Wednesday, June 3, 2026
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Criminal Justice: आपसी सहमित से शारीरिक संबंध व प्यार का रिश्ता टूटने का मतलब दुष्कर्म नहीं…कानून के इस्तेमाल का केस खोल रहा राज, पढ़ें

Criminal Justice: उड़ीसा हाई कोर्ट ने दुष्कर्म (Rape) और घर में जबरन घुसने (House-trespass) के मामले में एक व्यक्ति की सजा को रद्द करते हुए बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

आरोपी के 10 वर्ष की सजा को पलट दिया

हाईकोर्ट के जस्टिस संजीब कुमार पाणिग्रही की सिंगल बेंच ने निचली अदालत द्वारा आरोपी को दी गई 10 साल की जेल की सजा को पलट दिया। कोर्ट ने चेतावनी दी कि आपराधिक न्याय प्रणाली (Criminal Justice System) को बदला लेने या ब्लैकमेल करने का जरिया’ (Tool for vengeance or coercion) नहीं बनने दिया जा सकता। अदालत ने साफ किया है कि दो वयस्कों (Adults) के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध अगर बाद में खराब हो जाएं या रिश्ता टूट जाए, तो उसे दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं लाया जा सकता।

हर टूटे रिश्ते को रेप का केस बनाना कानून की भावना के खिलाफ: हाई कोर्ट

अदालत ने सहमति से बने संबंधों और यौन अपराधों के बीच एक स्पष्ट लकीर खींचते हुए 22 मई को अपने फैसले में कहा, आपराधिक कानून का दायरा किसी नागरिक को उसकी इच्छा के विरुद्ध किए गए कृत्यों से बचाना है। यह दो सक्षम व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति (Mutual Agreement) से जुड़ी बातों में दखल देने के लिए नहीं बना है। सहमति से बने संबंधों, जो बाद में किसी कारण से कड़वे हो जाते हैं, उनमें दंडात्मक प्रावधानों का दुरुपयोग रोकना बेहद जरूरी है। हर असफल या तनावपूर्ण रिश्ते को बलात्कार के मुकदमे में बदल देना न्याय और निष्पक्षता की संवैधानिक सोच के खिलाफ है।

क्या था पूरा मामला? (2022 की घटना)

यह मामला मई 2022 का है। महिला (शिकायतकर्ता) ने आरोप लगाया था कि आरोपी रात के 2 बजे उसके घर में जबरन घुस आया और उसके साथ बलात्कार किया। उसने यह भी दावा किया कि आरोपी ने 3-4 दिन पहले फोन पर उसे धमकी भी दी थी। निचली अदालत ने इन आरोपों को सही मानते हुए आरोपी को आईपीसी की धारा 376(1) और 450 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल की कठोर सजा सुनाई थी।

हाई कोर्ट में क्यों पलटा फैसला?

आरोपी के वकील सुबोध कुमार मोहंती ने दलील दी कि निचली अदालत ने सबूतों का सही मूल्यांकन नहीं किया। हाई कोर्ट ने जब पूरे मामले की बारीकी से समीक्षा की, तो कहानी कुछ और ही निकली।

दोनों बालिग और समझदार: कोर्ट ने नोट किया कि आरोपी और महिला (शिकायतकर्ता) दोनों बालिग (Majority) हैं। वे कानूनन और मानसिक रूप से इतने परिपक्व हैं कि अपने फैसलों और उसके परिणामों को समझ सकें।

मेडिकल रिपोर्ट में चोट के निशान नहीं: पीड़िता की जांच करने वाले डॉक्टर ने साफ गवाही दी कि महिला के शरीर पर जबरन शारीरिक संबंध बनाने या किसी भी तरह की हिंसा का कोई निशान नहीं मिला।

FIR दर्ज करने में देरी: मामले में बिना किसी ठोस वजह के एफआईआर (FIR) बहुत देर से दर्ज कराई गई थी, जिससे अभियोजन पक्ष की कहानी पर गहरा संदेह पैदा हुआ।

कानूनी सिद्धांत: जहां सहमति, वहां अपराध नहीं

जस्टिस पाणिग्रही ने आपराधिक कानून के दो बेहद मशहूर लैटिन सूत्रों (Maxims) का जिक्र करते हुए फैसले का आधार समझाया।

Actus non facit reum nisi mens sit rea: यानी कोई भी कृत्य तब तक अपराध नहीं बनता, जब तक कि उसे करने के पीछे का इरादा (Criminal Intent) गलत न हो। इस मामले में दोनों की मर्जी शामिल थी, इसलिए कोई आपराधिक इरादा साबित नहीं होता।

Volenti non fit injuria: यानी जिस काम के लिए किसी व्यक्ति ने अपनी स्वतंत्र सहमति दी हो, उसे कानूनन उस व्यक्ति के खिलाफ ‘इंजरी’ या ‘अपराध’ नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि जहां धोखा, धोखाधड़ी, गलत बयानी या जबरदस्ती का कोई सबूत न हो, वहां कानून केवल एक पक्ष पर आपराधिक दोष मढ़कर उसे बदनाम नहीं कर सकता। संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) आरोपी को मिलना ही चाहिए।

विश्लेषण: इस फैसले के दूरगामी मायने

इम्पैक्ट एरियाहाई कोर्ट का स्टैंड और समाज पर असर
मिसयूज (Misuse) पर लगामयह फैसला उन मामलों के लिए नजीर बनेगा जहां आपसी सहमति से लंबे समय तक संबंध में रहने के बाद ब्रेकअप होने पर ‘रेप’ की एफआईआर दर्ज करा दी जाती है।
सच्ची पीड़ितों को न्यायकोर्ट ने सही कहा कि झूठे मामलों से असली यौन उत्पीड़न पीड़ितों के मामलों की गंभीरता कम (Trivialise) हो जाती है। झूठे मामलों पर रोक लगने से असली पीड़ितों को न्याय मिलने में आसानी होगी।
सहमति (Consent) का सम्मानअदालत ने स्पष्ट किया कि दो बालिग लोग अपनी मर्जी से क्या करते हैं, वह उनका संप्रभु निर्णय (Sovereign Volition) है। जब तक बिना सहमति के कुछ न हुआ हो, तब तक राज्य इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

उड़ीसा हाई कोर्ट का यह फैसला पर्सनल रिलेशनशिप और क्रिमिनल लॉ के बीच की मर्यादा को तय करता है। कोर्ट ने कड़ा संदेश दिया है कि ‘प्यार में मिला धोखा या रिश्ते का टूटना’ दुखद हो सकता है, लेकिन यह कानूनी रूप से ‘बलात्कार’ नहीं है। अदालतों को भावनाओं में बहने के बजाय कानून के बुनियादी सिद्धांतों पर ही फैसला करना चाहिए।

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