Change in Circumstances: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों और भरण-पोषण (Maintenance / गुजारा भत्ता) के नियमों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
भरण-पोषण का मुकदमा लंबित
हाईकोर्ट के जस्टिस अचल सचदेव की एकल पीठ ने पत्नी द्वारा दायर की गई पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि भरण-पोषण का मुकदमा लंबित रहने के दौरान पत्नी को सरकारी नौकरी (Government Job) मिल जाती है, तो इसे ‘परिस्थितियों में बड़ा बदलाव’ (Change in Circumstances) माना जाएगा। ऐसी स्थिति में पति द्वारा दिए जाने वाले गुजारे भत्ते को केवल उसी अवधि तक सीमित किया जा सकता है, जब तक पत्नी बेरोजगार थी।
मामले की पृष्ठभूमि (Factual Background)
शादी और विवाद: याचिकाकर्ता (पत्नी) की शादी साल 2017 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी। शादी के कुछ समय बाद ही उसने अपने ससुराल वालों पर दहेज उत्पीड़न, मारपीट और जान से मारने की धमकी देने के आरोप लगाते हुए धारा 498-A और दहेज निषेध अधिनियम के तहत एफआईआर (FIR) दर्ज कराई।
गुजारा भत्ते की मांग: पत्नी ने खुद को उच्च शिक्षित लेकिन बेरोजगार बताते हुए आय का कोई स्रोत न होने की दलील दी और सीआरपीसी की धारा 125 (CrPC Section 125) के तहत गुजारा भत्ते के लिए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की।
फैमिली कोर्ट का आदेश: फैमिली कोर्ट ने पाया कि याचिका दायर करने की तिथि (14 जुलाई 2019) को पत्नी के पास आय का कोई साधन नहीं था। लेकिन मुकदमा चलने के दौरान उसका चयन एक सरकारी नौकरी में हो गया और उसने 9 फरवरी 2024 को कार्यभार संभाल लिया।
यह रहा था आदेश: इस तथ्य को देखते हुए फैमिली कोर्ट ने आदेश दिया कि पति अपनी पत्नी को 10,000 रुपये प्रति माह का गुजारा भत्ता देगा, लेकिन यह केवल आवेदन की तारीख (14 जुलाई 2019) से लेकर नौकरी जॉइन करने के ठीक एक दिन पहले यानी 8 फरवरी 2024 तक की अवधि के लिए ही देय होगा। पत्नी ने इसी समय-सीमा को हटाने के लिए हाई कोर्ट में रिवीजन दाखिल किया था।
हाई कोर्ट की मुख्य कानूनी टिप्पणियां
भरण-पोषण का मूल सिद्धांत: जस्टिस अचल सचदेव ने कानून के मूल उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा, सीआरपीसी की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता – BNSS की धारा 144) और हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम की धारा 18 का अंतर्निहित सिद्धांत यह है कि गुजारा भत्ता पाने के लिए दावेदार का स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ होना अनिवार्य है।
सरकारी नौकरी ‘परिस्थितियों में बदलाव’ का पर्याप्त आधार: अदालत ने कहा कि जैसे ही किसी पत्नी को सरकारी नौकरी मिल जाती है, वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो जाती है। कानून उसे आत्मनिर्भर होने के बाद भी पति से गुजारा भत्ता वसूलने का असीमित अधिकार नहीं देता। कहा, यदि पत्नी को सरकारी नौकरी मिल जाती है, तो यह परिस्थितियों में एक ठोस बदलाव है। यह तथ्य पत्नी को सरकारी नौकरी मिलने से पहले की अवधि तक ही भरण-पोषण की राशि को सीमित करने का एक पर्याप्त और न्यायसंगत आधार बनता है।
अदालत का अंतिम निर्णय (Conclusion)
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट (फैमिली कोर्ट) द्वारा 14 मार्च 2024 को पारित किया गया आदेश पूरी तरह से सकारण, तार्किक और कानूनी रूप से सही था। उसमें किसी भी तरह के न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने पत्नी की पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया, जिससे अब उसे नौकरी जॉइन करने के बाद की अवधि का गुजारा भत्ता नहीं मिलेगा।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी बिंदु | विवरण और अदालती रुख |
| हाई कोर्ट बेंच | जस्टिस अचल सचदेव (Single Bench) |
| मूल कानून | धारा 125 CrPC (अब धारा 144 BNSS) |
| तय की गई समय-सीमा | गुजारा भत्ता केवल 14.07.2019 से 08.02.2024 (नौकरी मिलने से पहले) तक देय। |
| अदालत का निष्कर्ष | आत्मनिर्भर होने के बाद पत्नी पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं रह जाती। |
निष्कर्ष (Takeaway)
यह फैसला अदालतों को वैवाहिक विवादों में व्यावहारिक और संतुलित रुख अपनाने का निर्देश देता है। यह साफ करता है कि गुजारा भत्ते का कानून महिलाओं को सुरक्षा देने और उन्हें लाचारी से बचाने के लिए है, न कि आर्थिक रूप से सक्षम और सरकारी वेतन पाने के बाद भी पति पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालने या अनुचित लाभ उठाने के लिए।

