Illegal Termination: श्रम कानून (Labour Law) और नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संतुलित व्यवस्था दी है।
लेबर कोर्ट के आदेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट और लेबर कोर्ट के उस पुराने आदेश को पूरी तरह पलट दिया है, जिसमें एक कंपनी को अपने कर्मचारी को 50% पिछले वेतन (Back Wages) के साथ नौकरी पर बहाल करने का निर्देश दिया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा, “यदि कोई कर्मचारी (Workman) बिना किसी पूर्व सूचना या आधिकारिक मंजूरी के लंबे समय तक काम से अनुपस्थित (Absent) रहता है और अपनी अनुपस्थिति का कोई पुख्ता दस्तावेजी सबूत पेश नहीं कर पाता, तो ऐसी स्थिति में नौकरी का छूटना ‘अवैध रूप से सेवा समाप्ति’ (Illegal Termination) नहीं माना जाएगा। लंबे समय तक अनाधिकृत अनुपस्थिति (Unauthorised Absence) को सही साबित करने और उसका कारण बताने की पूरी जिम्मेदारी (Burden of Proof) कर्मचारी पर होती है, न कि नियोक्ता (Employer) पर।
मामला क्या है?: 2012 का अनुपस्थिति विवाद और लेबर कोर्ट का पुराना आदेश
यह कानूनी विवाद उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) की एक कंपनी और उसके कर्मचारी के बीच साल 2012 से चल रहा था।
कंपनी का दावा: मैसर्स रिफिलिस इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड (M/s Rifilis Engineering Pvt Ltd) के अनुसार, उनका कर्मचारी ‘अर्जुन गुप्ता’ 14 मई, 2012 से बिना किसी सूचना के अचानक काम से गायब हो गया। कंपनी ने उसे कभी नौकरी से नहीं निकाला, बल्कि उसने खुद अनाधिकृत रूप से काम छोड़ दिया।
कर्मचारी का दावा: अर्जुन गुप्ता का तर्क था कि उनकी माताजी गंभीर रूप से बीमार थीं, इसलिए उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारी को मौखिक रूप से (Verbally) सूचित किया था और छुट्टी पर गए थे। जब वे 8 जून, 2012 को वापस काम पर लौटे, तो प्रबंधन ने उन्हें ड्यूटी पर लेने से मना कर दिया और अवैध रूप से सेवा से बाहर कर दिया।
निचली अदालतों का रुख: लेबर कोर्ट ने कर्मचारी की दलील को स्वीकार करते हुए उसे नौकरी पर बहाल करने और 50% बैक वेजेस देने का आदेश दिया। 13 मार्च, 2024 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी इस आदेश को बरकरार रखा, जिसके खिलाफ कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।
सुप्रीम कोर्ट की विधिक टिप्पणियां: केवल मौखिक दावों से श्रम कानून नहीं चलते
सुप्रीम कोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड की गहन जांच करने के बाद हाई कोर्ट और लेबर कोर्ट दोनों के फैसलों को त्रुटिपूर्ण (Erred) पाया और उन्हें खारिज करने के लिए निम्नलिखित विधिक सिद्धांत सामने रखे।
स्थायी पते पर नोटिस भेजना नियोक्ता की गलती नहीं
कर्मचारी ने दलील दी थी कि कंपनी द्वारा भेजा गया रजिस्टर्ड नोटिस उसे कभी नहीं मिला, क्योंकि वह उसके गृह राज्य बिहार के स्थायी पते पर भेजा गया था, जबकि वह गौतम बुद्ध नगर में रह रहा था।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “नियोक्ता को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। नोटिस रिकॉर्ड में उपलब्ध एकमात्र पते पर भेजा गया था, जो खुद कर्मचारी ने नियुक्ति के समय दिया था। यदि कर्मचारी ने अपना निवास स्थान बदल लिया था, तो यह उसकी जिम्मेदारी थी कि वह कंपनी को सूचित करे। वह इस संबंध में अपनी खुद की लापरवाही का फायदा उठाने का हकदार नहीं है।”
बीमारी का कोई दस्तावेजी सबूत (Documentary Evidence) नहीं
अदालत ने नोट किया कि पूरी अनुपस्थिति के दौरान कर्मचारी ने कंपनी को एक भी लिखित पत्र या आवेदन नहीं भेजा। यदि उसकी मां की बीमारी का कारण वास्तविक था, तो वह एक पत्र या लिखित सूचना भेज सकता था। ऐसा करने में विफल रहने के बाद, वह अपनी अनाधिकृत अनुपस्थिति को सही ठहराने के लिए केवल मौखिक दावों पर निर्भर नहीं रह सकता। माताजी की बीमारी का दावा पूरी तरह से निराधार और बिना सबूतों के है।
दोबारा काम पर लौटने के प्रयास का कोई प्रमाण नहीं
कर्मचारी का यह दावा कि उसे 8 जून 2012 को फैक्ट्री के गेट पर रोक दिया गया और ड्यूटी जॉइन नहीं करने दी गई, इसके समर्थन में भी कोई लिखित शिकायत, ईमेल या पुलिस/लेबर विभाग को दी गई सूचना का रिकॉर्ड नहीं था। यहाँ तक कि लेबर कोर्ट का फैसला आने के बाद भी कंपनी के कई पत्रों के बावजूद उसने नौकरी जॉइन नहीं की।
केस शीट: सुप्रीम कोर्ट अनाधिकृत अनुपस्थिति एवं श्रम विवाद समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय |
| संबंधित अदालत | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता |
| अपीलकर्ता कंपनी | मैसर्स रिफिलिस इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड |
| प्रतिवादी कर्मचारी | अर्जुन गुप्ता |
| विवाद का मूल बिंदु | बिना बताए काम से गायब रहने पर नौकरी छूटना (क्या यह अवैध छंटनी है?) |
| अदालत का अंतिम निर्णय | हाई कोर्ट और लेबर कोर्ट का आदेश रद्द; कर्मचारी की बहाली और 50% बैक वेजेस का दावा पूरी तरह खारिज। |
इस फैसले के औद्योगिक जगत पर दूरगामी प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि श्रम कानून (Labour Laws) श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए जरूर बने हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कर्मचारी बिना किसी अनुशासन और लिखित रिकॉर्ड के जब चाहें काम से गायब हो जाएं और बाद में ‘अवैध छंटनी’ का कार्ड खेलकर मुआवाजा मांगें।
कोर्ट का प्राथमिक रुख: औद्योगिक अनुशासन बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि हर अनुपस्थिति का एक लिखित और प्रामाणिक रिकॉर्ड हो। सिर्फ ‘मौखिक तौर पर साहब को बोलकर गया था’ कह देने से हफ्तों या महीनों की अनुपस्थिति को वैध नहीं ठहराया जा सकता।

