विवाद को देखते हुए संपत्ति को अपने संरक्षण में ले लिया (Custodia Legis) और संपत्ति की सुरक्षा के लिए जोनाथन सोलोमन को कोर्ट-प्रशासक (Administrator Pendente Lite) नियुक्त कर दिया।
जांच में हुआ ‘चौंकाने वाला’ खुलासा: फर्जीवाड़ा और शेल कंपनियां
कोर्ट द्वारा नियुक्त प्रशासक ने जब परवेज दलाल के खातों की जांच की, तो बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
अवैध फंड ट्रांसफर: सुखदवाला ने परवेज दलाल की मौत के बाद गुपचुप तरीके से एक नया बैंक खाता खोला और वसीयत के विवाद के लंबित रहने के दौरान ही बड़ी रकम ‘मैसर्स अमोहा ट्रेडर्स प्राइवेट लिमिटेड’ नामक एक शेल इकाई और ‘बाई आवाबाई होरमुसजी टाटा ट्रस्ट’ को ट्रांसफर कर दी।
ट्रस्ट का संदिग्ध पुनरुद्धार: सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि यह संबंधित टाटा ट्रस्ट साल 1943 से पूरी तरह निष्क्रिय (Inactive) पड़ा था। लेकिन साल 2011 में, जैसे ही परवेज दलाल की मौत हुई और संदिग्ध दूसरी वसीयत सामने आई, इस ट्रस्ट को अचानक ‘सक्रिय’ कर दिया गया।
दस्तावेजों में हेरफेर: जांच में सामने आया कि सुखदवाला और जिमी पांडे नामक व्यक्ति ने मिलकर इस ट्रस्ट को नवल टाटा द्वारा 1954 में स्थापित दिखाने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए। जब कोर्ट ने खातों की जानकारी मांगी, तो इन्होंने सहयोग करने से इनकार कर दिया।
इसके बाद, बंबई हाई कोर्ट के सिंगल जज (2018) और फिर डिवीजन बेंच (16 जुलाई 2024) ने माना कि केवल दीवानी उपचार (Civil Remedies) इस संपत्ति को बचाने के लिए काफी नहीं हैं, और इसके पीछे एक गहरी आपराधिक साजिश है। हाई कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग करते हुए आपराधिक जांच (Criminal Investigation) के आदेश दिए थे।
सुप्रीम कोर्ट की तीखी विधिक टिप्पणियां
अपीलकर्ता ट्रस्ट ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि हाई कोर्ट ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 340 [अब BNSS की धारा 379 – कोर्ट में झूठे दस्तावेज देने की प्रक्रिया] के नियमों का पालन नहीं किया, इसलिए यह जांच अवैध है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को ‘भ्रामक’ करार देते हुए खारिज कर दिया:
‘चेरिटी’ की आड़ में संपत्ति हड़पना (Siphoning under the Garb of Charity)
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “एक तरफ वसीयत का इतना बड़ा विवाद अदालत में लंबित है और संपत्ति कोर्ट के संरक्षण में है, दूसरी तरफ 1943 से बंद पड़े ट्रस्ट को अचानक जिंदा करके ‘दान’ के नाम पर करोड़ों रुपये ट्रांसफर किए जा रहे हैं। यह स्पष्ट रूप से संपत्ति में अवैध हस्तक्षेप करने और उसे ठिकाने लगाने (Siphoning) का क्लासिक उदाहरण है।”
हाई कोर्ट मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकता
अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट ने केवल कोर्ट के भीतर की झूठी गवाही (Perjury) के लिए आदेश नहीं दिया था। मामला बैंकिंग धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेजों और शेल कंपनियों के जरिए ₹100 करोड़ की संपत्ति को गायब करने की एक बड़ी साजिश का था। ऐसे में हाई कोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों (Inherent Powers) का इस्तेमाल कर आपराधिक तंत्र को सक्रिय करने के लिए पूरी तरह न्यायसंगत था।
ईमानदारी है तो जांच से कैसा डर?
“यदि अपीलकर्ता ट्रस्ट ने वास्तव में इस पैसे का उपयोग नेक और वास्तविक धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए किया है, तो उसके पास जांच एजेंसी के सामने अपने बही-खाते और रिकॉर्ड पेश करने का पूरा अवसर होगा। सच का पता लगाने के लिए पुलिस जांच शुरू होने मात्र से किसी संस्था की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन नहीं होता।”
केस शीट: सुप्रीम कोर्ट परवेज दलाल वसीयत एवं आपराधिक जांच समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और मुख्य बिंदु |
| संबंधित अदालत | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले |
| मुख्य विवादित संपत्ति | दिवंगत परवेज बुरजोर दलाल की ₹100 करोड़+ की संपत्ति (मुंबई) |
| मुख्य अपीलकर्ता | बाई आवाबाई होरमुसजी टाटा ट्रस्ट और अन्य |
| संवैधानिक आधार | अनुच्छेद 215 (हाई कोर्ट की अंतर्निहित शक्तियां/Court of Record) |
| अदालत का अंतिम निर्णय | अपीलें पूरी तरह खारिज; हाई कोर्ट की कोर्ट-मॉनिटर्ड आपराधिक जांच जारी रहेगी। |
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने बंबई हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच के आदेश पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी है। शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया है कि जैसे ही ‘प्रॉथोनोटरी’ (Prothonotary) अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे, सक्षम जांच एजेंसी इस पूरे वित्तीय घोटाले और जालसाजी की जांच को तेजी से (Expeditiously) आगे बढ़ाएगी। इसके साथ ही जांच एजेंसी को अपनी प्रगति रिपोर्ट (Progress Reports) समय-समय पर सीधे हाई कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी।

