हाईकोर्ट का रुख और मुख्य बातें
- पीड़ितों की पहचान और सुरक्षा पर खतरा: अदालत ने अवलोकन किया कि मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वीडियो या विजुअल जारी करने से पीड़ितों की पहचान उजागर हो सकती है। इससे अन्य पीड़ित डर के कारण पुलिस के सामने अपने बयान दर्ज कराने से कतरा सकते हैं।
- 26/11 मुंबई आतंकी हमले के कवरेज का उल्लेख: अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए कोर्ट ने मुंबई 26/11 हमलों के लाइव मीडिया कवरेज का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि उस समय लगातार मीडिया कवरेज की वजह से आतंकवादियों के हैंडलरों को सुरक्षा बलों की रणनीतियों का पता चल गया था, जिससे ऑपरेशन बाधित हुआ था। इसी तरह जांच के संवेदनशील चरण में अत्यधिक कवरेज जांच को नुकसान पहुंचा सकता है।
- मीडिया बहस बनाम मीडिया ट्रायल: अदालत ने स्पष्ट किया कि मीडिया और नागरिक बाल यौन शोषण (Child Abuse) के सामाजिक मुद्दों पर सामान्य चर्चा कर सकते हैं, लेकिन इस चालू जांच के तथ्यात्मक विवरणों और वीडियो सामग्री का प्रसारण करके “मीडिया ट्रायल” करने का अधिकार प्रेस के पास नहीं है।
- साप्ताहिक प्रेस रिलीज (Weekly Press Release) का निर्देश: जनता तक प्रामाणिक जानकारी पहुंचती रहे, इसके लिए हाईकोर्ट ने तमिलनाडु पुलिस द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) को सप्ताह में एक बार आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति जारी करने का निर्देश दिया है।
चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट ने ‘जेम ग्रेनाइट्स’ (GEM Granites) के संस्थापक आर. वीरमणि के खिलाफ चल रही पॉक्सो (POCSO) मामले की आपराधिक जांच से संबंधित किसी भी प्रकार के वीडियो, फुटेज या संवेदनशील सामग्री के मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्मों और सोशल मीडिया मध्यवर्तियों (Intermediaries) पर प्रसारण और साझा किए जाने पर अंतरिम रोक लगा दी है।
न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन की एकल पीठ ने बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली गैर-सरकारी संस्था ‘तुलिर चैरिटेबल ट्रस्ट’ (Tulir Charitable Trust) द्वारा दायर याचिका पर शुक्रवार (25 सितंबर 2026) को यह अंतरिम आदेश पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि बाल शोषण जैसे व्यापक सामाजिक विषयों पर सामान्य परिचर्चा पर कोई प्रतिबंध नहीं है, परंतु चल रही जांच के तथ्यात्मक पहलुओं (Factual Matrix) और केस से जुड़े वीडियो प्रसारित करने की अनुमति कतई नहीं दी जा सकती।अदालत ने रेखांकित किया कि जांच के इस संवेदनशील चरण में वीडियो प्रसारित होने से बाल पीड़ितों की पहचान उजागर होने का गंभीर खतरा है, जिससे अन्य पीड़ित बच्चे सामाजिक डर के कारण अपने बयान दर्ज कराने आगे नहीं आएंगे।
उच्च न्यायालय के प्रमुख अवलोकन एवं विधिक निर्देश
1. ‘पीड़ितों के आगे आने पर प्रतिकूल प्रभाव और जांच की गोपनीयता’ न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन ने आदेश में दर्ज किया: “इस महत्वपूर्ण मोड़ पर, यदि समाचार चैनलों पर डिबेट आयोजित की जाती हैं या तस्वीरें व वीडियो अपलोड किए जाते हैं, तो इस बात की पूरी आशंका है कि अन्य पीड़ित अपने जीवन पर पड़ने वाले परिणामों से डरकर पुलिस के सामने बयान दर्ज कराने आगे नहीं आएंगे। पुलिस अभी भी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि क्या अब तक चिन्हित पीड़ितों के अलावा और भी बच्चे इसके शिकार हुए हैं।”
अदालत ने सभी मीडिया संस्थानों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और डिजिटल मध्यवर्तियों को मामले से संबंधित किसी भी वीडियो को प्रकाशित करने, प्रसारित करने, अपलोड करने, साझा करने या पुनर्प्रसारित करने से पूरी तरह रोक दिया।
2. ‘रिपोर्टिंग के अधिकार में मीडिया ट्रायल का अधिकार शामिल नहीं’
- अदालत ने प्रेस की स्वतंत्रता और निष्पक्ष न्याय के बीच संतुलन पर टिप्पणी करते हुए कहा:“अधिकार के साथ एक समतुल्य कर्तव्य (Corresponding Duty) भी जुड़ा होता है। यह कर्तव्य न केवल मामले से जुड़े बच्चों के प्रति है, बल्कि मामले में शामिल आरोपी के प्रति भी है। हालांकि प्रेस को रिपोर्टिंग का अधिकार है, लेकिन अदालत को यह भी देखना होगा कि क्या यह अधिकार ‘मीडिया ट्रायल’ के अधिकार में तब्दील हो सकता है।”
3. 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के मीडिया कवरेज का हवाला
- उच्च न्यायालय ने जांच के दौरान अत्यधिक मीडिया कवरेज के खतरों की तुलना मुंबई आतंकी हमलों से करते हुए कहा:“यह अदालत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विशेष रूप से जानकारी प्रसारित करने की प्रेस की स्वतंत्रता का सम्मान करती है, लेकिन अदालत को बंबई आतंकी हमले की भयावह घटनाओं की भी याद है। लगातार प्रेस एक्सपोजर और लाइव कवरेज के कारण ही कानून प्रवर्तन एजेंसियों की सभी रणनीतियां आतंकवादियों के हैंडलर्स तक पहुंच रही थीं, जिससे वे सुरक्षा बलों की कार्रवाई को विफल करने के लिए जवाबी कदम उठा रहे थे।”
4. जनता को सूचना हेतु SIT को साप्ताहिक प्रेस रिलीज का निर्देश
- जनता को मामले की निष्पक्ष और आधिकारिक जानकारी मिलती रहे, इसके लिए अदालत ने पुलिस महानिदेशक (DGP) द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) को निर्देश दिया कि वह सप्ताह में एक बार (Once every week) एक आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति (Press Release) जारी करे, ताकि अफवाहों और अनधिकृत अटकलों पर विराम लग सके।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
- अक्टूबर 2025 में शिकायत: बाल अधिकार कार्यकर्ता ने पुलिस को एक पेन ड्राइव सौंपी थी जिसमें कथित तौर पर बाल यौन शोषण सामग्री (CSEAM) मौजूद थी और एक नोट के जरिए 80 वर्षीय उद्योगपति व GEM ग्रेनाइट्स के संस्थापक आर. वीरमणि का नाम सामने आया था।
- क्लोजर रिपोर्ट की नामंजूरी (फरवरी 2026): पुलिस ने साक्ष्यों की कमी बताते हुए फरवरी 2026 में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी, परंतु विशेष पॉक्सो अदालत ने उसे स्वीकार करने से इनकार करते हुए आगे की जांच (Further Investigation) का आदेश दिया था।
- अगस्त 2026 में गिरफ्तारियां: नए सिरे से शुरू हुई जांच में और अधिक बाल पीड़ितों की पहचान हुई, जिसके बाद पुलिस ने अगस्त 2026 में मुख्य आरोपी सहित संबंधित व्यक्तियों को गिरफ्तार किया था।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: तुलिर चैरिटेबल ट्रस्ट बनाम पुलिस आयुक्त, चेन्नई व अन्य [W.P. – मद्रास उच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (तुलिर ट्रस्ट) की ओर से: अधिवक्ता दीपिका मुरली
- राज्य सरकार की ओर से: लोक अभियोजक आर. जॉन सत्यन एवं विशेष सरकारी वकील अरुण अंबुमणि
- केंद्र सरकार की ओर से: वरिष्ठ केंद्र सरकार स्थायी वकील कुमारगुरु
- प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की धारा 23 (मीडिया द्वारा बच्चे की पहचान उजागर करने पर पूर्ण प्रतिबंध व दंड)
- किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 74 (बाल पीड़ितों की गोपनीयता का संरक्षण)
- सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 19(1)(a) (प्रेस की स्वतंत्रता) बनाम अनुच्छेद 21 (पीड़ितों की निजता और निष्पक्ष विचारण का अधिकार)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- निपुण सक्सेना बनाम भारत संघ (2019, सुप्रीम कोर्ट) — ‘पॉक्सो और दुष्कर्म के मामलों में किसी भी परिस्थिति में, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, पीड़ित बालक की पहचान या पहचान योग्य विवरण का मीडिया/डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खुलासा पूर्णतः प्रतिबंधित और गैर-जमानती अपराध है।’
- सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम सेबी (2012, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘न्याय प्रशासन और निष्पक्ष ट्रायल की सुरक्षा के लिए उच्च न्यायालयों को मीडिया रिपोर्टिंग को स्थगित (Postponement of Reporting) करने का अंतर्निहित अधिकार प्राप्त है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन (मद्रास उच्च न्यायालय)
- आदेश: वीडियो और फुटेज के प्रसारण पर पूर्ण अंतरिम रोक; एसआईटी को साप्ताहिक आधिकारिक बुलेटिन जारी करने का निर्देश।
Child Abuse:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मणन (Justice V Lakshminarayanan) |
| याचिकाकर्ता | तुलिर चैरिटेबल ट्रस्ट (प्रतिनिधित्व: एडवोकेट दीपिका मुरली) |
| मुख्य आरोपी | आर. वीरमणि (संस्थापक, GEM Granites) एवं उनके सहयोगी |
| कोर्ट का आदेश | जांच से जुड़े वीडियो/सामग्री के प्रसारण पर रोक; SIT द्वारा साप्ताहिक प्रेस विज्ञप्ति जारी करने के निर्देश |

