सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां
- “कॉज लिस्ट किसके आदेश पर जारी होती है?”:सुनवाई के दौरान जब वकील एल. के. चार्ल्स अलेक्जेंडर ने बताया कि उन्होंने हाईकोर्ट रजिस्ट्री के खिलाफ रिट याचिका दायर की थी, तो न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने सवाल किया:“रजिस्ट्री किसके आदेश के तहत काम करती है? हमें बताइए। क्या आपने कभी देखा है कि कॉज लिस्ट (Cause List) के अंत में क्या लिखा होता है? ‘मुख्य न्यायाधीश के आदेश के तहत प्रकाशित’ (Published under the orders of the Chief Justice)। आप मुख्य न्यायाधीश को निर्देश देने की मांग कर रहे हैं! खारिज की जाती है।”
- वकील होने पर हैरानी:जस्टिस नाथ ने पूछा कि क्या वे एक पेशेवर वकील हैं? वकील द्वारा ‘हाँ’ में उत्तर देने के बाद, पीठ ने मामले में कोई राहत दिए बिना याचिका को सीधे खारिज कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि (मद्रास हाईकोर्ट का रुख)
- याचिकाकर्ता का दावा: एडवोकेट अलेक्जेंडर ने मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि बार-बार अनुरोध के बावजूद उनकी ओर से दायर 21 मामलों को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं किया जा रहा था।
- हाईकोर्ट की खंडपीठ का फैसला (3 जुलाई): तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा था कि मुकदमों की सूची तय करने की स्थापित प्रक्रियाओं को बाईपास करने के लिए रिट याचिका का सहारा नहीं लिया जा सकता।
- लिस्टिंग का कोई मौलिक अधिकार नहीं: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि वकीलों या वादियों के पास पहले से दायर मामलों से पहले अपने मामलों को सूचीबद्ध कराने का कोई मौलिक या निहित अधिकार (Vested/Fundamental Right) नहीं है।
नई दिल्ली: उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री द्वारा मुकदमों को सूचीबद्ध (Listing of Cases) करने की प्रशासनिक व्यवस्था, रोस्टर प्रणाली (Roster System), ‘मास्टर ऑफ द रोस्टर’ (Master of the Roster) के रूप में मुख्य न्यायाधीश के सर्वाधिकार, तथा सूचीबद्ध कराने की स्थापित प्रक्रिया को दरकिनार कर अनुच्छेद 226 के तहत परमादेश (Writ of Mandamus) जारी कराने की वकीलों की प्रवृत्ति पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
मामलों की लिस्टिंग का प्रबंधन पूर्णतः मुख्य न्यायाधीश के प्रशासनिक नियंत्रण में होता है
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति अपारेश कुमार सिंह की तीन-सदस्यीय पीठ ने 9 अक्टूबर 2026 को मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ के निर्णय में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने वकील से तीखे सवाल करते हुए स्पष्ट किया कि मामलों की लिस्टिंग का प्रबंधन पूर्णतः मुख्य न्यायाधीश के प्रशासनिक नियंत्रण में होता है और कोई भी वकील रिट याचिका के माध्यम से मुख्य न्यायाधीश या रजिस्ट्री को निर्देश जारी नहीं करा सकता। शीर्ष अदालत ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें एक वकील द्वारा अपने मुवक्किलों के 21 लंबित मामलों को तुरंत सूचीबद्ध कराने के लिए हाईकोर्ट रजिस्ट्री को निर्देश देने की मांग ठुकरा दी गई थी।
अदालत कक्ष में तीखी मौखिक टिप्पणी: ‘कॉज लिस्ट किसके आदेश से छपती है?’
सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता अधिवक्ता एल.के. चार्ल्स अलेक्जेंडर ने अपनी याचिका के समर्थन में दलीलें पेश करने का प्रयास किया, तो न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने प्रशासनिक पदानुक्रम की याद दिलाते हुए दो-टूक टिप्पणी की: “रजिस्ट्री किसके आदेश पर काम करती है? हमें बताइए। क्या आपने कभी देखा है कि कॉज लिस्ट (वाद-सूची) के अंत में क्या लिखा होता है? — ‘मुख्य न्यायाधीश के आदेशानुसार प्रकाशित’ (Published under the orders of the Chief Justice)। आप मुख्य न्यायाधीश को ही निर्देश दिलवाना चाहते हैं? याचिका खारिज की जाती है।”
जब अधिवक्ता अलेक्जेंडर ने कहा कि उन्होंने हाईकोर्ट के समक्ष केवल रजिस्ट्री को निर्देश देने हेतु परमादेश (Mandamus) की मांग की थी, तो पीठ ने आश्चर्य जताते हुए पूछा:
- “आपने उच्च न्यायालय के समक्ष यह परमादेश मांगा कि अन्य अदालतें आपके मामलों को उठाएं?”
- अधिवक्ता द्वारा स्पष्टीकरण दिए जाने पर कि यह प्रार्थना केवल रजिस्ट्री के विरुद्ध थी, पीठ ने पूछा कि क्या वे स्वयं एक पेशेवर वकील हैं। अधिवक्ता द्वारा ‘हाँ’ में उत्तर देने पर पीठ ने उनकी याचिका को तत्काल खारिज कर दिया।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: 21 मामलों की लिस्टिंग की मांग
- अधिवक्ता की मूल शिकायत:
- अधिवक्ता एल.के. चार्ल्स अलेक्जेंडर ने मद्रास उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226 के तहत एक रिट याचिका दायर की थी।
- उनका आरोप था कि उनके द्वारा विभिन्न मुवक्किलों की ओर से दायर 21 मामले लंबे समय से लंबित हैं और रजिस्ट्री से बार-बार अनुरोध करने के बावजूद उन्हें सुनवाई के लिए कॉज लिस्ट में शामिल नहीं किया जा रहा है।
- मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ का 3 जुलाई 2026 का फैसला:
- तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने 3 जुलाई को उनकी याचिका खारिज कर दी थी।
- हाईकोर्ट ने स्पष्ट सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि:
- पहले दायर मामलों को बाईपास करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं: वकीलों या वादकारियों को पहले से दायर अन्य नागरिकों के मुकदमों को दरकिनार कर अपने मामलों को प्राथमिकता के आधार पर सूचीबद्ध कराने का कोई निहित (Vested) या मौलिक अधिकार (Fundamental Right) नहीं है।
- स्थापित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य: यदि किसी मामले में अत्यधिक तात्कालिकता (Urgency) है, तो उसके लिए तय प्रक्रिया—यानी संबंधित रोस्टर पीठ के समक्ष ‘मेंशन मेमो’ (Mention Memo) पेश करना अथवा रजिस्ट्री की विसंगतियों के संबंध में रजिस्ट्रार (न्यायिक) के समक्ष औपचारिक प्रतिवेदन देना—का पालन करना होगा।
- रिट याचिका का दुरुपयोग नहीं: लिस्टिंग की नियमित प्रक्रिया से बचने या दबाव बनाने के लिए परमादेश रिट याचिका का सहारा नहीं लिया जा सकता।
- सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी, जिसे शीर्ष अदालत ने भी खारिज कर दिया।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- मुख्य न्यायाधीश ‘मास्टर ऑफ द रोस्टर’ (Master of the Roster):
- सर्वोच्च न्यायालय ने स्टेट ऑफ राजस्थान बनाम प्रकाश चंद (1998), अशोक पांडे (2018), और शांति भूषण बनाम सुप्रीम कोर्ट (2018) में सुस्थापित किया है कि अदालतों की पीठों का गठन, रोस्टर का निर्धारण, और मुकदमों को सूचीबद्ध करने का अनन्य प्रशासनिक नियंत्रण केवल और केवल मुख्य न्यायाधीश (CJI / CJ of High Court) के पास होता है।
- रजिस्ट्री केवल मुख्य न्यायाधीश के आदेशों और बनाए गए नियमों के तहत कार्य करती है।
- परमादेश (Writ of Mandamus) की विधिक सीमाएं:
- परमादेश केवल तब जारी किया जा सकता है जब याचिकाकर्ता के पास कोई स्पष्ट कानूनी अधिकार (Legal Right) हो और प्रतिवादी पर कोई वैधानिक लोक कर्तव्य (Statutory Duty) बाध्यकारी हो।
- अदालती मुकदमों की लिस्टिंग एक आंतरिक प्रशासनिक व न्यायिक प्रक्रिया है। किसी विशिष्ट मामले को प्राथमिकता पर सूचीबद्ध कराना किसी वकील का सांविधिक अधिकार नहीं है।
- न्यायिक अनुशासन एवं समानता:
- यदि प्रत्येक वकील अपने मुकदमों की शीघ्र लिस्टिंग के लिए रिट याचिकाएं दायर करने लगे, तो अदालती व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी और अन्य सामान्य वादकारियों के साथ घोर अन्याय होगा।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: एल.के. चार्ल्स अलेक्जेंडर बनाम रजिस्ट्रार जनरल, मद्रास उच्च न्यायालय [विशेष अनुमति याचिका (सिविल) – सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति अपारेश कुमार सिंह (3-जज खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: 9 अक्टूबर 2026
- संबद्ध मूल आदेश: 3 जुलाई 2026 (मद्रास उच्च न्यायालय – मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी एवं न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ)
- याचिकाकर्ता: अधिवक्ता एल.के. चार्ल्स अलेक्जेंडर (स्वयं)
- प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार) एवं अनुच्छेद 136 (विशेष अनुमति याचिका)
- मद्रास उच्च न्यायालय अपीलीय पक्ष नियम (Madras High Court Appellate Side Rules) — रोस्टर एवं मेंशनिंग प्रक्रिया
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- स्टेट ऑफ राजस्थान बनाम प्रकाश चंद (1998, सुप्रीम कोर्ट) — ‘मुख्य न्यायाधीश ही रोस्टर के पूर्ण स्वामी (Master of the Roster) हैं; उनके प्रशासनिक नियंत्रण में न्यायिक दखल नहीं दिया जा सकता।’
- अंतिम परिणाम: विशेष अनुमति याचिका खारिज; मद्रास हाईकोर्ट का आदेश बरकरार; मुकदमों की लिस्टिंग हेतु न्यायिक मेंशनिंग और रजिस्ट्रार (न्यायिक) के समक्ष निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने का सिद्धांत पुनः स्थापित।
Case Listing: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह |
| याचिकाकर्ता | एडवोकेट एल. के. चार्ल्स अलेक्जेंडर |
| मूल विवाद | मद्रास हाईकोर्ट रजिस्ट्री द्वारा 21 मामलों को लिस्ट न करने का आरोप और परमादेश रिट (Writ of Mandamus) की मांग |
| सुप्रीम कोर्ट का फैसला | याचिका पूरी तरह खारिज; कॉज लिस्ट मुख्य न्यायाधीश के आदेश से जारी होती है। |

