Friday, September 18, 2026
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Speaking Order: न्यायाधीश का काम न्याय करना है, लेकिन अगर खुद जज के साथ ही अन्याय हो जाए तो वह कहां जाए? ट्रायल जज रवि कुमार दिवाकर के तीखे सवाल

अदालत के फैसले में जज दिवाकर की मुख्य टिप्पणियां

गुरुवार को सुनाए गए अपने एक फैसले में जज दिवाकर ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश के 18 अगस्त के स्थानांतरण आदेश को कानून के विपरीत और बिना क्षेत्राधिकार (Without Jurisdiction) वाला करार दिया।

  • जज के अधिकारों और अन्याय पर सवाल:“एक न्यायाधीश का कार्य न्याय करना है, और यदि उसके साथ ही अन्याय होता है, तो उसे कहाँ जाना चाहिए? क्या जिला न्यायाधीश के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करने वाला न्यायाधीश जिला न्यायाधीश के ऐसे आदेशों को स्वीकार करने के लिए बाध्य है जो कानून के विपरीत, यानी बिना क्षेत्राधिकार के हैं?”
  • आदेश के समय और मंशा पर चिंता: जज ने रेखांकित किया कि तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने अपनी सेवानिवृत्ति (Retirement) से ठीक 13 दिन पहले बिना कोई स्पष्ट कारण बताए 9 स्थानांतरण आदेश पारित किए और 97 गंभीर मुकदमे वापस ले लिए।
  • ‘किंग्स’ की तरह काम नहीं कर सकते लोक सेवक: जज दिवाकर ने कहा कि भारत कानून के शासन (Rule of Law) से चलता है, न कि किसी अधिकारी के मनमाने आचरण से:“कोई भी लोक सेवक राजाओं की तरह व्यवहार नहीं कर सकता। उसे अपने हर आदेश का कारण देना होगा, यानी आदेश एक तार्किक आदेश (Speaking Order) होना चाहिए। केवल यह कह देना काफी नहीं है कि ‘सत्र न्यायाधीश के पास अधिकार है’।

मुजफ्फरनगर: उत्तर प्रदेश की न्यायिक सेवा में अधीनस्थ न्यायालयों के प्रशासनिक नियंत्रण, मुकदमों के थोक स्थानांतरण (Transfer of Cases) और न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर एक अभूतपूर्व विवाद सामने आया है। मुजफ्फरनगर के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (ASJ) रवि कुमार दिवाकर ने अपनी अदालत से हत्या के लगभग 100 गंभीर मुकदमों को अन्य अदालतों में स्थानांतरित किए जाने के जिला एवं सत्र न्यायाधीश के आदेश पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जज दिवाकर ने अपने एक हालिया न्यायिक फैसले में दर्ज किया कि जिला जज द्वारा पारित यह स्थानांतरण आदेश कानून के विपरीत, बिना किसी विधिक कारण के और पूरी तरह क्षेत्राधिकार-विहीन (Without Jurisdiction) था।

न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर पिछले 5 महीनों में 11 अलग-अलग मामलों में 23 दोषियों को मृत्युदंड (फांसी की सजा) सुनाने को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहे हैं। इसके तुरंत बाद, अगस्त 2026 में उनकी अदालत से हत्या के 97 गंभीर मुकदमों को एक साथ वापस लेकर अन्य अदालतों को सौंप दिया गया था।

न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर की प्रमुख न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘जब जज के साथ ही अन्याय हो, तो वह न्याय मांगने कहां जाए?’ अपने निर्णय में न्यायिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक जवाबदेही पर पीड़ा व्यक्त करते हुए न्यायाधीश दिवाकर ने लिखा:

“एक न्यायाधीश का काम समाज में न्याय करना है, लेकिन यदि स्वयं एक न्यायाधीश के साथ ही अन्याय होने लगे, तो उसे न्याय की गुहार लगाने कहाँ जाना चाहिए? क्या एक ऐसा न्यायाधीश, जो जिला जज के प्रशासनिक नियंत्रण में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है, जिला जज के ऐसे आदेशों को स्वीकार करने के लिए बाध्य है जो कानून के विपरीत यानी पूरी तरह क्षेत्राधिकार-विहीन (Without Jurisdiction) हैं?”

2. ‘लोक सेवक राजाओं की तरह आचरण नहीं कर सकते; आदेश सकारण (Speaking Order) होना अनिवार्य’

  • न्यायाधीश ने प्रशासनिक शक्तियों के मनमाने इस्तेमाल पर प्रहार करते हुए कहा:“भारत कानून के शासन (Rule of Law) से संचालित होता है, किसी लोक सेवक के मनमाने आचरण से नहीं। कोई भी लोक सेवक राजाओं की तरह व्यवहार या आचरण नहीं कर सकता। उसे अपने प्रत्येक आदेश के लिए वैध और स्पष्ट कारण दर्ज करने होंगे; यानी उसका आदेश एक सकारण आदेश (Speaking Order) होना चाहिए।”

3. सेवानिवृत्ति से ठीक 13 दिन पहले मुकदमों का थोक ट्रांसफर

  • जज दिवाकर ने तथ्य रेखांकित किया कि तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने अपनी सेवानिवृत्ति (Retirement) से मात्र 13 दिन पहले 18 अगस्त को बिना कोई कारण बताए नौ अलग-अलग आदेश पारित करके लगभग 100 गंभीर मामलों की फाइलें उनकी अदालत से वापस ले लीं।
  • उन्होंने लिखा कि यद्यपि दंड प्रक्रिया संहिता/बीएनएसएस के तहत जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पास मुकदमों को स्थानांतरित करने का अधिकार है, लेकिन उस शक्ति का प्रयोग न्यायिक रूप से उचित (Judicially Justified) होना चाहिए:“यदि किसी अदालत से इतनी बड़ी संख्या में गंभीर मुकदमों की फाइलें वापस या स्थानांतरित की जाती हैं, तो केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं होगा कि ‘सत्र न्यायाधीश के पास ऐसी शक्ति है’। उस शक्ति के प्रयोग के कानूनी आधार और परिस्थितियां बिल्कुल अलग विषय हैं।”

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मामले की पृष्ठभूमि (माफियाओं को लाभ पहुंचाने का पूर्व आरोप)

  • कड़े फैसलों का दौर: न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने पिछले पांच महीनों के दौरान जघन्य अपराधों में जीरो टॉलरेंस का रुख अपनाते हुए 11 मुकदमों में 23 अपराधियों को फांसी की सजा सुनाई थी।
  • अगस्त में मुकदमों की वापसी: इसके बाद 18 अगस्त को जिला जज द्वारा अचानक 97 हत्या के मुकदमों को उनकी कोर्ट से हटा दिया गया।
  • माफियाओं को लाभ पहुंचाने का आरोप: जज दिवाकर ने पूर्व में भी खुली टिप्पणी की थी कि मुकदमों का यह अचानक और एकमुश्त ट्रांसफर संगठित अपराधियों, गैंगस्टरों और माफियाओं को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया प्रतीत होता है।
  • सत्र अदालत के अधिकारों की सीमा: वर्तमान फैसले में उन्होंने व्यवस्था दी है कि आपराधिक प्रक्रिया के तहत प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग दुर्भावनापूर्ण या गुप्त आधारों पर नहीं किया जा सकता, विशेषकर जब कोई न्यायिक अधिकारी गंभीर मुकदमों की त्वरित सुनवाई कर रहा हो।

विधिक विवरण

  • संबंधित पीठासीन अधिकारी: रवि कुमार दिवाकर, अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (ASJ), मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश
  • प्रासंगिक कानून: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 450/451 (पूर्ववर्ती धारा 408/409 CrPC – सत्र न्यायाधीश द्वारा मुकदमों को वापस लेने और स्थानांतरित करने की शक्ति); भारत का संविधान – अनुच्छेद 235 (अधीनस्थ न्यायालयों पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण एवं न्यायिक स्वतंत्रता का सिद्धांत)
  • संबद्ध विधिक सिद्धांत:
    • नेचुरल जस्टिस एवं स्पीकिंग ऑर्डर का सिद्धांत — ‘प्रशासनिक आदेश हो या न्यायिक, बिना कारण बताए लिया गया फैसला मनमाना माना जाता है।’
    • रणबीर यादव बनाम बिहार राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘मुकदमों के स्थानांतरण की शक्ति का प्रयोग केवल न्याय के हित में और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए ही किया जाना चाहिए, न कि यांत्रिक या मनमाने ढंग से।’

Speaking Order: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित न्यायाधीशअपर सत्र न्यायाधीश (ADJ) रवि कुमार दिवाकर
अदालत स्थानमुजफ्फरनगर जिला अदालत, उत्तर प्रदेश
विवादहत्या के 97 गंभीर मामलों का अचानक अन्य अदालतों में स्थानांतरण (Case Transfer)
जज की कड़ी टिप्पणी“जज का काम न्याय करना है; अगर उसके साथ अन्याय हो, तो वह कहां जाए?”
कानूनी आधारजिला जज के पास ट्रांसफर का अधिकार है, लेकिन यह बिना ठोस कारण और क्षेत्राधिकार के नहीं हो सकता।
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