Friday, October 16, 2026
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Instagram Reels: वकीलों की रील्स और डिजिटल प्रचार पर रोक लगे…सोशल मीडिया पर आत्म-प्रचार और विज्ञापनों के खिलाफ सुप्रीम सख्ती

Instagram Reels: सोशल मीडिया के इस दौर में वकीलों द्वारा इंस्टाग्राम रील्स (Instagram Reels), यूट्यूब शॉर्ट्स और मोनेटाइज्ड कानूनी कंटेंट के जरिए धड़ल्ले से किए जा रहे डिजिटल प्रचार पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और कड़ा कदम उठाया है।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने देश के वकीलों द्वारा किए जा रहे डिजिटल सोलिसिटेशन (मुकदमे मांगना) और वकालत के बढ़ते व्यवसायीकरण के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए देश की सभी स्टेट बार काउंसिलों (State Bar Councils) को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

कानून का पेशा एक नोबल प्रोफेशन: अदालत

शीर्ष अदालत ने कहा, कानून का पेशा एक नोबल प्रोफेशन (कुलीन पेशा) है, न कि कोई व्यावसायिक धंधा। ‘लीगल अवेयरनेस’ (कानूनी जागरूकता), ‘एजुकेशनल वीडियो’ या ‘अपने अधिकारों को जानें’ जैसे अभियानों की आड़ में वकीलों द्वारा इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब वीडियो और फेसबुक पर खुद का प्रचार करना सीधे तौर पर ‘डिजिटल दलाली’ (Digital Touting) और वकीलों की आचार संहिता का खुला उल्लंघन है। सोशल मीडिया पर वकीलों का मुख्य उद्देश्य यदि मुकदमों को आकर्षित करना और अपनी व्यावसायिक विजिबिलिटी बढ़ाना है, तो इसे प्रोफेशनल मिसकंडक्ट (व्यावसायिक दुराचार) माना जाना चाहिए।

मामला क्या है?: ‘लीगल अवेयरनेस’ की आड़ में रील्स और पब्लिसिटी का खेल

यह याचिका अनिल पांडेय (Anil Pandey) नामक नागरिक द्वारा दायर की गई है, जिसमें सोशल मीडिया पर कुछ वकीलों द्वारा कोर्ट रूम और अदालती परिसरों का दुरुपयोग कर आत्म-प्रचार करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई गई है।

कोर्ट परिसर में वीडियो शूटिंग: याचिका में आरोप लगाया गया है कि आजकल वकीलों का एक बड़ा वर्ग कोर्ट की ड्रेस (काले कोट और बैंड) में ही अदालत के गलियारों, प्रतीक्षालयों और न्यायिक परिसरों के भीतर खड़े होकर नाटकीय अंदाज में रील्स और वीडियो रिकॉर्ड कर रहा है।

अधिनियम का खुला उल्लंघन: याचिकाकर्ता के अनुसार, यह कृत्य अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों की धारा 36 का सीधा उल्लंघन है, जो भारतीय वकीलों को किसी भी प्रकार का विज्ञापन करने या मुकदमों की मांग (Solicitation) करने पर पूरी तरह प्रतिबंधित करता है।

मुख्य कानूनी बिंदु: क्या हैं याचिकाकर्ता की दलीलें और मांगें?

याचिका में वकीलों द्वारा सोशल मीडिया पर अपनाए जा रहे तरीकों और उनके पीछे छिपे व्यावसायिक उद्देश्यों को विस्तार से उजागर किया गया है।

‘रूल्स ऑफ बार काउंसिल ऑफ इंडिया’ (Rule 36)

बीसीआई का नियम 36 स्पष्ट रूप से कहता है कि कोई भी वकील प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से विज्ञापन नहीं कर सकता और न ही परिपत्रों, विज्ञापनों या व्यक्तिगत संबंधों के जरिए काम मांग सकता है। याचिका में कहा गया है कि सोशल मीडिया पर वकीलों द्वारा अपने कॉन्टैक्ट नंबर देना, बेल (जमानत) और क्रिमिनल मामलों की नाटकीय प्रस्तुतियां देना और क्लाइंट्स के प्रशंसापत्र (Testimonials) दिखाना इसी ‘इनडायरेक्ट सोलिसिटेशन’ का हिस्सा है।

‘द डोमिनेंट पर्पज टेस्ट’ (प्रधान उद्देश्य का सिद्धांत)

वकील अक्सर यह तर्क देते हैं कि वे समाज में कानूनी जागरूकता फैलाने के लिए वीडियो बनाते हैं। इस पर याचिका में बेहद मजबूत दलील दी गई है। विज्ञापन पर लगी रोक को सिर्फ ‘कानूनी जागरूकता’ या ‘शिक्षा’ का मुखौटा पहनकर दरकिनार नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह देखना होगा कि उस संचार का मुख्य उद्देश्य क्या है। यदि प्राथमिक उद्देश्य खुद की ब्रांडिंग करना, मुकदमों को खींचना और व्यावसायिक लाभ कमाना है, तो शब्दावली चाहे जो भी इस्तेमाल की गई हो, वह व्यावसायिक दुराचार की श्रेणी में ही आएगा।

सुप्रीम कोर्ट से क्या राहत मांगी गई है?

याचिकाकर्ता अनिल पांडेय ने देश की सर्वोच्च अदालत से वकालत के पेशे की गरिमा बनाए रखने के लिए तीन प्रमुख निर्देश जारी करने की मांग की है।

अनुशासनात्मक कार्रवाई: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर डायरेक्ट या इनडायरेक्ट विज्ञापन करने वाले, रील्स बनाने वाले और पेड कोलैबोरेशन (Paid Collaborations) करने वाले वकीलों के खिलाफ तुरंत अनुशासनात्मक कार्यवाही (Disciplinary Proceedings) शुरू की जाए।

अदालतों में वीडियोग्राफी पर बैन: वकीलों द्वारा कोर्ट रूम, ट्रिब्यूनल और कोर्ट परिसर के भीतर किसी भी प्रकार की फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी या डिजिटल कंटेंट बनाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए।

BCI को नई गाइडलाइंस के निर्देश: डिजिटल युग की चुनौतियों को देखते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को सोशल मीडिया पर वकीलों के आचरण को विनियमित (Regulate) करने के लिए एक सख्त और व्यापक गाइडलाइन तैयार करने का निर्देश दिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए सभी राज्यों की बार काउंसिलों से पूछा है कि वे अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में ऐसे वकीलों पर लगाम कसने के लिए क्या कदम उठा रही हैं।

केस शीट: सुप्रीम कोर्ट वकील डिजिटल विज्ञापन विवाद समीक्षा (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान स्थिति
संबंधित अदालतउच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
माननीय न्यायाधीशCJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना
याचिकाकर्ताअनिल पांडेय (जनहित याचिका – PIL)
उल्लंघन की धाराबार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) नियमों का नियम 36
मुख्य चिंताकोर्ट परिसर में रील्स बनाना, क्लाइंट्स के प्रशंसापत्र दिखाना, वकालत का व्यवसायीकरण।
अदालत का वर्तमान कदमसभी स्टेट बार काउंसिलों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया गया है।

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