उच्च न्यायालय के मुख्य निष्कर्ष (Key Findings)
- दोनों कानूनों की अलग सीमाएं: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1991 का अधिनियम सरकारी नौकरियों और सेवाओं में आरक्षण के लिए है। 2006 का पंचायत राज अधिनियम चुनाव आरक्षण को नियंत्रित करता है। 1991 के कानून का इस्तेमाल केवल यह देखने के लिए किया जाता है कि कौन सी जातियां ‘पिछड़ा वर्ग’ की सूची (अनुलग्नक-1) में आती हैं।
- 100 वर्षों से अधिक का प्रवास ‘बाहरी’ नहीं: कोर्ट ने कहा कि जिसके पूर्वज 125 साल पहले बिहार में आकर बस चुके हैं और जिनकी 3-4 पीढ़ियां यहां रही हैं, उन्हें “राज्य के बाहर रहने वाला व्यक्ति” नहीं कहा जा सकता। अधिनियम में “बिहार राज्य के बाहर रहने वाले” शब्द का प्रयोग है, न कि केवल “मूल निवासियों” तक आरक्षण सीमित करने का।
- जाति प्रमाण पत्र रद्द नहीं किया गया: स्क्रूटनी कमेटी ने याचिकाकर्ता के जाति प्रमाण पत्र को न तो रद्द किया था और ना ही यह पाया था कि वे तेली (मुस्लिम) के अलावा किसी अन्य जाति के हैं।
पटना: पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुखिया पद के चुनावों में आरक्षण ‘बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006’ द्वारा शासित होता है, न कि ‘बिहार पदों एवं सेवाओं की रिक्तियों में आरक्षण अधिनियम, 1991’ द्वारा। अदालत ने जाति जांच समिति (Caste Scrutiny Committee) के फैसले और राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) के उस आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया, जिसके तहत एक निर्वाचित मुखिया को पद से अयोग्य घोषित कर हटा दिया गया था।
न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की एकल पीठ ने माना कि दोनों प्राधिकारियों ने पंचायत चुनावों में आरक्षण लागू करने के लिए 1991 के अधिनियम और उसके 2003 के संशोधन के प्रतिबंधों को गलत तरीके से लागू किया था।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
दोनों अधिनियमों के कार्यक्षेत्र में अंतर स्पष्ट करते हुए अदालत ने कहा: “तथ्यों से यह स्पष्ट है कि जहां तक 1991 के अधिनियम का संबंध है, वह मुखिया पद के चुनाव में आरक्षण को नियंत्रित नहीं करता है; बल्कि यह आरक्षण पंचायती राज अधिनियम की धारा 15(5) में निहित प्रावधानों द्वारा शासित होता है।”
दोनों कानूनों के बीच सीमित संबंध पर पीठ ने रेखांकित किया: “दोनों अधिनियमों के बीच संबंध केवल इस हद तक है कि पंचायती राज अधिनियम के तहत पिछड़े वर्गों (Backward Classes) की सूची वही मानी जाएगी जो 1991 के अधिनियम के अनुबंध-1 (Annexure 1) में विनिर्दिष्ट जातियां हैं।”
मामले की पृष्ठभूमि
- 2021 में चुनाव: याचिकाकर्ता वर्ष 2021 के पंचायत चुनाव में ग्राम पंचायत राज सहूरिया से अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) के लिए आरक्षित सीट से मुखिया निर्वाचित हुए थे।
- शिकायत और आरोप: उनके खिलाफ राज्य निर्वाचन आयोग में शिकायत दर्ज कराई गई कि वे मूल रूप से ‘शेख’ समुदाय से आते हैं, लेकिन उन्होंने फर्जी तरीके से ‘तेली (मुस्लिम)’ जाति का ईबीसी प्रमाण पत्र हासिल कर चुनाव लड़ा।
- जांच और आयोग का फैसला: सीआईडी (कमजोर वर्ग) की तीन सदस्यीय जांच समिति ने याचिकाकर्ता को ‘तेली (मुस्लिम)’ जाति का ही पाया। इसके बावजूद, जाति जांच समिति ने 1991 के आरक्षण अधिनियम के 2003 संशोधन का हवाला दिया (जिसके अनुसार बिहार से बाहर रहने वाले आरक्षण लाभ का दावा नहीं कर सकते) और माना कि वे बिहार के मूल निवासी नहीं हैं। इसके आधार पर SEC ने उन्हें मुखिया पद से हटा दिया था।
- चुनाव और शिकायत: याचिकाकर्ता वर्ष 2021 के पंचायत चुनाव में EBC श्रेणी के लिए आरक्षित सीट से मुखिया चुने गए थे। बाद में एक शिकायत दर्ज कराई गई कि वे ‘शेख’ समुदाय से हैं, लेकिन उन्होंने छल से ‘तेली (मुस्लिम)’ जाति का EBC प्रमाण पत्र बनवाकर चुनाव लड़ा।
- सीआईडी जांच में पुष्टि: अपराध अनुसंधान विभाग (CID-दुर्बल वर्ग) की 3-सदस्यीय टीम ने गांव व पड़ोसियों से पूछताछ कर 31 दिसंबर 2024 को रिपोर्ट दी कि याचिकाकर्ता वास्तव में ‘तेली (मुस्लिम)’ जाति से ही हैं।
- निवास स्थान का विवाद: इसके बावजूद, जाति स्क्रूटनी कमेटी ने 1991 के आरक्षण कानून और उसके 2003 के संशोधन (जिसके तहत बिहार के बाहर रहने वाले आरक्षण का लाभ नहीं ले सकते) का सहारा लेते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के पूर्वज लगभग 125 वर्ष पहले जौनपुर (उत्तर प्रदेश) से आए थे।
- निर्वाचन आयोग की कार्रवाई: इस रिपोर्ट के आधार पर राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) ने याचिकाकर्ता को “बिहार का मूल निवासी न होने” के आधार पर अयोग्य घोषित कर मुखिया पद से हटा दिया था।
हाईकोर्ट द्वारा आदेश रद्द करने के मुख्य आधार
- कानून की गलत व्याख्या: 1991 का आरक्षण अधिनियम राज्य सरकार के अधीन ‘पदों और सेवाओं’ (नौकरियों) के लिए बनाया गया है, जबकि स्थानीय निकाय चुनावों का आरक्षण पंचायती राज अधिनियम, 2006 की धारा 15(5) के तहत स्वतंत्र रूप से संचालित होता है।
- 125 वर्षों का निवास और पीढ़ियों का इतिहास: अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के पूर्वज लगभग 125 वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के जौनपुर से बिहार आए थे और उनकी 3-4 पीढ़ियां बिहार में ही रह रही हैं। कानून “बिहार राज्य के बाहर रहने वाले” व्यक्तियों की बात करता है, न कि केवल “मूल निवासियों” तक आरक्षण सीमित करता है।
- जाति प्रमाण पत्र वैध: जाति जांच समिति ने याचिकाकर्ता के जाति प्रमाण पत्र को न तो रद्द किया था और न ही रद्द करने की सिफारिश की थी। न ही यह पाया गया कि वे ‘तेली (मुस्लिम)’ के अलावा किसी अन्य जाति से हैं।
पटना हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति पार्थ सारथी ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा: “जहाँ तक 1991 के अधिनियम का सवाल है, वह मुखिया पद के चुनाव में आरक्षण को नियंत्रित नहीं करता है; यह आरक्षण पंचायत राज अधिनियम, 2006 की धारा 15(5) के प्रावधानों द्वारा तय होता है। याचिकाकर्ता के पूर्वज 100 से अधिक वर्षों से बिहार में रह रहे हैं, किसी भी स्थिति में यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता बिहार राज्य से बाहर रहने वाला अभ्यर्थी है।
अंतिम आदेश
पटना उच्च न्यायालय ने जाति जांच समिति की कार्यवाही और राज्य निर्वाचन आयोग के अयोग्यता आदेश दोनों को कानूनन त्रुटिपूर्ण मानते हुए पूरी तरह निरस्त (Set Aside) कर दिया और याचिकाकर्ता को राहत प्रदान की।
Bihar Mukhiya Election:एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति पार्थ सारथी (Justice Partha Sarathy) |
| याचिकाकर्ता | मो. ईसा (ग्राम पंचायत राज सहुड़िया, सहरसा के निर्वाचित मुखिया) |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | पंचायत चुनाव में आरक्षण का नियम 2006 के अधिनियम से लागू होगा; 100+ साल पुराने प्रवासियों को ‘बाहरी’ नहीं माना जा सकता। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | SEC का हटाने का आदेश व कमेटी की रिपोर्ट रद्द; मुखिया का चुनाव बहाल। |

